पोस्टर बॉयज: बॉलीवुड की कुछेक कॉमेडी फिल्मों में से एक जो बिना अश्लील हुए हंसाती हैं.

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अनुज कुमार पाण्डेय/

आज नसबंदी का जिक्र आते ही सबके जेहन में इमरजेंसी के समय की घटना याद आ जाती है.  उस वक़्त संजय गांधी ने लौंडों को पकड़-पकड़ कर नसबंदी करवाई थी, जो नहीं करवाना चाहते थे, वो घर गांव छोड़ कर पहाड़ों की तरफ भाग गए थे. सब कुछ जबरदस्ती हुआ था.

अब उसी नसबंदी को लेकर श्रेयस तलपड़े ने बतौर डेब्यू डायरेक्टर एक फ़िल्म बनाई है, ‘पोस्टर बॉयज’ पहले फ़िल्म मराठी में बनी थी, उधर चली, तो हिंदी में भी बनाई गई.  यह फ़िल्म भी नसबंदी के ऊपर है, नसबंदी मने बिना चीरा-बिना टांका लगाए फैमिलीप्लानिंग. गांव में लोग कहते हैं कि बस यूं ही पकड़ कर कोई नस दबा देते हैं और हो गया काम.

फ़िल्म में सन्नी देओल, बॉबी देओल और श्रेयस तलपड़े मुख्य भूमिका में हैं और इनके साथ एक घटना हो जाती है.   न-न, इस बार जबरदस्ती में नसबंदी नहीं होती, बल्कि नसबंदी वाले पोस्टर पर इन तीनों भले मानुषों का फ़ोटो छप जाता है.  वो भी गलती से, और गलती किसकी?

जाहिर सी बात है ये गलती सरकारी दफ्तरों में बैठे एक्स्ट्रा चर्बी चढ़ाए बाबुओं अफसरों की ही होगी.  नसबंदी वाले पोस्टर तो आपको याद ही होंगे, मूंछों पर ताव देते हट्टे-कट्टे आदमी की मुस्कुराती हुई तस्वीर को घेरे हुए कई स्लोगन से युक्त पीला सा पोस्टर. ऐसा ही एक पोस्टर एक दिन तीनों सितारों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा संकट बन जाता है, और यहीं से शुरू होती है फिल्म. फिल्म कामेडी प्रधान है और इस पोस्टर के बाद जो हंसी शुरू होती है कि दर्शक  हँसते-हँसते रुकने का नाम ही नहीं लेंगे. और सबसे जरूरी बात यह कि नसबंदी जैसे मुद्दे पर होकर भी फ़िल्म रत्तीभर भी अश्लील नहीं है.

श्रेयस तलपड़ेअपने दमदारअभिनय के लिए जाने जाते हैं, लेकिन निर्देशन के मामले में भी वह कहीं पर भी कमज़ोर नहीं पड़ते. अमूमन हास्य फिल्मों की सबसे बड़ी समस्या होती है फ़िल्म की गति को बरकरार रखना. ‘पोस्टरबॉयज़’ पहले दृश्य से लेकरआखिरी तक कहीं भी डगमगाती हुई नजर नहीं आती. यहां तक कि क्लाइमेक्स के कुछ गंभीर दृश्य भी पानी में नमक की तरह फ़िल्म के मज़ाकिया मूड के साथ घुलमिल गए हैं.

बसस्टैंड पर मिलने वाली पांच रुपये की चुटकुले की किताब को स्क्रिप्ट बनाकर लिखी गई तथाकथित हास्यफिल्मों से ‘पोस्टरबॉयज’ कई गुना बेहतर है. फ़िल्म में सनी देओल के कई मशहूर डायलॉग्स का बेहतरीन तरीके से किया गया इस्तेमाल स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी को और मज़ेदार बना देता है. बॉबी देओल, जिन्होंने डेब्यू के साथ इंडस्ट्री में भौकाल मचाया था, उन्हें लंबे अरसे के बाद पर्दे पर देखना सुहाता है. सहायक अभिनेताओं का भी फ़िल्म में खूब योगदान है.

सनी देओल की ही सुपरहिट फिल्म ‘अर्जुन पण्डित’ के गाने ‘ओये होए नी कुड़ियां शहर दियाँ….’ जिसे दलेर मेहदी ने गाया है, का थोड़े बहुत बदलाव के साथ इस फ़िल्म में इस्तेमाल किया है जिसका फिल्मांकन भी काफी अच्छा बन पड़ा है.

कुल मिलाकर ‘पोस्टरबॉयज़’ एक बेहतरीन फ़िल्म है जिसे कम से कम एक बार देखा जाना तो बनता ही है, वोभी मियां बीवी बच्चे सहित. सन्नी पाजी के फैंस को तो जाना बनता ही है, आप बॉबी देओल के वापसी के लिए लिए ही देख आओ. सोल्जर…सोल्जर… मीठी बातें बोलकर… दिल तू चुरा ले गया…

 

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