श्रद्धांजलि: विविधता भरे जीवन के मालिक कादर खान का निधन 

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शिखा कौशिक/

अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड की फिल्मों के शौक़ीन में से भला कौन ऐसा शख्स होगा जो कादर खान के व्यक्तित्व से परिचित नहीं होगा. परदे पर कभी नकारात्मक तो कभी हंसाने की कोशिश करते कादर खान के ढेरों फैन हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के काबुल में पैदा हुए कादर खान, जब छः महीने के थे तभी उनका परिवार भारत आ गया था. कादर खान तब के बॉम्बे और अब मुंबई में पले-बढे. परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के बावजूद भी इंजिनीयरिंग के शिक्षक बने और बाद में बॉलीवुड को भी रौशन किया.

कादर खान के बारे में उनके चाहने वाले भी शायद ही यह जानते होंगे कि वे मुंबई के एम एच सबू सिद्दीक इंजिनीयरिंग कॉलेज में प्रोफेसर भी रहे और ढेर सारे सिविल इंजिनीयर भी तैयार किये.

परिवार की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के बावजूद भी इंजिनीयरिंग के शिक्षक बने और बाद में बॉलीवुड को भी रौशन किया

इन सब के बीच उन्होंने कभी अपने पहले प्यार ‘एक्टिंग’ से समझौता नहीं किया. वो बचपन से थिएटर से जुड़े रहे. एक बार उन्होंने कहा था कि वे दक्षिण मुंबई स्थित अपने घर के पास स्थित यहूदियों के कब्रिस्तान में जाकर अपने डायलाग बोलने का रियाज किया करते थे. जहां उनको सुनने वाली सिर्फ मृत आत्माएं हुआ करती थीं. एक दिन अचम्भा हुआ. उन्होंने देखा कि उन्हें कोई सुन रहा है और छिपकर सुनने वाला और कोई नहीं बल्कि बॉलीवुड का एक कलाकार निकला. नाम था अशरफ खान जिन्होंने वहीँ पर कादर खान को एक रोल का ऑफर कर दिया.

बॉलीवुड में उन्हें बड़ा ब्रेक यश चोपड़ा की 1973 में आई फिल्म दाग से मिला. लेकिन उनकी असली जोड़ी बनी मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा से. अमर अकबर  एंथोनी ‘ और मुकद्दर का सिंकंदर में खान के रोल को भला कैसे भुलाया जा सकता है. सत्तर के दशक में कादर खान ने कई बड़े हिट फ़िल्में दीं जिसमें सुहाग, शराबी, लावारिस, परवरिश इत्यादि शामिल हैं. अस्सी के दशक में उन्होंने अमिताभ बच्चन की कई फिल्मों के डायलोग लिखे जिसमें हम और अग्निपथ जैसी फ़िल्में शामिल रहीं. अपने उर्दू के ज्ञान और उतार-चढ़ाव से भरे जीवन की वजह से वह एक बेहतरीन डायलोग लेखक बनकर उभरे.

नब्बे के दशक में कादर खान ने लोगों को हंसाने की जिम्मेदारी संभाली. यह डेविड धवन मार्का फिल्मों का दौर था. जिसमें कई नकारात्मक भूमिका करने वाले किरदार जैसे सदाशिव अमरापुरकर, शक्ति  कपूर इत्यादि भी कॉमेडी करते नज़र आने लगे. कादर खान की इन हंसाने वाली फिल्मों में ‘कुली नम्बर वन, ‘दुल्हे राजा’ जैसी फिल्मों को याद कर सकते हैं. उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर में 300 फिल्में की और 250 से अधिक फिल्मों के लिए संवाद लिखे

कहते हैं कि कादर खान ने फिल्मों में काम करना छोड़ने के बाद उन्होंने इस्लामिक शिक्षा दीक्षा में रूचि लेनी शुरू कर दी थी. लागातार बीमार रहने और फिर घुटनों की सर्जरी के बाद उनका रुझान दर्शन की तरफ हो गया था. आज इस विविधता भरे जीवन के मालिक कादर खान का कनाडा के एक अस्पताल में निधन हो गया.

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