हथेली से फिसलती रेत को समेटती माधुरी

0

रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

कुछ सौन्दर्य की देवियां ऐसी होती हैं जिनकी सुंदरता गुजरते समय के साथ और बढ़ती जाती है। सुंदरता का जिक्र होते ही सबसे पहले जो नाम जेहन में आता है वह है सौम्य मधुबाला और शालीन स्मिता पाटिल।  हालांकि हरेक सिने प्रशंसक का अपना अलग पैमाना होता है जिसके अनुसार वे अपनी पसंदीदा नायिकाओं को क्रम देते रहते है। यद्यपि ये दोनों ही अभिनेत्रियां अरसा पहले इस दुनिया से अलविदा कह चुकी हैं परन्तु पहले सेलुलॉइड और अब डिजिटल स्वरुप में अंकित होकर ये अमर हो गईं  हैं। सुंदरता की आइकोनिक छवियों के चलते  इनकी फ़िल्में देखते वक्त दर्शक एकबारगी तो इनके सौन्दर्य से अभिभूत हुए बगैर नहीं रह पाता।

नौवें दशक में अपनी शुरूआती असफल फिल्मों के बाद  ‘तेज़ाब’ से लाइम लाइट में आकर माधुरी दीक्षित ने अपना अलग ही मुकाम बनाना आरंभ कर दिया था। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें एकदम खुला मैदान मिल गया था। उस दौर में चुलबुली जूही चावला, डिंपल गर्ल प्रिटी जिंटा, बार्बी डॉल का इंडियन अवतार ऐश्वर्या राय, अल्हड़ काजोल, निश्छल सौन्दर्य की मूर्ति मनीषा कोइराला, किसी भी हद तक जाने को तैयार ममता कुलकर्णी जैसी नायिकाएँ लगातार सफल फिल्में देकर हिंदी भाषी दर्शकों के दिलों दिमाग पर अपनी जगह बना चुकी थीं। पर ‘तेज़ाब’ में उनपर फिल्माए गीत ‘एक दो तीन चार..’  ने रातों रात उन्हें सफलता के कई पायदान एक साथ पार करने में मदद की।

फिल्म दर फिल्म माधुरी नृत्य, अभिनय और सौंदर्य की मिसाल बनती गयीं। फिल्म समीक्षकों ने उनमे मधुबाला और स्मिता पाटिल का मोहक कॉम्बिनेशन देखना आरंभ कर दिया। यह सच भी था। उनकी मुस्कान को भुवन मोहिनी मुस्कान कहा जाने लगा। उनके लावण्य का सुरूर सिर्फ दर्शकों को ही सम्मोहित नहीं कर रहा था वरन विश्वविख्यात चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन भी उन पर इस कदर आसक्त हुए कि उन्होंने भी उनकी कई पेंटिंग्स बनायीं।  हुसैन साहब यहीं नहीं रुके, माधुरी को केंद्र में रखकर उन्होंने फिल्म ‘गजगामिनी’ बना डाली। रंगों, नृत्य और ध्वनि की मोहक जुगलबंदी के बावजूद यह फिल्म सामान्य दर्शक के सर पर से निकल गई।

माधुरी के साथ शुरूआती दौर में एक और सुखद संयोग हुआ। तेज़ाब के सह-नायक अनिल कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री इस कदर रंग लाई कि इस जोड़ी को सफलता का पर्याय मान लिया गया। इन दोनों को  पंद्रह फिल्मों में दोहराया गया। फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए वे सोलह बार नामांकित हुईं जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

माधुरी न सिर्फ खुद शीर्ष सिंहासन पर बैठने में सफल हुई वरन कई नायकों के लड़खड़ाते करियर को संवारने में भी उनकी मदद ली गई थी। महानायक अमिताभ बच्चन की ‘बड़े मियां छोटे मियां ‘ को सहारा देने के लिए माधुरी का एक गीत विशेष रूप से फिल्म में जोड़ा गया था, कुमार गौरव की फिल्म ‘फूल’ के लिए राजेंद्र कुमार ने माधुरी की कितनी मिन्नतें की थीं, अनिल कपूर के छोटे भाई संजय कपूर के साथ फिल्म ‘राजा’ की नायिका बनने जैसे कई और उदहारण हैं जो अब फ़िल्मी इतिहास का हिस्सा हो चुके हैं।

लाइम लाइट में रह चुके लोगों को अक्सर एक तकलीफ से गुजरना होता है। अतीत में वे जिस मुकाम पर थे अपनी वापसी पर उस जगह किसी और को बैठा पाते है। इसके बाद उनका नए सिरे से संघर्ष आरंभ हो जाता है। क्योंकि तब तक उनका प्रशंसक वर्ग किसी अन्य नायिका को सर माथे बिठा चुका होता है।  सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही यह नायिका अमेरिका की चकाचौंध के बावजूद ‘आर्क लाइट’ के दायरे को भूल नहीं पाई और शादी के सात वर्ष बाद ही सपरिवार मुंबई लौट आईं। अपनी वापसी पर उन्होंने कुछ फ़िल्में, कुछ टीवी शोज भी किये लेकिन बावजूद उनके परिपक्व सौंदर्य के, वह जादू नदारद था जिसने एक समय उन्हें आसमान पर बैठा दिया था।

उनकी कुछ सफल फिल्मों के निर्माता इंद्र कुमार ने  ‘धमाल’ सीरीज की तीसरी शीघ्र रिलीज़ होने वाली कॉमेडी  फिल्म ‘टोटल धमाल’ में अनिल कपूर के साथ उन्हें इस उम्मीद में पेश किया है कि शायद कोई चमत्कार हो जाए परन्तु ट्रेलर देखकर ही कई समीक्षकों ने इस संभावना को ख़ारिज कर दिया है। मान लिया जाना चाहिए कि माधुरी दीक्षित के लिए समय गुजर चुका है।

सफल लोगों के मानस में गुजरे सुनहरे समय की स्मृतियाँ आसमानी बिजली की तरह रह-रह कर कौंधती हैं। अतीत की तालियां और उनकी एक झलक के लिए लोगों की भीड़ की यादें न मालुम उनकी कितनी राते नींद के इंतजार में जाया करती होंगी उसका हिसाब उनसे बेहतर दूसरा कोई नहीं रख सकता। सुखद स्मृतियों के दंश जब सामान्य मनुष्य को विचलित कर देते हैं तो शीर्ष से उतरे नायक की मनोस्थिति का अंदाजा ही लगाया जा सकता है। छिटक चुके लम्हों को फिर से पकड़ने की उत्कंठा उन्हें कई लेवल नीचे जाकर काम करने को मजबूर कर देती है। बकवास फिल्म का हिस्सा बनने की माधुरी की मज़बूरी को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here