पद्मावत शर्तिया एक प्रोपोगेंडा फ़िल्म है

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स्रोत-आईएएनएस

चन्दन पाण्डेय/

पद्मावत एक फासिस्ट फ़िल्म है। प्रोपगैंडा फ़िल्म है। जैसे फासिस्ट शक्तियाँ बड़ी आबादी को तुष्ट करने के लिए उन्हीं के बीच से एक छोटी आबादी को कुर्बानी के लिए या तमाशे के लिए चुन लेती हैं वैसे ही यह फ़िल्म हिन्दू-मुसलमान का द्वैत रचने के लिए राजपूतों के मान-मर्दन करती है।

चन्दन पाण्डेय

पराजित होने से अधिक बुरा उसकी स्मृतियाँ हैं लेकिन उससे भी बुरा उन स्मृतियोँ के चित्रण का तरीका हो सकता है। भंसाली ने निहायत बुरा चित्रण किया है। मिथकों को लेकर पहले भी फिल्में बनती रही हैं, मसलन मुगले-आजम, चितौड़ रानी पद्मिनी, ब्रेव हार्ट या ग्लैडिएटर जैसी अनेक फिल्में हैं जो दोनों पक्ष को रखने की कोशिश करती हैं। जो हिस्टीरिया पैदा करने के उद्देश्य से नहीं बनी। जो सती होने का सजीव प्रसारण नहीं करती। जैसे सजीव प्रसारण जौहर का इस फ़िल्म में दिखाया गया है वह अश्लीलतम है, उससे घिन आती है, उबकाई आती है। दर्शक इतने समझदार हैं जिन्हें जौहर को इशारों से या न्यूनतम दृश्यों से समझाया जा सकता था। सबसे पहला सवाल तो सेंसर बोर्ड से बनता है कि ऐसे दृश्य को पास कैसे होने दिया? किसी को आग की लपटों में प्रवेश करते हुए देखना..सर्वाधिक हिंसक दृश्य है। यह दृश्य शंभूलाल रैगड़ द्वारा कुल्हाड़ी से काट कर मजदूर को जिंदा जला देने की नकल जैसा दृश्य बन पड़ा है। ताज्जुब नहीं कि फ़िल्म में भंसाली और जीवन में शंभू ने, अपनी अपनी क्रूरताओं का सजीव प्रसारण ही दिखाया।

मान-अपमान कई मर्तबा कहने सुनने के तरीके पर भी निर्भर करता है। ‘पद्मावत’ की बिनाई लचर है और वह सच में राजपूतों की भावना आहत करती है

मान-अपमान कई मर्तबा कहने सुनने के तरीके पर भी निर्भर करता है। ‘पद्मावत’ की बिनाई लचर है और वह सच में राजपूतों की भावना आहत करती है। भारत का जातियों में, उप-जातियों में बँटा होना किसी से छुपा नहीं और यह बँटवारा अधम है लेकिन अब जब यह बँटवारा लोगों के मान, अभिमान से जुड़ गया है तो उसे आहत करना निंदनीय है।

मनुष्य के सामूहिक जीवन में विस्मृति का किरदार भी है। भूलने से बड़ी नेमत शायद ही कोई हो। बाज दफा यह भूलना हमें जीवन का साहस देता है। कोई किसी समूह के कमजोर पल याद दिलाता रहे, यह अपराध की श्रेणी में आता है। पद्मावत में जब युद्ध पर जाते हुए रावल सिंह, पद्मावती से पूछता है कि कहीं तुम्हारे आँसू इसलिए तो नहीं कि मैं लौटकर नहीं आने वाला? या अगले ही दृश्य में जब पद्मावती जौहर का हक मांगती है तो सारा मामला कहीं न कहीं उनकी सैन्य और सामरिक कमजोरी की तरफ इंगित करता है। जितना कमजोर मेवाड़ को दिखाया है, वह लगता है कि अपमानित करने के इरादे से ही दिखाया है। इसे बेहतर तरीके से फिल्माया जा सकता था या नहीं भी फिल्माया जा सकता था।

यह बेहतर लोकतांत्रिक संरचना की ही देन है कि कोई जब किसी समूह की भावनाओं को आहत करता है तो उसे माफी माँगनी पड़ती है। ऐसे अनेक उदाहरण है। लेकिन इस फ़िल्म के मामले में अम्बानी की फ़िल्म कंपनी का प्रोडक्शन होने से और करणी सेना वगैरह के प्रायोजित और पूर्व-नियोजित विरोध से आलम यह बना है कि जो सच में आहत लोग होंगे उनकी बात भी नहीं सुनी जाएगी। यह संदेश अब आम होना चाहिए कि अम्बानी की कंपनी ने अगर आपकी फ़िल्म पर दाँव खेला है तो आप किसी भी जाति, धर्म, समूह का मजाक बना सकते हैं, उनका अपमान कर सकते हैं जबकि इसी अम्बानी परिवार के काले चिट्ठे खोलती किताब ‘दि पॉलिएस्टर प्रिंस’ इन्हीं किन्हीं बहानों से भारत में प्रतिबंधित है।

मेरी राय में यह फ़िल्म प्रदर्शित नहीं होनी चाहिए थी। मैं प्रतिबंध लगाने की बात नहीं करता लेकिन अगर लोकतांत्रिक शक्तियाँ चाहती तो अंबानी की कंपनी और उसके चाकर संजय लीला भंसाली को यह आदेश देतीं, जैसे बच्चों को गृहकार्य दिया जाता है, कि जाओ, बेहतर फ़िल्म बना कर लाओ।

यह शर्तिया प्रोपोगेंडा फ़िल्म है।

स्रोत-आईएएनएस

इससे इतर अगर फिल्मांकन की बात करें तो संजय लीला भंसाली के पास अतिशयोक्तिपूर्ण संवादों के अलावा कुछ भी नहीं है। कुछ भी नहीं से मेरा मतलब कुछ भी नहीं। कायदे से कहें तो उनके वश की बात भी नहीं है, ऐसे मिथितिहासिक पहलूओं को संभालना। फ़िल्म उनसे बिछल गई है।

अलाउद्दीन खिलजी, जिसे वहशी दरिंदा दिखाने का पूरमपूर प्रयास भंसाली ने किया है और चूंकि भंसाली प्रतिभाहीन है इसलिए इस काम भी सफल नहीं हो पाया है, के किरदार को रणवीर जैसा कमाल का अदाकार कमजोर निर्देशक के चंगुल से छुड़ा लेता है और एक हद उसे बेहतरी से निभाने का यत्न करता है। राजपूतों का चित्र खींचा है इस फ़िल्म में उसे ब्याज निंदा ही कहा जा सकता है। संगीत अपेक्षा के अनुरूप बेहद खराब है। थ्री डी का होना पहले से पता नहीं था, इसलिए वीएफक्स और दूसरे स्पेशल इफेक्ट्स का काम कई जगहों पर अच्छा लगा।

एक दृश्य जो पसंद आया वो यह था कि पद्मावती की शर्त मानने के बहाने गद्दार राघव चेतन ब्रह्मचारी को सजा देना। अलाउद्दीन के हिस्से सब अच्छे संवाद आए हैं, जैसे, खिलजियों के लिए तो खुदा से लड़ जाएगा अलाउद्दीन।

एक और दृश्य जो मौजूँ है: जब पद्मावती को हासिल करने के लिए मेवाड़ पर हमला करने आया है और महीनों से डेरा डाले बैठा है, तब उसका सेनापति वुसतुल्लाह खान अलाउद्दीन से कहता है कि शहंशाह, अनाज खत्म हो रहा है और सैनिक बगावत पर उतर आए हैं और आपको एक बार सैनिकों से मिलना चाहिए। अलाउद्दीन मिलने जाता है और भरी सभा में एक बार भी पद्मावती वाले अपने लक्ष्य का जिक्र न कर, बार बार खिलजियों का परचम बुलंद रहे वाला भावनात्मक माहौल रचता है और रोने भी लगता है। फिर क्या? उस समय के राष्ट्रवादी भी उसकी बातों में आ जाते हैं और खिलजी का जयकारा लगता है। मंच से उतरते हुए लेकिन अलाउद्दीन अपने सेनापति को आँख मारता है। यह मानीखेज दृश्य बन पड़ा है।

इन दो दृश्यों के अलावा फिल्म का हासिल बस इतना है कि अब ऐसी प्रोपोगेंडा फिल्मों की बाढ़ आ जायेगी।

अपनी बनावट में यह फ़िल्म बाजीराव मस्तानी के स्टेज और सेट्स का ही अनेक्सचर लगती है, जैसे बचपन में हुआ करता था कि पापा के पैंट के कपड़े में से कुछ बच जाए तो हमलोगों के लिए हाफ पैंट बन जाया करती थी।

 

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