माहवारी और भारतीय गाँव को निशाने पर लेती डॉक्युमेंट्री को मिला ऑस्कर

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शिखा कौशिक/

‘पीरियड. एंड ऑफ़ सेंटेंस’- 25 मिनट लम्बी डाक्यूमेंट्री फिल्म को इस बार डाक्यूमेंट्री की श्रेणी में ऑस्कर मिला है और सबसे ख़ास बात है कि इस फिल्म की शूटिंग भारत के एक गाँव में की गई है. इस फिल्म ने गाँव में माहवारी से जुड़ी भ्रांतियों को अपना विषय वस्तु बनाया है.

फिल्म का निर्देशन ईरान और अमेरिका से सम्बन्ध रखने वाली निर्देशक रायका जेहताबची ने किया है. इस फिल्म का प्रोडक्शन भारतीय प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा ने किया है. इन्होंने इसके पहले मसान और लंच बॉक्स जैसी फिल्मों को भी प्रोड्यूस किया है.

इस फिल्म को बनाने में ओकवुड हाई स्कूल के विद्यार्थियों की भी मदद ली गई थी. इन विद्यार्थियों ने एक स्वयंसेवी संस्था भी बनाई है जिसका नाम है ‘दी पैड प्रोजेक्ट’. इसका भी उद्देश्य माहवारी से जुडी तरह-तरह की भ्रांतियों से लड़ना है.

इस फिल्म का प्रोडक्शन भारतीय प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा ने किया है. इन्होंने इसके पहले मसान और लंच बॉक्स जैसी फिल्मों को भी प्रोड्यूस किया है

इस फिल्म के मुख्य में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुर नाम के गाँव की कुछ महिलायें हैं. ये महिलायें मशीन से सस्ते में सेनेटरी पैड्स बनाने का और उसे बेचने का काम सीखती हैं और इसी दरम्यान वो इससे जुड़े शर्म से भी लडती हैं.

लगभग 25 मिनट की इस डाक्यूमेंट्री में ये महिलायें एक नए मशीन से सेनेटरी पैड बनाते हुए दिखाई जाती हैं. इससे उनको आर्थिक मदद भी मिलती है और साथ में गाँव की महिलाओं में माहवारी के समय में साफ़ सफाई बरतने के लिए सस्ते दरों पर पैड्स भी उपलब्ध होते हैं. मीडिया की मानें तो इन महिलाओं के द्वारा बनाए गए पैड्स अब चालीस गाँव की महिलायें इस्तेमाल कर रही हैं. इस फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि माहवारी जैसे विषयों पर बात करना भारतीय समाज में कितना मुश्किल है. यह वही देश है जहां 23 प्रतिशत छात्राएं सिर्फ माहवारी की वजह से अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ देती हैं.

इस फिल्म के निर्देशक के चुने जाने की कहानी भी मजेदार है. सन् 2012 में लॉस एंजेलस की रहने वाली एक शिक्षिका मेलिसा बुर्टोन अपने कुछ छात्रों के साथ भारत के कथिखेरा गाँव में सस्ते दरों पर सेनेटरी पैड बनाने वाली मशीन लगाने आयीं. इस मशीन को इस फिल्म में इस्तेमाल किया गया है. खैर, भारतीय गाँव में आये छात्रों को लगा कि सिर्फ मशीन लगा देने भर से कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकती. उनको लगा कि माहवारी से जुड़े संकोच, शर्म इत्यादि से लड़े बिना समस्या से निजात नहीं मिलेगी. फिर उनलोगों ने इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया.

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