थालाइवा: सरलता और सादगी के नाम गया दादासाहेब फाल्के पुरस्कार!

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रजनीकांत को हाल ही में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है।
रजनीकांत को हाल ही में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है।

रजनीश जे जैन/ 

रजनीश जे जैन/

उर्दू के बेहतरीन शायर असरार उल हक़ ‘मजाज’ की एक लंबी नज्म का अंतिम शेर कुछ इस प्रकार है कि ‘तू इंक़लाब की आमद का इंतिज़ार न कर जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर!’ शिवाजी राव गायकवाड़ के रूप में जन्मे रजनीकांत ने लगभग यही कारनामा कर दिखाया है। एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे इस सुपर सितारे ने अपने जुनून से रुपहले परदे पर ऐसा हंगामा बरपाया कि उनकी लोकप्रियता भौगोलिक सीमाओं के पार चली गई। भारतीय सिनेमा के सर्वोच्य सम्मान ‘दादासाहेब फाल्के पुरूस्कार’ से उनका  नामित होना मजाज के शब्दों को चरितार्थ करने जैसा ही है।

बस कंडक्टर के रूप में रोजी-रोटी कमाते हुए संभव है उनके सपने इतने सुनहले नहीं रहे होंगे लेकिन नाटकों में नियमित काम करते हुए किसी पारखी की नजरों में चढ़ जाने का हौंसला जरूर रहा होगा! इसी होंसले की तपिश ख्यात निर्माता निर्देशक के बालचंदर को उनके पास ले आई और सिनेमा को रजनीकांत के रूप में ऐसा अभिनेता मिला जिसे खल पात्र बनने में भी कोई दिक्कत नहीं थी।

1975 का वर्ष भारतीय सिनेमा के लिए इस लिहाज से अविस्मरणीय होने जा रहा था  कि ‘शोले’ के रूप में ऐसी हिंदी फिल्म प्रदर्शित होने जा रही थी जो फिल्मो के अर्थशास्त्र से लेकर सारे प्रतिमान बदल देने वाली थी। अमिताभ बच्चन अपने को स्थापित करते हुए उम्मीद जगा चुके थे कि आने वाले  समय का एक बड़ा हिस्सा उन्ही के नाम होने वाला है। ठीक इसी समय के बालचंदर के मराठी भाषी शिष्य रजनी ने तमिल सीखना आरंभ किया और शीघ्र ही इस भाषा पर महारत हासिल कर ली।

1975 में ही अपनी पहली तमिल फिल्म ‘मुदरू मुदिचु’ में खलनायिकी के तेवर दिखाने के लिए उन्होंने एक अदा के साथ सिगरेट सुलगाई! उन्हें बिलकुल अंदाजा नहीं था कि दस सेकंड का यह मौलिक प्रयास उनके आगामी करियर की चर्चित भूमिकाओं से भी अधिक यादगार रहने वाला है। उनकी शुरूआती दो  फिल्मो के बाद दक्षिण भारत के सबसे बड़े अखबार ‘ द हिन्दू’ ने उनके बारे में सिर्फ एक पंक्ति की समीक्षा लिखी थी ‘नवांगतुक अभिनेता शालीन और प्रभावशाली है!’

इसे संयोग ही कहेंगे की अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्मों के तमिल रीमेक में काम करने के सर्वाधिक अवसर रजनी को ही मिले। डॉन, दीवार, अमर अकबर एंथोनी, मजबूर जैसी ग्यारह ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने उनकी लोकप्रियता के ग्राफ को ऊंचाइयां दी। जिस परिवेश से निकलकर रजनीकांत दक्षिण सिनेमा के आकाश को छू रहे थे उस समय भी उनके पाँव जमीन पर ही थे। अपनी सफलता को अमिताभ से प्रेरित बताकर उन्होंने अपनी विनम्रता ही जग जाहिर की थी।

यह अनायास नहीं था। काफी बाद में जब उनके बाल झड़ने लगे तब भी सार्वजनिक रूप से गंजे सिर नजर आना उनके व्यक्तित्व की सरलता ही थी।

बॉलीवुड सितारों को इस बात से जलन हो सकती है कि दक्षिण भारत के दर्शक फ़िल्मी सितारों को भगवान मानकर जो स्नेह लुटाते है वैसा सम्मान उनकी आसमानी लोकप्रियता भी उन्हें महसूस नहीं होने देती। अपराध सरगना के  कथानक पर बनी ‘बाशा’ 1995  की घनघोर सफलता ने रजनीकांत को इस मुकाम  पर आसानी से स्थापित कर दिया। 1998 में आई ‘मेविन कोमबाथू’ पहली तमिल फिल्म थी जो जापानी भाषा में डब होकर जापान में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने उनकी लोकप्रियता को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर पहुंचा दिया। अमेरिकी पत्रिका ‘ न्यूज़ वीक’  ने टिप्पणी की, ‘रजनीकांत ने जापानियों की दिल की धड़कन बने लेनार्डो डी केप्रिओ की भी छुट्टी कर दी है!’

थलाइवा! जैसा कि उनके प्रशंसक उन्हें स्नेह से पुकारते है कि सिनेमाई उपलब्धियों और समाज सेवा के कार्यो की बात करने के लिए यह एकलौता कॉलम नाकाफी है! फिर भी  भारतीय सिनेमा में ‘सौ करोड़ क्लब की फिल्म’ के जुमले और सी बी एस सी के पाठ्यक्रम में उनकी जीवनी का शामिल होना उन्हें महत्वपूर्ण बना देता है।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं।)

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