“सिनेमा के दर्शक के रूप में मैं एक महीने अपनी उम्र से छोटा हूँ”

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आजतक से साभार

विनोद कुमार शुक्ल रचनाकार की परिभाषा हैं.भाषा के भीतर उन्होंने पहले अपनी भाषा रची जो अनूठी है और सिर्फ उन्हीं की भाषा है.  भाषाई समुद्र के तैराक वि. कु.श. को प्रकाश स्तंभ की तरह देखते हैं. वो अपनी ईजाद की गई भाषा में कवि हैं, उपन्यासकार हैं, कथाकार हैं और इसे कौन नहीं जानता? लेकिन प्रस्तुत इस साक्षत्कार में इनके उस पहलू को जानने समझने को मिलता है जहाँ ये सिनेमा के बारे में बताते हैं.  उनसे बात किया है  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक पी एस मलतियार  ने जो  थिएटर डिजाईन  में विशेषज्ञता रखते हैं. मलतियार विख्यात  मंगनियार सेडेक्सन  और दूसरी  नाट्य प्रस्तुतियों के साथ इटली, फ्रांस, जर्मनी , लन्दन, अमेरिका, पोलैंड और कई अन्य देशों की यात्रा कर चुकें हैं. 

सिनेमा का साथ मेरे जन्म से जुड़ा है. और मैं सिनेमा के साथ ही बड़ा हुआ. राजनाँदगाँव मेरा जन्म स्थान है. जिस दिन मेरा जन्म हुआ, घर के सामने कृष्णा टाकीज का उद्घाटन हुआ था. नाँदगाँव की यह पहली टाकीज थी. महीने भर अम्मा सौर में रही होंगी, फिर वे सिनेमा देखने जरूर गई होंगी. और महीने भर का मैं भी उनकी गोद में रहा होऊंगा. इसलिए मैं मानता हूँ कि मेरी उम्र से सिनेमा का दर्शक मैं एक महीने छोटा हूँ. कृष्णा टाकीज खुलवाने में हमारे परिवार का भी हाथ था. पूरे परिवार को सिनेमा कभी भी आने-जाने की छूट थी. घर से सिनेमा आते जाते रहते. सिनेमा देखते-देखते कुर्सी पर सो भी जाते थे. काम करने वाली फुलेसर दाई आती और उठाकर घर पहुँचा देती या खबर देने पर गेटकीपर ढूँढकर हमको घर पहुँचा देता.

किशोर साहू की फिल्म ‘नदिया के पार’ को मेरे चचेरे बड़े भाई देवीप्रसाद ने पच्चीस बार देखा था.

पी एस मलतियार
पी एस मलतियार

सिनेमा का जहाँ पर्दा होता है. वहाँ मंच बना होता है. हम लोगों के लेटकर फिल्म देखने की वह जगह थी. जब गाना होता तो दर्शकों की तरफ से सिक्के भी फेंके जाते. सिक्कों से बचते भी थे कि चोट लग जायेगी. सिनेमा मालिक की तरफ से सिक्के फेंकने की मनाही होती थी, तब भी एकन्नी, दुकन्नी, चवन्नी लोग फेंकते.

किशोर साहू नाँदगाँव के स्टेट हाईस्कूल में पढ़े. उनका बचपना, नाँदगाँव और नाँदगाँव के पास तुमसर, भंडारा, गोंदिया में बीता. किशोर साहू के मामा नाँदगाँव में रहते थे. मेरे छोटे चाचा के घर के सामने बलदेवबाग में उनका भी घर था. किशोर साहू ने उन दिनों की याद में यह फिल्म बनाई थी. दिलीप कुमार, कामनी कौशल की फिल्म थी.

जाहिर है कि दिलीप कुमार आपके फेवरेट हीरो होंगे?

हाँ! हाँ!! दिलीप कुमार तो सभी के हीरो थे. मैं दो दुनिया में बड़ा हो रहा था. एक तो दुनियादारी की दुनिया में और घर के सामने कृष्णाटाकीज की दुनिया में. रात के दूसरे शो में तो एक-एक डायलॉग हम लोग सुन सकते थे. हमारी बातचीत की आवाज़ में सिनेमा के डायलॉग सुनाई देने से जैसे शामिल हो जाते थे. और ध्यान उस तरफ चला जाता था. हमारे बड़े होने में फिल्म की दुनिया का असर शामिल था. फिल्म के गाने गुनगुनाया करते, खेल में फियरलेस नादिया की तरह लकड़ी को तलवार बनाकर लड़ाई का खेल खेलते.

जैसे ये दो संसार हो गया एक तो घर का संसार जहां ग्लैमर ना के बराबर होता है और एक सिनेमा का संसार है जिसमें आवाज़ आती है. जिसको बचपन से देखा है. तो इन संसारों की टकराहटों को आपने महसूस किया कभी?

जी हॉं…बहुत ज्यादा टकराहट थी. सिनेमा का इतना असर होता था कि हम अपने असलियत को भूल जाते थे. हमको लगता था कि सिनेमा हमको जो दिखा रहा है दरअसल वही सभ्यता है और ये हमको एक सभ्यता की तरह अपनी ओर आकर्षित करती है और उसका एक ग्लैमर तो होता ही था. सिनेमा का असर इस तरह का होता था जैसे कि अगर घर में परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती तो सिनेमा के मृत्यु के सीन की याद आती, यह तुलनात्मक होता.

हमारे शोक और खुशियों को सिनेमा बदल रहा था?

जी हाँ..स्वाभाविक तौर से बदल रहा था. हमारा जो रोना होता था. जो वास्तविक हमारा रोना होता था, अपने आप थोड़ा-थोड़ा सिनेमा के असर से उसी तरह का ढलने लग जाता था. ऐसा होता था कि दूसरे हमें देखते होंगे तो कैसे देखते होंगे. ये बहुत बड़ी बात होती थी. एक अज्ञात कैमरा रहता था कि दूसरे हमें देख रहें हैं. हम उसी दृष्टि से देखते थे कि जैसे हम सिनेमा को देख रहे हों और हमें हर बार यही लगता था कि हमें भी कोई कैमरे से देख रहा है. तो क्यों न हम उसी तरह से अपने आप को दिखायें जिस तरह से सिनेमा दिखा रहा है. और ये बहुत ही अनायास होता था.

मैं इतना आकर्षित था सिनेमा से कि अगर किसी फिल्म में बहुत अच्छे गाने होते थे. जैसे सहगल, तलद महमूद का कोई गाना या मोहम्मद रफ़ी का कोई गाना या फिल्म ‘नदिया के पार’ का कोई गाना है. तो मैं जब दर्शक के रूप में जाता था वहाँ सिनेमा हॉल में, तो मैं अपने पड़ोस के दर्शक को ये देख लेता था कि उसके हाथ में घड़ी है कि नहीं. तो मैं उसके पास में बैठ जाता था और जब मेरे मनपसंद का कोई गाना आता था तो उससे पूछता था कि भईया कितना बजा है. तो वो मुझे बता देता था कि इतना बजा है. तो उस गाने को सुनने के लिए ठीक उसी समय जो एग्ज़िट का दरवाज़ा होता था, जो बाहर निकलने का दरवाज़ा होता था. प्रवेश का दरवाज़ा दूसरा होता था और बाहर निकलने का दरवाज़ा दूसरा होता था. तो एग्ज़िट के दरवाज़े के सीढ़ी पर जो खाली होती थी, वहाँ कोई नहीं होता था. तो जब-तब जाकर के मैं बैठ जाता.

अनमोल घड़ी फिल्म आई थी. उसके गाने मुझे बहुत अच्छे लगते थे. और गाने की किताब एक-एक आना, दो-दो आने में बिका करती थी. टाकिज के सामने बिका करती थी. और जो गाने, जिन फिल्मों के गाने अच्छे लगा करते थे उनको गुनगनाने के लिए खरीद लिया करते थे.

आपने कभी किसी थ्योरी से बंध कर ना बात की है और ना ही लिखा है. लेकिन बहुत सारी ऐसी थ्योरीज़ हैं जो ये बोलती हैं कि ये जो कल्चर हम पर प्रक्षेपित किया जा रहा है इससे भी एक वर्चस्व क्रियेट करने की टेक्निक के रूप में प्रक्षेपित किया जा रहा है चाहे वह सिनेमा हो या दूसरा मीडिया हो.

वर्चस्व कौन करेगा?  वर्चस्व करने वाला कौन है? इसका एक ही मकसद होता था. फिल्म जो है, चलचित्र जो है वो अद्भुत है. वो लोगों को आकर्षित करता है और करेगा. और मेरा ख्याल कि उस तरह का कोई कारण नहीं है.

नौकर की कमीज का एक दृश्य

आपके नॉवेल ‘‘नौकर की कमीज’’ के साथ फिल्म में मणिकौल ने न्याय किया या वो एक स्वतंत्र सिनेमा था?

चाहे वो फिल्म हो वो एक प्रकार की नई रचना है. अगर एक अनुवादक कोई अनुवाद करता है, उसमें बीच-बीच में, अपनी समझ से, अपने कारणों से चाहे वो जो भी कारण हो उस अनुवाद को हूबहू नहीं कर पाता और करना भी बहुत मुश्किल है.

मन में जब कोई विचार आता है तो उसका दृश्य पहले आता है, भाषा तो बहुत बाद में आती है. तो जो दृश्य मुझे दिखाई देती है उसे मैं भाषा के रूप में अंकित करना शुरू कर देता हॅू. जैसे कोई सामने बैठा है मेरे या किसी चित्रकार के सामने और चित्रकार जो है किसी दृश्य को देखकर, किसी घटना को देखकर वो ब्रश से तस्वीर बनाता है या फिर कोई जो है फिल्म बनाता है, फिल्म को ये मानकर  चलना चाहिए कि ये उसी की रचना है. उसमें न्याय-अन्याय जैसा नहीं देखना चाहिए. फिल्म बनाने वालों को स्वतंत्र छोड देना चाहिए और इस तरीके का, आलोचना का जो तरीका है कि उसने न्याय किया कि नही, सही नहीं है.

स्क्रिप्ट और जो डायलाग हैं वो तो सिनेमा का हिस्सा ही है. और अगर वो आपकी रचना है तो सिनेमा को उसके एकार्डिग होना चाहिए कि नहीं?  रचना से स्वतंत्र तो सिनेमा नहीं हो सकता. अगर स्क्रिप्ट के रूप में नौकर की कमीज को चुना गया है और उपन्यासकार की भी तो अपनी कल्पना है जो उसने लिखने से पहले जो दृश्य, विजुअल देखे हैं और सिनेमा वालों ने जो विजुअल क्रिएट किये हैं उसके बारे में क्या कहेंगे ?

मणिकौल ने मुझे हिन्दी की स्क्रिप्ट लिखने को कहा. अंग्रेज़ी की स्क्रिप्ट उन्होंने स्वयं लिखी थी. सिनेमा की एक भाषा होती है. एक दृश्य को किस तरह से बनाया जाता है, दृश्य में किस तरीके से बदला जाता है.

अंग्रेजी में स्क्रिप्ट लिखते वक्त मणिकौल की मुझसे बात होती रहती थी.

चूंकि मेरे सारे उपन्यास दृश्यात्मक हैं ऐसा मुझे लगता है. मैंने जो कुछ भी लिखा है चाहे वह कविता हो चाहे वह उपन्यास हो उसमें एक दृश्य जैसा बनता तो जरूर है. तो उस दृश्यात्मकता की वजह से संभवत: मणिकौल को ऐसा लगा हो कि ‘नौकर की कमीज़’ पर एक फिल्म बनाए. अंग्रेज़ी में लिखने में उन्होंने पहले स्क्रिप्ट लिखी. उसके बाद में उन्होंने मुझको कहा कि अब आपको हिन्दी में लिखना है लेकिन जैसा मैंने लिखा है वैसा नहीं लिखना है. आप अपनी तरफ से कुछ जोड़ने और घटाने के लिए स्वतंत्र हैं. जो मैंने किया. बहुत ज्यादा तो नहीं किया पर अपनी तरफ से किया. उसके बाद वह स्क्रिप्ट लिखी गई. बल्कि नौकर की कमीज उपन्यास में जो दृश्य नहीं थे मैंने दूसरे अलग से दृश्य जो सिनेमा की जरूरत, अपनी जरूरत के हिसाब से नये दृश्य भी जोडे. क्योंकि एक रचनाकार की रचना कभी पूरी नहीं हो सकती. उसके हाथ में जब स्वयं की रचना आती है तो पुनः रचनाकार उस रचना की घटनाओं से जूझना शुरू कर देता है एक रचनाकार की हैसियत से और जब भी रचना उसके पास आएगी वो रचनाकर बार-बार अपनी तरफ से उसे ठीक करने की कोशिश करेगा. कोई रचना कभी पूरी तरह ठीक नहीं होती और कोई रचनाकार अपनी सबसे अच्छी रचना कभी नहीं लिख पाता. वो केवल इसलिए लिखता है कि कुछ लिखना चाहता है. अगर ऐसा ना होता तो शायद वो नहीं लिखता.

 

 

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