समय से पहले का सिनेमा- कागज़ के फूल

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

गुरु दत्त- उन्हें सिर्फ एक शब्द में परिभाषित किया जा सकता है – वर्सटाइल! बहुमुखी प्रतिभा से लबरेज। उन्हें जैसे बहुत जल्दी थी अपने अंदर बसा संसार दुनिया को दिखाने की। या जैसे उन्हें आभास था कि उनके पास समय कम है और इस थोड़े समय में ही अपना बेहतर रचकर आगे बढ़ जाना है।

बतौर कोरियोग्राफर शुरुआत करते हुए वे दो लोगों से टकराए जो उनके जीवन पर्यन्त मित्र रहने वाले थे। ये थे अभिनेता रहमान और देव आनंद! गुरुदत्त डांस डायरेक्टर होते हुए असिस्टेंट डायरेक्टर हुए फिर अभिनेता फिर लेखक फिर डायरेक्टर और फिर निर्माता। कई बार उन्होंने इनमे से कई भूमिकाए एक साथ निभाई।

हॉलीवुड फिल्मों से खासे प्रेरित गुरुदत्त ने उस समय फिल्म निर्देशन में कदम रखा था जब हॉलीवुड अपनी परंपरागत शैली को बदल रहा था। श्वेत श्याम दौर में प्रकाश और अँधेरे के संतुलित उपयोग से प्रभाव उत्पन्न कर बगैर संवाद की मदद से सिर्फ  दृश्य के माध्यम से कथानक को आगे बढ़ाने के प्रयोग किये जा रहे थे। यह सब देखते हुए गुरुदत्त को इसे आत्मसात करना ही था। यह काम उन्होंने बखूबी किया भी।

यह वह समय था जब व्यवहारिकता व्यवसाय पर भारी थी। साथ काम करने वाले लोग सिर्फ एक प्रोजेक्ट के लिए एकत्र नहीं होते थे। वे टीम बन जाया करते थे। गुरुदत्त के साथ जुड़े कैमरामैन वी के मूर्ति, लेखक अबरार अल्वी, जॉनी वाकर, वहीदा रहमान  ऐसे लोग थे जिन्हे बार बार दोहराया जाना था। ये सिनेमाई आकाश के वे सितारे थे जिन्हे गुरुदत्त के पारस स्पर्श से अपना कायाकल्प करना था।

हॉलीवुड की फिल्मों से आया नव यथार्थवाद कब गुरुदत्त के अवचेतन में घर कर गया यह उस दौर में किसी और को नहीं सिर्फ देवानंद को समझ में आया था। देव को उनकी फिल्मों में पसरे नैराश्य और उदासी से शिकायत थी। इस बात पर दोनों के बीच लंबी बहस भी हुआ करती थी।

बहरहाल सात सफल फिल्मों के बाद  गुरुदत्त अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘कागज के फूल’ (1959) बनाने जा रहे थे। यह फिल्म  बेहद मशहूर और सफल निर्माता ज्ञान मुकर्जी के जीवन पर आधारित थी। ज्ञान मुकर्जी ने सुपरहिट ‘किस्मत’ (1943) का निर्देशन किया था परंतु बाद में असफल होकर शराब के प्याले में डूब कर जीवन गँवा बैठे। गुरुदत्त ने ज्ञान मुकर्जी के सहायक के रूप में काम किया था। एक तरह से ‘कागज़ के फूल’ अपने गुरु के लिए गुरुदत्त की श्रद्धांजलि थी जिसमे गुरुदत्त के अपने यथार्थ की झलकियां भी थी।

मौजूदा वक्त के लिहाज से यह एक जोखिम भरा कथानक था जिसमे विवाहेतर संबंध कहानी के केंद्र में थे। उस समय फ़िल्मी पत्रिकाओं में गुरुदत्त और उनकी कई फिल्मों में नायिका रही वहीदा रहमान के मध्य पनप चुके प्रेम की बाते विस्तार से प्रकाशित हो रही थीं।

कागज के फूल पहली हिंदी फिल्म थी जो सिनेमा स्कोप में बनाई जा रही थी। कथानक एक फिल्म निर्देशक के चरित्र पर आधारित था जिसकी पत्नी उससे दूर जा चुकी है और उसकी नजदीकियां अपनी फिल्म की नायिका से बढ़ जाती है। फिल्म में फिल्म की नायिका वहीदा जी ही हो सकती थी और वे ही थी भी! उस दौर में वहीदा रहमान को ऐसी अभिनेत्रियों से मुकाबला करना था जो अपना बड़ा प्रशंसक वर्ग बना चुकी थी। वहीदा रहमान नूतन से कम जटिल थी, वे खुद के प्रति मीनाकुमारी से कम लापरवाह थी, न ही नरगिस की तरह वे तेजस्वी थी।  संक्षेप में कहे तो वे इन चमचमाती तारिकाओं से कम प्रतिभाशाली थी। वे ऐसे नारीत्व के गुणों से भरी थी जिनके नजदीक जाने पर स्नेही आत्मिकता का अनुभव होता है।

नायक की भूमिका के लिए दिलीप कुमार से आग्रह किया गया किन्तु वे इतनी दुखद  भूमिकाओ  में खुद को दोहरा चुके थे  कि उन्हें उदासी से बाहर आने के लिए मनोचिकित्सक की मदद लेना पड़ी थी। अंततोगत्वा गुरुदत्त ने ही  इस पात्र को जीवंत किया!

फिल्म के गीत कैफ़ी आजमी ने लिखे थे और संगीत- हमेशा की तरह सचिन देव बर्मन का था। सचिन देव इस फिल्म के लिए संगीत रचने से इंकार कर चुके थे।  वे नहीं चाहते थे कि गुरुदत्त खुद की जिंदगी को इस फिल्म में दर्शाये। उनके अनुसार यह खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।  लेकिन गुरुदत्त की मान मनुहार के बाद उन्होंने कागज़ के फूल के लिए अमर संगीत रचा।

2 जनवरी 1959 को जब यह फिल्म प्रदर्शित हुई तो इतनी बुरी तरह फ्लॉप हुई जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। दर्शक और आलोचक दोनों ने ही फिल्म को सिरे से नकार दिया था। गुरुदत्त अपनी सारी कमाई इस फिल्म में लगा चुके थे लिहाजा सतरह लाख के कर्ज में डूब गए! इस फिल्म को बनाने में गुरुदत्त ने न सिर्फ अपनी जमा पूंजी लगाईं थी वरन अपना समर्पण और जूनून भी लगा दिया था। उन्होंने सबसे पहला काम यह घोषणा कर किया कि अब वे आगे कभी किसी फिल्म का निर्देशन नहीं करेंगे!

‘कागज़ के फूल’ के बाद अगले पांच वर्षों में दो फिल्मों का निर्माण और पांच फिल्मों में अभिनय कर गुरुदत्त ने  खुद को कर्ज  मुक्त किया। लेकिन निर्देशक के रूप खारिज होने का भाव उनके मन पर मृत्यु पर्यन्त रहा।

बहुत से लोगों का मानना है कि वह असफलता ही उनकी संदेहास्पद मृत्यु (10 अक्टूबर 1964) का कारण बनी। बाद के दो दशक तक यह फिल्म डिब्बे में बंद धूल खाती रही फिर अचानक एक अंतराष्ट्रीय फिल्म समारोह में प्रदर्शन के लिए भेज दी गई। वहां जो हुआ उसने इतिहास बना दिया। विश्व  के जाने माने फिल्मकार ‘कागज़ के फूल’ के मुरीद हो चुके थे। फिल्म मास्टरपीस बन चुकी थी। एक ऐसा नगीना जिसे पत्थर मान लिया गया था। गुरुदत्त को भारत का ओर्सन वेल्स की उपाधि दे दी गई।

इसके बाद जहाँ भी विश्व सिनेमा की बात होती या कोई फ़िल्म समारोह होता इस फिल्म का  प्रदर्शन अलिखित रूप से अनिवार्य हो गया। यूरोप और एशिया के कई देशों ने भारत सरकार से इस फिल्म के प्रिंट खरीदने की गुजारिश आरंभ कर दी। आज दुनिया के जितने भी देशों में फिल्म निर्माण का अध्ययन होता है वहां इस फिल्म को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

फिल्मों के जानकार अक्सर गुरुदत्त को अपने समय से आगे का फिल्मकार कहा करते थे। अफ़सोस यह बात गुरुदत्त के गुजरने के बीस साल बाद दुनिया को समझ आई!

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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