डर के साए में एक परिवार!

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अपने पिता के साथ रामसे ब्रदर्स

रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

‘जहाँ कल्पना नहीं है वहाँ भय नहीं है’ यह इकलौता कथन हॉरर फिल्मों के लोकप्रिय होने की बुनियादी जरुरत को पूरा करता है। मनुष्य के मन में उपजे अधिकांश भय उसकी बेलगाम कल्पना का परिणाम होते हैं। भय न केवल भयभीत करता है वरन आकर्षित भी करता है। फिल्मकारों ने मनुष्य की इसी कमजोरी को केंद्र में रखकर ‘भय आधारित’ फिल्मों का संसार रच दिया है। फिल्मों में रोमांस और हास्य के बाद भय सबसे ज्यादा बिकाऊ प्रोडक्ट बनकर उभरा है। सिनेमाई इतिहास की पहली डरावनी फ्रेंच  फिल्म ‘ले मेनोर डुए डायबल’ (1896) से आरंभ सिलसिला आज इक्कीसवी सदी में सबसे बिकाऊ और पसंद किया जाने वाला विषय बन चुका है। भारत में भी शुरूआती  फिल्मकारों ने थोड़ी झिझक के साथ इस जॉनर में हाथ आजमाए। 1949 में कमाल अमरोही ने पुनर्जन्म की रोमांचक कहानी ‘महल’ में दर्शकों को सिहरन महसूस कराने की कोशिश की थी। यद्यपि अशोक कुमार – मधुबाला अभिनीत यह फिल्म पूरी तरह से हॉरर की श्रेणी में नहीं आती परंतु एक बेहतरीन थ्रिलर के रूप में अवश्य याद की जाती है। यह फिल्म लता मंगेशकर को गायकी में स्थापित करते हुए उनके  करियर में भी मील का पत्थर बनी।

भारतीय सिनेमा में हॉरर फिल्मों की शुरुआत दुर्घटनावश हुई। गीत संगीत, प्रेम, तलवार बाजी, मारधाड़, डकैती, देशप्रेम, आदर्शवाद जैसे तत्वो से लबरेज शुरूआती फिल्मों में असफल हुए फिल्मकार फतेहचंद उत्तमचंद रामसिंघनीस मूलतः कराँची में रहते थे जहाँ उनकी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान थी। उनके अधिकांश ग्राहक ब्रिटिश हुआ करते थे। ब्रिटिशर्स के रेडियो सुधारते सुधारते फतेहचंद रामसिंघ का नाम घिसते घिसते रामसे हो गया और बंटवारे के बाद  बंबई में आजीविका की नई  शुरुआत उन्होंने अपने नए नाम रामसे से ही की। ‘शहीदे आजम भगत सिंह 1954′ रुस्तम सोहराब 1963’ एक नन्ही मुन्नी लड़की थी 1970  की घनघोर असफलता ने उन्हें लगभग बाजार से बाहर ही कर दिया था। अचानक एक दिन   ‘एक नन्ही मुन्नी लड़की थी’  को दर्शकों के बीच बैठकर देखते हुए उन्होंने महसूस किया कि आधी फिल्म गुजरने के बाद अचानक से खाली हाल  दर्शको से भरने लगा। परदे पर चल रहे सीन में नायक पृथ्वीराज कपूर चेहरे पर मास्क पहन कर नायिका मुमताज को डरा रहे थे! दर्शक सिर्फ दस मिनिट के इस दृश्य को देखने के लिए ही आरहे थे और ख़त्म होते ही अपनी सीट से उठकर जा रहे थे। सीनियर रामसे को अपनी ही बनाई फिल्म से  सफलता का फार्मूला मिल गया था। अगले ही वर्ष 1971 में उन्होंने भारत की पहली हॉरर फिल्म ‘दो गज जमीन के नीचे’ प्रदर्शित कर दी। इस दौर में औसत हिंदी फिल्म कम से कम पचास लाख की लागत और एक वर्ष की अवधि में बनती थी। सीनियर रामसे और उनके सात पुत्रो ने फिल्म निर्माण के लगभग सभी विभागों की जिम्मेदारी लेकर ‘दो गज जमीन के नीचे’ को महज साढ़े तीन लाख के बजट और चालीस दिन की समयावधि में पूर्ण कर रिलीज़ कर दिया! फिल्म की पब्लिसिटी आधे -आधे घंटे के रेडियो कार्यक्रमों से की गई जिसने थोड़े समय में ही सिनेमाघरों पर  ‘हाउस फूल’ का बोर्ड टांग दिया।

आज उन दिनों को याद करते है तो महसूस होता है कि रामसे ने हॉरर फिल्मों का एक फार्मूला तय कर दिया था। एक स्याह तूफानी रात, एक भटकती आत्मा वह भी एक युवा महिला की  जिसने सफ़ेद साड़ी और उसी से मैच करता ब्लाउज पहन रखा है, कमर तक लंबे   खुले बाल।  एक भुतहा महल सा मकान जिसके आसपास दूर दूर तक कोई बस्ती नहीं! एक रामु काका टाइप का चौकीदार- ये सारे बिंब नए नहीं थे।  किशोर अवस्था में घर के बड़े बूढ़ों और स्कूल में सहपाठियों से लगभग  कुछ इसी तरह की कहानियां हर पीढ़ी ने सुनी थी।  रामसे ने इन्हे छवियों में उतार कर लार्जर देन लाइफ कर दिया था।

असहज फूहड़ मेकअप, खून, खोपड़ियों, कंकालों, भुत, चुड़ैल, तांत्रिकों, सेक्स का तड़का लगी रामसे की आगामी फिल्मों ने भारत में ‘हॉरर’ की नयी श्रेणी का निर्माण कर दिया। रामसे परिवार ने लगभग 30  फिल्मो का निर्माण करते हुए फिल्म इंडस्ट्री के चर्चित परिवारो कपूर, खान, चोपड़ा की तरह खुद को स्थापित कर लिया। यद्यपि रामसे की अधिकांश फिल्मे बी ग्रेड  थी परंतु उनकी सफलता और कमाई का आंकड़ा स्थापित फिल्मकारों के मध्य भी चर्चा और ईर्ष्या का विषय बना। कुछ नहीं से शुरुआत करते हुए रामसे बंधुओ ने जो हॉरर का  साम्राज्य खड़ा किया है उसकी चर्चा हमेशा होती रहेगी। इसी वर्ष रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष ने इस परिवार पर शार्ट डॉक्यूमेंट्री ‘किंग ऑफ़ हॉरर’ प्रदर्शित की है। इस डॉक्यूमेंट्री में हॉरर, सेक्स और कॉमेडी के सटीक कॉम्बिनेशन पर विस्तार से बात की गई है। रामसे के समकालीन फिल्मकार अनुराग कश्यप, श्रीराम राघवन, असीम आहलुवालिआ एवं जेरी पिंटो रामसे की क्राफ्ट और उनकी फिल्मों के महत्व पर बात करते नजर आते है।

रामसे की फिल्मो का आकर्षण सत्तर से नब्बे के दशक तक भरपूर चला परन्तु रामगोपाल वर्मा (रात) ने हॉरर को एक नया लेवल दिया जिसके चलते रामसे बंधुओ की फिल्मों पर पकड़ कमजोर हुई और उन्होंने  टेलीविज़न की और रुख किया। 1993 से 2001 जी टीवी पर आठ साल तक चले ‘ज़ी हॉरर शो’ ने भय को दर्शक के घर तक पहुंचा दिया। भय और खौफ को टकसाल बना देने वाले फतेहचंद रामसे के जीवन पर अजय देवगन और प्रीति सिन्हा ने  बायोपिक बनाने  की घोषणा की है। भारतीय सिनेमा में एक नया  ‘कल्ट’ आरंभ करने वाले फिल्मकार के लिए निश्चय ही  यह उचित आदरांजलि  होगी।

रामसे ब्रदर्स की  फिल्मों में  ‘पुरानी हवेली’, ‘पुराना मंदिर’, ‘वीराना’, ‘तहखाना’, ‘डाक बंगला’, ‘बंद  दरवाजा’, ‘अँधेरा’, ‘सामरी’, और ‘कौन’  शामिल हैं।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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