रौशनी के दायरे से बाहर एक फिल्मकार!

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फिल्म 'जो जीता वही सिकंदर' का एक दृश्य

रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

बॉलीवुड में औसतन एक फिल्म रोजाना ही रिलीज़ होती है, किसी फिल्म के रीमेक बनाने पर बात होती है, कहीं किसी कहानी के राइट्स ख़रीदे जाते हैं, कोई अभिनेता नई फिल्म साइन कर रहा होता है, कहीं कोई किसी फिल्म  को छोड़ रहा होता है, कहीं किसी फाइव स्टार होटल में किसी फिल्म का  पोस्टर जारी हो रहा होता है तो कहीं किसी साइट पर फिल्म का टीज़र नुमाया किया जा रहा होता है तो कहीं किसी फिल्म का संगीत धूम-धड़ाके से लाने की घोषणा की जा रही होती है। इन सबके बीच सितारों के ‘पब्लिक इवेंट’ भी हो रहे होते हैं। देर रात तक चलने वाली पार्टियाँ भी होती ही हैं। लब्बो-लुआब यह है कि यह इंडस्ट्री रोज नई खबरें बनाती है। खबरें जो देश भर के अखबारों और टेलीविज़न चैनल्स का पेट भरती हैं। खबरें उन्हीं की बनती हैं जो रौशनी के दायरे में आते हैं- दायरे से बाहर छूट जाने वालों पर भला कहाँ किसी की तव्वज्जो जाएगी!

यहाँ एक ऐसे फिल्मकार की बात करना आवश्यक है जिनकी पहली ही फिल्म से धमाकेदार आमद हुई थी और माना गया था कि वे अपने चर्चित पिता की तरह लोकप्रियता की पायदान चढ़ेंगे, वे सफल भी हुए परन्तु आज वे इस चकाचौंध रौशनी से बाहर है। उनके बारे में अब शायद ही कोई बात करता है।

ये फिल्मकार हैं मंसूर खान – मशहूर निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन के पुत्र और आमिर खान के चचेरे भाई। मंसूर खान ने 1988 में ‘क़यामत से क़यामत तक’ निर्देशित की थी। इस पहली ही फिल्म की सफलता ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्म फेयर अवार्ड दिला दिया था। फिल्म की सफलता ने बॉलीवुड को भी प्रेरित किया और उसके बाद बॉलीवुड में ‘म्यूजिकल रोमांटिक’ फिल्मों का दौर आरम्भ हुआ। मंसूर की अगली फिल्में कुछ वर्षों के अंतराल पर आती रहीं और अपनी छाप छोड़ती रहीं। सन् 1992 में आई ‘जो जीता वो ही  सिकंदर’ और 1995 में ‘अकेले हम अकेले तुम’ जैसी अच्छी और संगीतमयी फिल्में आज भी देखी सराही जाती हैं।

रचनात्मक लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत होती है कि वे दिल की बात पहले सुनते हैं, दिमाग की बाद में। बस यहीं कहीं उनमें एक बैरागी भाव पैदा होना आरम्भ हो जाता है। दुनिया की चकाचौंध उनमे आसक्ति के भाव नहीं जगाती। बिलकुल गुरुदत्त की तरह वे ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो? के मोड़ पर खुद को खड़ा पाते हैं। फिर वे अपना रास्ता बदल लेते हैं। वे अपने वर्तमान से पलायन कर जाते हैं।  गुरुदत्त और अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने इस वैराग्य के चलते मौत को गले लगाया – मंसूर खान ने प्रकृति को!

फ़िल्मकार मंसूर खान कूनूर में अपने परिवार के साथ

वर्ष 2004 में इस फिल्मकार ने तमिलनाडु की नीलगिरि पहाड़ी के तल में बसे छोटे से कस्बे ‘कूनूर’ को अपना घर बनाया। सात एकड़ जमीन, सात गायें और दो बकरियों के साथ उन्होंने प्रकृति के बीच अपनी नयी शुरुआत कर ली। कभी लाखों में बात करने वाले मंसूर आज अपनी गायों के दूध से पनीर बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। एक फिल्मकार पूरी तरह से पर्यावरणवादी बन गया है।

मनुष्य के असीमित उपभोग और धरती के सीमित संसाधनों के बीच बढ़ते अन्तर के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए मंसूर ने देश भर में यात्राए की हैं। लेक्चर, गोष्ठियों, सेमीनार के माध्यम से वे देशभर के सैंकड़ों स्कूलों और कार्यशालाओं में अपनी बात रख चुके हैं।अन्य चिंतकों की तरह मंसूर का भी मानना है कि  बढ़ता भौतिकवाद विकास के लिहाज से श्रेष्ठ है परन्तु संसाधनों के क्रूर दोहन का कारण भी है।

अपनी यात्राओं और व्याख्यानों के अनुभवों को उन्होंने एक  किताब की शक्ल दी है: द थर्ड कर्व। इस किताब में वे सिद्ध करते है कि विकास के पहिये को एक दिन आगे जाने की जगह नहीं मिलेगी तब क्या होगा? पृथ्वी के गर्भ में करोड़ों साल में बना कीमती संसाधन पेट्रोल महज बीते ढेड़ सौ वर्षों  में आधा समाप्त हो गया है।

साल 2008 में आई आर्थिक सुनामी से ध्वस्त वैश्विक बाजारों की हालत मंसूर खान की चिंता को सही ठहराती है। अपनी बात स्पष्ट करने के लिए वे उदहारण देते हैं कि उपभोग और भौतिकता के लिहाज से मनुष्य समाज इस समय वक्र के शीर्ष पर पहुँच गया है। विकास के नाम पर हम हमेशा फैलाव नहीं कर सकते , एक बिंदु के बाद विकास सिर्फ भ्रम रह जाता है और उसे सिकुड़ना ही होता है !

किसी सेलेब्रिटी का लाइम लाइट से बाहर रहना साहस की बात है।  फिलवक्त यह फिल्मकार ख़बरों से दूर प्रकृति को सहेजने का अभियान चला रहा है, जलवायु परिवर्तन के खतरों और अर्थव्यवस्था पर उसके परिणामों के असर पर बात कर रहा है।

 

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