जोकर के बनने की कहानी!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

अमूमन सभी यह मानकर चलते है कि जोकर का चरित्र मनोरंजन के लिए ही होता है। सर्कस के स्वर्णिम दौर में शायद ही कोई बचा हो जिसने जोकर की ऊलजलूल हरकतों पर ठहाका न  लगाया हो! सत्रहवीं शताब्दी में ताश के पत्तों में जगह बनाने वाला पात्र शेक्सपियर के नाटकों में विदूषक के रूप में प्रस्तुत हुआ है। हम कभी यह जानने की कोशिश नहीं करते  कि अजीबोगरीब परंतु लुभावना रूप धरा यह व्यक्ति अपने तमाम भावो, अभावों को कितनी कठिनाई से  छुपा कर  हमारे चेहरे पर हंसी लाने में सफल हो पाता है!

सत्तर के दशक की शुरुआत में राजकपूर ने जीवन की दार्शनिकता को अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के केंद्रीय पात्र जोकर के  माध्यम से दुनिया के सामने रखा था। सच्चाई और सादगी से भरा राजू जोकर आज भी उन लोगो का प्रतिनिधित्व करता है जो निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करते है। हिंदी फिल्म इतिहास की सबसे लम्बी अवधि की यह फिल्म सर्कस के खेल को जीवन से जोड़कर देखती है। तीन घंटे चलने वाला सर्कस दरअसल जीवन के तीन पड़ाव बचपन, जवानी और बुढ़ापा  के प्रतिक  के माध्यम से फिल्म में दर्शाया गया था। यह फिल्म उस समय बना दी गई थी जब दर्शक का मानस इस तरह के दर्शन को  झेलने के लिए तैयार नहीं हुआ था, लिहाजा बुरी तरह असफल हुई। परिणाम स्वरुप राजकपूर  भारी कर्ज से दब गए और उनका प्रसिद्ध  ‘आर के स्टूडियो’ रेहन रखना पड़ा।

यद्यपि अस्सी के दशक में इसे पुनः प्रदर्शित किया गया तब जाकर  दर्शकों को महसूस हुआ कि वे एक क्लासिक को नकार रहे थे। अपनी दूसरी रिलीज़ में फिल्म सफल हुई। मेरा नाम जोकर ने भारत ही नहीं वरन सोवियत रूस में भी अपार  लोकप्रियता हासिल की। राजकपूर  के  जोकर ने अपनी मासूमियत से हर उम्र के दर्शक के मन पर अमिट छाप छोड़ी।

इन दिनों जोकर एक  बार फिर चर्चा में है। इस बार इसी नाम से बनी हॉलीवुड फिल्म दुनिया भर में अपने केंद्रीय पात्र जोकर की वजह से बॉक्स ऑफिस पर धन बरसा रही है। यह फिल्म लगभग सभी प्लेटफॉर्म पर समालोचको और दर्शकों की तीखी प्रतिक्रिया का भी सामना कर रही है। 2005 में आई क्रिस्टोफर नोलन की कॉमिक बुक की तर्ज पर बनी ‘डार्क नाईट’ में नायक बेटमेन के सामने अजीबोगरीब खलनायक नजर आता है – जोकर!

जोकर के नैसर्गिक लक्षणों से ठीक उलट   हिंसक, हत्यारा, क्रूर, अमानवीय चरित्र। इस फंतासी फिल्म ने जोकर के खल पात्र को नायक के बराबर ला खड़ा किया। चतुराई, ताकत और दुस्साहस में कई बार वह नायक से बीस साबित होता है। आस्ट्रेलियन अभिनेता हीथ लेजर ने जोकर के पात्र को  इस तरह जीवंत किया कि वह नायक क्रिश्चियन बेले से ज्यादा सराहा गया।

वार्नर ब्रदर्स द्वारा निर्मित ‘जोकर’ ‘डार्क नाईट’ से भी पहले की कहानी कहती है – जोकर के बनने की कहानी! नायक आर्थर फ्लेक एक स्टैंड अप कॉमेडियन है जो कई तरह की मानसिक बीमारियों से जूझ रहा है।  इन परेशानियों के साथ उसे अपनी बीमार माँ की देखभाल भी करनी होती है। कथानक अस्सी के दशक का है। प्यार का अभाव, बुरे अनुभव और सहानुभूति की कमी एक बीमार व्यक्ति को किस तरह एक पागल हत्यारे में बदल देती है, फिल्म इस पहलु को पकड़ कर जोकर की मानसिकता से परिचय कराती है।

स्मरण कीजिए मेरा नाम जोकर का जोकर भी था जो लगभग इसी तरह के अनुभवों से गुजरकर खुद को बिखरने से बचाये रखता है। खुद रोता है परंतु लोगों को हंसाता है। जोकर की भूमिका के लिए  अभिनेता जोक्विन फीनिक्स और निर्देशक टॉड फिलिप्स को आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है। वैसे  जोक्विन फीनिक्स को  दर्शक ‘ ग्लैडिएटर’ (2000) के क्रूर खलनायक के रूप में आज भी याद करते है।

1989 में संगीतम श्रीनिवास ने कमल हासन निर्मित ‘अपूर्व सगोधरागल’ का निर्देशन किया था। इस फिल्म में कमल हासन तिहरी भूमिका में नजर आये थे। हिंदी दर्शकों के लिए इसे ‘अप्पू राजा’ के नाम से डब किया गया था। कई सालों तक इस बात पर कौतुहल बना रहा था कि कमल हासन ने बौने की भूमिका कैसे की होगी। कमल हासन अभिनीत बौना जोकर अपने परिवार के दुश्मनों का बहुत ही हिंसक तरीके से अंत करता है, ठीक हॉलीवुड के ताजा जोकर की तरह!

जब जोकर की इतनी बात हो रही है तो अक्षय कुमार सोनाक्षी सिन्हा  की फिल्म ‘जोकर’ (2012) का भी जिक्र होना चाहिए। इस फिल्म का नाम ही जोकर था परन्तु इसमें कोई जोकर नहीं था। इस फिल्म को शिरीष कुंदर ने निर्देशित किया था। यह ‘जोकर’ अक्षय कुमार की महानतम फ्लॉप फिल्मों में पहले स्थान पर आती है।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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