होली फिश- आपके हमारे बीच का सिनेमा बहुत जल्दी सामने होगा

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उमंग कुमार/

मुंबई में पिछले सप्ताह ‘दी होलीफिश’ नाम की एक फिल्म की स्क्रीनिंग हुई. क्राउड फंडिंग वगैरह की मदद से बनी इस फिल्म से काफी उम्मीदें हैं.

इस फिल्म के कांसेप्ट में एक सेवानिवृत शिक्षक है जिनका नाम परशुराम है. मृत्यु को लगभग करीब से महसूस कर बच जाने वाले परशुराम इस बार खुद को एक मौका और देना चाहते हैं. इस बार एक अच्छे मृत्यु के आस में. मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं जो हिन्दू धर्म के अनुसार एक इंसान का परम उद्देश्य है.

मोक्षप्राप्ति के लिए परशुराम लोककथाओं में सुनी किसी सुनहरी मछली को पाना चाहते हैं जिसके बारे में कहा जाता है कि उस मछली से मांगने पर सबसे बड़ी मुराद पूरी होती है.
इसके लिए वह इलाहबाद के संगम पर लगने वाले महाकुम्भ से अपनी तलाश शुरू करते हैं. महाकुम्भ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है. इस जनसैलाब में परशुराम को नए नए अनुभव होते हैं. आस्था और धार्मिक व्यवसाय के विभिन्न चेहरे देखने को मिलते हैं.

आखिरकार उनकी मुलाक़ात एक पुजारी और उसके मल्लाह दोस्त से होती है. पुजारी का नाम है दया पांडा और मल्लाह का नाम है जीतू. परशुराम इनलोगों से अपनी इच्छा और अब तक की यात्रा के बारे में बताते हैं.

जीतू परशुराम के बेचैनी को सूंघ लेता है और इसे पैसा बनाने के मौके के तौर पर देखता है. वह पुजारी को भी अपने साथ शामिल करना चाहता है. वह पुजारी अब तक एक ईमानदार जीवन जी रहा होता है लेकिन उसका वर्तमान आर्थिक तंगी में हैं.
उस सुनहरी मछली को उपलब्ध कराने के नाम पर जीतू उस पुजारी को मछली को पाने की एक झूठी प्रक्रिया में उलझाते हैं. शुरूआती आनाकानी के बाद, दया जीतू के सुझाव मान लेता है और वो सब कर्मकांड करने को तैयार हो जाता है. दोनों उस सुनहरी मछली को पाने के नाम पर पूजा-पाठ शुरू करते हैं.
वो परशुराम को यह भी समझा देते हैं कि वह रहस्यमयी मछली उसी को मिलेगी जिसकी आत्मा एकदम शुद्ध हो. उनके ऐसा करने का उद्देश्य बस यही होता है कि जब सुनहरी मछली नहीं मिलेगी तो दोष परशुराम पर ही थोपा जाएगा कि उन्ही के मन में छल-कपट है.

परशुराम खुद को इन दोनों के हवाले कर देते हैं और ये लोग जो जो कहते हैं उसका अनुसरण करते हैं. अजीबोगरीब कर्मकांड करने के बाद, परशुराम ही नहीं बल्कि दया को भी ऐसी सच्चाई का सामना करना पड़ता है जिसके बारे में उसने सोचा तक नहीं था..

इस फिल्म का निर्देशन दो लोगों ने किया है विमल चन्द्र पाण्डेय और संदीप. लेखन भी इन्ही दोनों का है. इनके अतिरिक्त इस फिल्म में लगभग 50 लोगों ने काम किया है.

इस फिल्म की ख़ास बात है नए तरीके से शूटिंग. इसकी शूटिंग पिछले साल के माघ मेले में की गई मतलब 2016 का पूरा फरवरी और मार्च का पहला हफ्ता.
वास्तविक लोकेशन पर शूटिंग के दौरान पूरी टीम उसी महाकुम्भ में सामान्य धार्मिक लोगों की तरह मेले में ही कल्पवासियों की तरह एक तंबू में रह रही थी. फिल्म की पूरी शूटिंग 40 दिनों की थी. इसमें से कुम्भ मेले में करीब 30 दिन और चित्रकूट के गांवों गौरिया और कौबरा में करीब 10 दिन की शूटिंग हुई.
इस फिल्म में दर्शकों को महाकुम्भ का वास्तविक दृश्य महसूस करने को मिलेगा.

कम बजट और भव्य लोकेशन पर शूट की गई इस फिल्म को बनाने में दिक्कत तो लाजिमी है. और शायद यही वजह इस फिल्म को और महत्वपूर्ण बनाती है. जहां लोकेशन भी वास्तविक और किरदार में मेले में आये सारे लोग शामिल हैं.

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