भारतीय कलाकार और हॉलीवुड: इधर कुछ उधर कुछ

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

कंगना रनावत ने एक ऐसी बात उठाई है  जिस पर अमूमन फिल्म इंडस्ट्री के लोग चुप्पी साधे रहते हैं। एक साक्षात्कार में कंगना ने कहा कि हॉलीवुड अपनी फिल्मों में भारतीय अभिनेताओं को दोयम दर्जे की भूमिकाओं में उतारकर अपना आर्थिक हित साधता है। एक हद तक वे सच कह रही थी। हॉलीवुड फिल्मों में सितारा हैसियत हासिल करने वाले पहले भारतीय साबू दस्तगीर से लेकर इरफ़ान खान तक के अमेरिकन फिल्मों में निभाए किरदारों पर नजर दौड़ाने से कंगना की बात और स्पष्ट हो जाती है।

साबू दस्तगीर मैसूर राज्य में एक महावत के पुत्र थे। एक हाथी की सवारी करते हुए उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता की नजर पड़ी और वे उन्हें अपने साथ अमेरिका ले गए। सन चालीस से लेकर साठ तक साबू ने दो दर्जन अमेरिकी फिल्मों में काम किया परन्तु उनकी भूमिकाए केंद्रीय होने के बावजूद भी जंगल, जंगली जानवर, पगड़ी धारी भारतीय राजकुमार, अर्धनग्न राजकुमारियां, सांप सपेरों के आसपास ही गुंथी गई थी। साबू की फिल्मों से अमेरिकियों ने जो भारत देखा था उसे ही सच मान लिया। साबू के गुजरने के साठ बरस बाद आज भी अमरीकी फिल्मों में  भारतीयो को दर्शाने के लिए पगड़ीधारी व्यक्ति जरूर दिखाया जाता है।

1983 में जेम्स बांड श्रंखला की फिल्म ‘ऑक्टोपुसी’ ने दुनिया के साथ भारत में भी शानदार प्रदर्शन किया था। वजह थी इस फिल्म के एक बड़े हिस्से की शूटिंग भारत में की गई थी। इस फिल्म ने भी अमरीकियों की ‘साबू ग्रस्त’ मानसिकता को आगे ले जाने का ही काम किया था। हैंडसम लम्बे चौड़े कबीर बेदी खलनायक के बॉडी गार्ड बने नजर आये – पगड़ी धारी बॉडीगार्ड! एक और महान भारतीय टेनिस खिलाड़ी विजय अमृतराज जेम्स बांड के लिए ऑटो चालक बने नजर आये।’द लीग ऑफ़ एक्स्ट्रा आर्डिनरी जेंटलमेन’ (2003) में हमारे नसीरुद्दीन शाह कैप्टेन नीमो के रूप में शॉन कोनेरी के साथ स्क्रीन शेयर करते नजर आये, उनका पहनावा था किसी पुराने महाराजा की तरह जिसने पगड़ी धारण कर रखी है  जिसकी कमर तक लटकती लम्बी दाढ़ी है!!  2004 में आई अदभुत फिल्म ‘द डे आफ्टर टुमारो’ के ओपनिंग सीन में नायक डेनिस क्वेड दिल्ली में पर्यावरण पर एक वैश्विक कॉन्फ्रेंस को सम्बोधित करते नजर आते है जिसमे अमेरिकी उपराष्ट्रपति भी आमंत्रित है। कॉफ्रेंस ख़त्म होते ही जिस हॉल से नायक बाहर निकलता है वहां बकरियां लिए एक पगड़ीधारी व्यक्ति टेक्सी से उतर रहा होता है। एक झलक में वह व्यक्ति कैप्टेन नीमो (नसीर) का स्मरण करा देता है।

2011 में टॉम क्रूस की ‘मिशन इम्पॉसिबल- घोस्ट प्रोटोकॉल’ में अनिल कपूर के रोल को स्मरण कीजिए। एक लंपट अमीर जिसे टॉम क्रूस की गर्लफ्रेंड ही काबू कर लेती है। यह इतना वाहियात किरदार था जिसे अनिल कपूर शायद अपने नाती पोतों को कभी नहीं बताना चाहेंगे। आयवरी मर्चेंट की ब्रिटिश फिल्म ‘हीट एंड डस्ट’ में शशिकपूर, अप्रवासी भारतीय जगमोहन मूंदड़ा की ‘डिवाइन लवर्स’ में  गुलशन ग्रोवर, जैसे कुछ उदाहरण है जो बताते है कि भारतीय अभिनेताओं या लोकेशन को फिल्म में सिर्फ इसलिए शामिल किया गया था ताकि भारत में वह फिल्म अच्छा व्यवसाय कर सके!

हॉलीवुड के बड़े परदे ने भले ही इंडियन एक्टर्स को उनकी काबलियत के हिसाब से भाव नहीं दिया हो लेकिन छोटे परदे ने इस कमी को बेहतर ढंग से पूरा किया। अमेरिकी टेलीविज़न पर लोकप्रियता के कीर्तिमान बनाने वाले बहुत से धारावाहिकों में भारतीय अभिनेताओं ने न केवल अपनी छाप छोड़ी है वरन उनकी सफलता में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है। अधिकांश सिने  प्रेमियों को प्रियंका चोपड़ा के सफल धारावाहिक ‘क्वांटिकों’ की स्मृतियाँ ताजा होगी, परंतु उन अभिनेताओं की जानकारी नहीं होगी जो अमेरिकी टेलीविजन के चहेते नायक बन चुके है। ए बी सी टेलीविजन पर 2004 से लेकर 2010 तक चले धारावाहिक ‘लॉस्ट’ में भारतीय मूल के नवीन एंड्रू की भूमिका को भला कौन भूल सकता है? इसी तरह 2007 से मई 2019 तक चले ‘बिग बैंग थ्योरी’ से अगर कुणाल नायर को निकाल दिया जाए तो इस चुटीले सिटकॉम में कुछ नहीं बचेगा। दुनिया भर में लोकप्रिय हुए ‘गेम ऑफ़ थ्रोन’ के अनेको खलपात्रों में अपनी अलग पहचान बना चुकी इंद्रा वर्मा को आप आसानी से नहीं नकार सकते। कुटिल खलनायिका जो सिंहांसन के लिए किसी को भी मौत के घाट उतार सकती है, को दर्शक भुला नहीं पाएंगे। न्यूयार्क के अभिनय स्कूल से प्रशिक्षित नित्या विद्यासागर लम्बे समय से चल रहे बच्चों के कार्यक्रम में लीला बनकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी है।  ऑफबीट हिंदी फिल्म ‘लंचबॉक्स’ की नायिका निम्रत कौर को बहुचर्चित ‘होमलैंड’ सीरीज में देखना सुखद अनुभव है।

अमेरिकी फिल्मे भले ही आज भी ‘साबू सिंड्रोम’ से निकल नहीं पाई हो परंतु अमरीकी टेलीविज़न ने वास्तविकता को दर्शाया है। हमारे हॉलीवुड जाने वाले  अभिनेता कितनी ही मोटी फीस कमा कर इस बात पर कितना ही इतरा ले परंतु उनकी भूमिका इतिहास में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाएगी जो जगह भारतीय मूल के अभिनेताओं ने टेलीविजन पर बनाई है।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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