शिल्पों की नगरी में फिल्मे : खजुराहो फिल्मोत्सव

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रजनीश जे जैन/

धीरे धीरे आकार ले रहे ‘अंतराष्ट्रीय खजुराहो फिल्म फेस्टिवल’ ने इस वर्ष चौथे वर्ष में प्रवेश किया है। विश्व हेरिटेज साइट खजुराहो  पर होने वाला यह अपनी तरह का पहला फिल्म समारोह है। हर वर्ष दिसंबर माह में होने वाले इस महोत्सव की निरंतरता अभिनेता निर्माता एवं सामजिक कार्यकर्ता राजा बुंदेला के अथक प्रयासों से संभव हुई है। मध्य प्रदेश जैसे केंद्र में स्थित राज्य में फिल्म निर्माण की असीम सम्भावनाओ को तलाशने का भागीरथी प्रयास है खजुराहो फिल्म महोत्सव। यह फिल्मोत्सव इस लिहाज से भी अनूठा है कि यह सीधे आम लोगों तक पहुँचने का प्रयास करता है, उनकी रोजमर्रा की समस्याओ के हल ढूंढते हुए सामजिक जनचेतना जगाने का प्रयास करता है। सात दिनों तक चले इस फिल्मोत्सव में शार्ट फिल्मो के अलावा हिंदी की लोकप्रिय फिल्मे और विदेशी फिल्मो का प्रदर्शन अस्थायी टपरा टाकिजों में आम दर्शकों के लिए निशुल्क किया गया।

‘टपरा टाकीज़’ एक ऐसी ही पहल है जो साधनहीन दर्शक को सीधे सिनेमा से जोड़ने का प्रयास करता है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय इस तरह के टाकीज़ सिनेमा को समाज के आखिरी छोर पर बैठे दर्शक के पास ले जाता है। प्राकृतिक संसाधनों और दृश्यावली से संपन्न बुंदेलखंड विकास की बाट जोह रहा है। राजा बुंदेला सिनेमा के रास्ते इस क्षेत्र को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश कर रहे है।

सौतुक से बात करते हुए उन्होंने इस बात पर अफ़सोस व्यक्त किया कि पर्यटन की असीम संभावना के बावजूद सरकारों ने इसे रेल एवं  हवाई मार्ग से उस तरह से नहीं जोड़ा है जैसी की आवश्यकता है।

राजा बुंदेला के साथ सौतुक साथी रजनीश जे जैन

यद्यपि राजा बुंदेला अपने संपर्कों और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इस हेरिटेज साइट को जनचर्चा में शामिल करने में सफल रहे है। एक अन्य प्रश्न के जवाब में वे बताते है कि सिनेमा को सिंगल स्क्रीन की और लौटना ही होगा क्योंकि देश का एक बड़ा दर्शक वर्ग मल्टीप्लेक्स के टिकिट नहीं खरीद सकता है। एक   सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि सिनेमा से गाँव लगभग लुप्त हो चुके है, वे अपने  प्रयासों से सिनेमा को फिर से गाँवों की और ले जाना चाहते है।

नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी वीडियो स्ट्रीमिंग साइट के बढ़ते स्वरुप को वे समय की मांग बताते है। परन्तु इन साइट्स पर बढ़ती यौनिकता और गाली गलौज की भाषा के लिए भी चिंता जाहिर करते है। भारतीय समाज के दोहरे मापदंडों पर बात करते हुए वे कहते है कि हमने सेक्स को वर्जित बनाकर रख दिया है जिसकी वजह से यह अंतिम समय तक दिमाग में हलचल मचाये रखता है जबकि पश्चिम के लोग पच्चीस की उम्र में ही इससे ऊपर उठ जाते है यही वजह है कि नेटफ्लिक्स जैसे पोर्टल इस बात का फायदा उठाकर इसे धड़ल्ले से बेचते रहते है।

वे इस बात पर उत्साहित है कि खजुराहो फिल्मोत्सव कई शौकिया फिल्मकारों की नर्सरी बन रहा है। विदित हो कि इस फिल्मोत्सव में एक दर्जन से ज्यादा फिल्मे स्थानीय कलाकारों ने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन किया है। इन फिल्मकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए फिल्म के प्रदर्शन के बाद स्टेज पर सम्मानित भी किया जाता है।

सात दिवसीय इस चकाचौंध भरे आयोजन के समापन  में कई नामचीन लोगों की उपस्थिति रही।  विशेष रूप से  अभिनेता अनुपम खेर, राजनीतिज्ञ अमर सिंह, केंद्रीय मंत्री सुदर्शन और फिल्मकार बंसी कौल आदि ने फिल्मो को लेकर अपने अनुभव साझा किये।

इस महोत्सव की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि सभी फिल्मकार लोगों से सहजता से मिल रहे थे। आयोजकों को पुलिस प्रशासन की मदद नहीं लेना पड़ी। दो डिग्री तापमान के बावजूद पर्यटकों और स्थानीय लोगों की उत्साहपूर्वक  उपस्तिथि बताती है कि खजुराहो फिल्मोत्सव अपने उद्देश्य में  सफल रहा।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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