उम्मीद की ढलान पर बड़ी फ़िल्में

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

नए साल की शुरुआत में एक बार पीछे मुड़कर देख लेना चाहिए। पुराने  जमा खर्च का हिसाब हो जाए तो नए हिसाब में सहूलियत हो जाती है। यूँ तो देश में सभी भाषाओ में बनने वाली फिल्मों की संख्या हर वर्ष एक हजार के आंकड़े को पार कर जाती है। परन्तु लोकप्रियता, पहुँच और व्यवसाय के लिहाज से हिंदी फिल्मे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्तिथि दर्ज करने में अव्वल रहती रही है। कुल दौ सौ से ढाई सौ हिंदी फिल्मे हर वर्ष प्रदर्शित होती है।  इन में से बमुश्किल दस से पंद्रह फिल्मे ही ऐसी होती है जो ब्लाकबस्टर की उपाधि से नवाजी जाती है या तथाकथित सौ करोड़ के क्लब की सदस्य बन पाती  है। यहाँ यह तथ्य भी दिलचस्प है कि कुछ फिल्मे इन दोनों श्रेणियों में न आने के बावजूद दर्शकों की सराहना हासिल करने में सफल हो जाती है। तकरीबन बीस पच्चीस फिल्मे औसत व्यवसाय करने में सफल रहती  है जिन्हे बाद में टीवी पर ‘वर्ल्ड प्रीमियर’ के नाम से परोस दिया जाता है। यह अजूबा ही है कि यह दुनिया का संभवतः इकलौता व्यवसाय है जहाँ असफलता का प्रतिशत सफलता से कही ज्यादा रहता रहा है। बावजूद इसके फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध बरकरार है !

फिल्म उद्योग में शुक्रवार का दिन अमूमन महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि कुछ  विशेष अवसरों को छोड़कर अधिकांश फिल्मे इसी दिन रिलीज़ होती है। इसी दिन कोई सितारा उदय होता है , किसी को पंख लग जाते है या कोई डूब  जाता है। सिर्फ 2018 की ही बात की जाए तो इस वर्ष असफल होने वाली फिल्मों की बात करने के लिए यह कॉलम पर्याप्त नहीं है। हमेशा की तरह इस वर्ष भी कुछ ऐसी फिल्मे फ्लॉप हुई जिनमे बेशकीमती सितारे जड़े  हुए थे। इन फ्लॉप फिल्मों ने न केवल अपने निर्माताओं की पूंजी में सेंध लगाईं वरन अपने प्रशंसकों को भी उदास कर दिया।

यहाँ उन फिल्मों की बात करना जरुरी है जिनसे कुछ उम्मीद थी परन्तु दर्शकों की अपेक्षा पर वे खरी नहीं उतरी। सनी देओल का एक वफादार दर्शक वर्ग रहा है।  खासकर पंजाब और उत्तरी भारत में उनकी फिल्मे अच्छा व्यवसाय करती रही है। परन्तु चार साल से प्रदर्शन की बाट जोहती निर्देशक डॉ चंद्रप्रकाश द्धिवेदी की ‘मोहल्ला अस्सी’ ने फ्लॉप होने का रेकॉर्ड तोड़ दिया।  यही हाल देओल परिवार की एक और फिल्म ‘यमला पगला दिवाना फिर से’ का हुआ। पिता पुत्र (धर्मेंद्र, सनी और बॉबी) की बकवास कॉमेडी पर दर्शकों ने हंसने से साफ़ इंकार कर दिया। सनी की ही ‘भइया जी सुपरहिट’ देखने वाले दर्शक आधी फिल्म के बीच से भाग खड़े हुए।

सलमान खान के प्रशंसकों को अंधभक्तो की श्रेणी में रखा जा सकता है। भाई की फिल्म, फिर चाहे वह कूड़ा ही क्यूँ न हो, देखनी तो बनती है। आस्था के इस उफान ने उनकी उटपटांग फिल्म ‘रेस 3’ को सौ करोड़ क्लब में तो पहुंचा दिया परन्तु आलोचकों और समीक्षकों का दिल नहीं जीत सकी। सलमान खान की  यह अकेली ऐसी फिल्म है जो पैसा वसूल हो जाने के बाद भी फ्लॉप मानी जाती है।

सत्य घटना पर आधारित ‘परमाणु’ से सुर्खियां बटोर चुके जॉन अब्राहम की ‘सत्यमेव जयते’ अनिल कपूर की ‘फन्ने खां’, अभिषेक बच्चन की ‘मनमर्जियां’, करीना कपूर की ‘वीरे दी वेडिंग’ कुछ ऐसी फिल्मे रही जिन्हे काफी मेहनत के बाद भी फ्लॉप होने से बचाया नहीं जा सका।

अमिताभ बच्चन और आमिर खान ऐसे नाम है जिनके भरोसे टिकट पर पैसा खर्च किया जा सकता है।  परन्तु पहली बार साथ आये ये दोनों महारथी ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान’ को नहीं बचा पाएं। आमिर खान के लिए इस फिल्म ने डबल झटका दिया। उनकी ओवरसीज टेरेटरी चीन में भी यह फिल्म फ्लॉप हो गई। ऐसा ही सबक शाहरुख़ खान को मिला जब उनकी दो वर्षो की मेहनत और दो सौ करोड़ का बजट ‘जीरो’ में सिफर हो गया।

ये कुछ उदहारण है बड़े प्रोजेक्ट की असफलता के जो इंगित करते है कि दर्शक अपना समय और पैसा खर्च कर सिर्फ शक्ल देखने थिएटर का रुख नहीं करता। वह कहानी के लिए सिनेमा घर का रुख करता है और अच्छी कहानी की समझ भी रखता है !!

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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