हिरोकाजू कोरीदा-एक सिनेमाई उपन्यासकार

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अरविंद/

कविता और कहानी  में  बराबर रुचि रखने वाले अरविंद का विश्व सिनेमा के प्रति शौक और नज़र दोनों काबिलेतारीफ है. पिछले सप्ताह इन्होने  आपका परिचय ईरानी सिनेमा के बहुत कम चर्चित पर जरुरी नाम सोहराब शाहिद  से कराया था. इस बार  बता रहे हैं कि हमें विश्व सिनेमा में जरुरी हस्तक्षेप हिरोकाजू कोरीदा  की फिल्मे क्यों देखनी चाहिए.

हिरोकाजू कोरीदा अपने सिनेमा को एक उपन्यासकार की तरह बरतते हुए दिखते हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि कोरीदा अपने युवा दिनों में उपन्यासकार बनने का सपना देखते थे. तमाम पारिस्थिक उतार-चढ़ाव से भटकते हुए एक दिन उन्होंने खुद को निर्देशन की सीढ़ियों पर खड़े पाया.
अगर इनके बनाए सिनेमा की तुलना किसी से की जायेगी तो वह जापानी सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले यासुजिरो ओजू होंगे. खासकर पारिवारिक मसलों पर बनाई गई फिल्में. इसको सिनेमा देखकर बेहतर समझा जा सकता है. लेकिन प्रभाव के मामले में कोरीदा, ओजू के रास्ते न जाकर उनके समानांतर चलते दिखते हैं. जैसे बस एक याद भर आये कि ऐसे विषय-वस्तु को लेकर ओजू ने शुरुआत की थी.
अपनी बहुत सी फिल्मों में कोरीदा पारिवारिक संबंधो का बड़ा गंभीर विश्लेषण करते हैं. उनके और ओजू में अंतर यहीं से शुरू होता है. ओजू में परिस्थितयों के जटिलताओं और निर्वहन का वह संगुफन नहीं है जो कोरीदा में है. ओजू में यहाँ पर्याप्त मात्रा में करुणा मिलेगी. यहाँ तक की उनके संगीत  में भी यह देखा जा सकता है.

पारिवारिक किस्म के मसलों पर अगर विश्व सिनेमा की बात की जाए तो असगर फरहादी शीर्ष पर होंगे. लेकिन फरहादी की लगभग सभी फिल्मों में, परिवार विघटन की स्थिति में दिखता है. वे बिखराव को रेखांकित करते हैं. जबकि कोरीदा अपनी फिल्मों में स्थितियों के विरुद्ध खड़े होते मिलते हैं. ओजू और कोरीदा में एक खास किस्म का आशावाद है. जीवन के प्रति-एक विशेष किस्म का लगाव. फरहादी की फ़िल्में अक्सर बेचैनी, अकेलेपन, संत्रास और घबराहटो के साथ चलती है. जबकि कोरीदा की फिल्मे एक ठंढे तरीके से चीजों को सुलझाती हुई जाती है. हो सकता है यह उनके जापानी होने की वजह से हो.

कोरीदा की फिल्मों में दो बाते बहुत ही गौर करने लायक है-पहली है धीरता. दूसरी- एक अच्छे व्योरेकार या उपन्यासकार सा मन. धीरता वह मानसिक तंतु है जो दर्शकों से अपने प्रति अपेक्षा करता है. ज़ाहिर सी बात है कि धैर्य समय की एक अच्छी उपज है. उपन्यासकार सा होने और धैर्य- दोनों में गहरा सम्बन्ध है. यह चाक्षुष सत्य भी है कि जिन दो धैर्यवान (समय के मामले में) समकालीन निर्देशकों का उनके ऊपर प्रभाव दिखता हैं वे हैं- Tsai-Ming Liang और Hou-Hsiao Hsin. इन दो विरले किस्म के निर्देशकों की फ़िल्में जिसने भी देखी होगी उसे पता होगा कि इनकी फ़िल्में किस धीर गति से चलती हैं. इन दोनों निर्देशकों की फ़िल्में विश्व सिनेमा की धरोहर हैं.

 

लाईक फादर लाईक सन का एक दृश्य

Tsai-Ming Liang तो मेरे जानेमें सबसे लम्बे कई मिनटों के स्थिर शॉट्स के लिए जाने जाते हैं. अभी आई फिल्म स्ट्रे डॉग्स (Stray Dogs) से इस बात की अन्तिम तस्दीक हुई. ऐसे दृश्यों से आम दर्शक एक किस्म के ऊबन महसूस करते हैं. यहीं पर दर्शकों को अपने अन्दर धैर्य का एक अलग संसार बनाना पड़ता है. Hou-Hsiao Hsin उन कवि किस्म के दिलों में से हैं जो परदे पर कविता रचते हैं. ऐसे ही समकालीनों के बीच, ओजू और कोरीदा एक नई सिनेमाई गति जानते हैं और उनका इस्तेमाल करते हैं.

कोरीदा की कई फिल्में महत्वपूर्ण है. मेरे देखे जाने में सबसे महत्वपूर्ण फिल्म है- लाईक फादर लाईक सन (Like Father Like Son). इस फिल्म के बारे में बताते हुए कोरीदा ने बड़ी बात कही जो हर जगह लागू होती है. उन्होंने कहा कि हमारे समाज में ब्लड-रिलेशन का बेहद महत्व है. यह फिल्म इसी रूढ़ को चुनौती देती है.

यह सच है कि लोग ‘अपना’ होने के अर्थ को ‘अपने खून’ से आंकते हैं. यह फिल्म अपने पिता और दूसरे जिन्होंने गोद लिया हो के बीच के रिश्तों और खासकर द्वन्द को बेहद गंभीर तरीके से बताती है. यह बात कोरीदा की और भी कई फिल्मों में चली आती है. जैसे आई विश (I Wish) फिल्म में वर्षो बाद जब दादी पोती से मिलती हो तो कहती है- तुम मेरी खून हो (you are my blood)! उनकी दूसरी फिल्म आफ्टर दी स्टॉर्म (After the storm) में बुजुर्ग माँ अपने बेटे से कहती है, अपने जिंदगी को खतरे में मत डालो.. आखिर तुम ही तो मेरे एकमात्र बेटे हो (‘Don’t risk your life… you are my only son, after all)! माँ-पिता का जैविक सम्बन्ध ही क्या प्रेम का आधार है? इस वाक्य को जैसे कोरीदा इस फिल्म में चुनौती देते हैं.

आवर लिटिल सिस्टर्स का एक दृश्य

यह फिल्म उन दो बच्चों की दास्तान है जो जन्म लेते ही अस्पताल की मामूली गलती से बदल जाते हैं. जब यह बात नर्स के माध्यम से बीते वर्षों में खुलती है तो कोर्ट निर्णय देती है कि अपने-अपने बच्चे वापस ले लो. बच्चे बदल दिए जाते हैं. यहीं से शुरू होता है- माताओं, पिताओं और पुत्रों का द्वन्द.
विषय-वस्तु को उठाना साहस नहीं हैं. साहसिक कार्य है उसे निभाना. कोरीदा ने अपने अंदाज में जिस उतार-चढ़ाव जिस मोहब्बत के साथ इस फिल्म को बनाया है वह यक़ीनन काबिले-तारीफ है. कोरीदा की केवल एक प्रतिनिधि फिल्म देखनी हो तो मैं इसी फिल्म का नाम सुझाऊंगा.
इस मुद्दे पर बात हो और एक दूसरी फिल्म ‘रीबर्थ’ (Rebirth) की याद न आये, ऐसा नहीं हो सकता. यह जापानी निर्देशक Isuru Narushina की बड़ी ही महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी फिल्म है. अपने प्रेमी से बदला लेने के लिए प्रेमिका उसके बच्चों को उठा ले जाती है. प्रेम-दुलार से पालने के बाद एक दिन उसे लौटा देती है. लौटने के बाद वह जेल चली जाती है. अपनी कथा के कई स्तर और नैरेशन के कई आयामों के साथ यह फिल्म भी वर्तमान-अतीत में एक साथ प्रक्षेपित होती चलती है.

फिल्म आई विश का एक दृश्य

कोरीदा की दूसरी फिल्म है ‘आवर लिटिल सिस्टर्स’ (our little sisters). यह भी चर्चित और पुरस्कृत फिल्म है. बड़ी ही जीवंत. यह तीन, फिर बाद में चार लड़कियों के जीवन-चक्र की दास्तान है. तीन लड़कियों का जीवन एक घर में चल रहा है, जिनके पिता ने उन्हें बचपन में ही छोड़ दिया है. उम्र के पूरे होने पर अब पिता मरता है- कहीं दूर- तब तीनों लडकियां ‘अपना पिता’ होने के नाते उसके अंतिम संस्कार में शरीक होने जाती हैं. वहाँ से वे अपनी चौथी बहन के एकरस जीवन को देखते हुए उसे भी घर ले आती हैं. यह चौथी बहन दूसरी माँ से है. यह फिल्म इन चारों बहनों के संगम का अनूठा आख्यान है. आजादी, स्मृति और उपजे प्रेम के त्रिकोणीय घेरे में, जिस खूबसूरत तरीके से एक साथ अतीत-वर्तमान को संजीदगी एवं हास्य से होकर यह फिल्म निकलती है, उससे दर्शकों में रस के साथ साथ रश्क भी पैदा हो जाता है.

कोरीदा की तीसरी फिल्म भी पारिवारिक संबंधो से जुड़े विषय-वस्तु के साथ चलती है. इस फिल्म का नाम है- ‘आई विश’. यह फिल्म एक मासूम सा स्वप्न कथा बुनती है. दो बच्चे हैं. दोनों भाई हैं. दोनों अलग अलग रहते हैं. एक पिता के साथ कहीं दूर. एक माँ के साथ दूर. इन दो बालकों का एक ही स्वप्न है. सब साथ साथ रहें. माँ-पिता के साथ. इन्हें जब पता चलता है कि यहाँ से कहीं दूर एक विशेष जगह से एक बुलेट ट्रेन गुजरती है. उसी वक्त कोइ इच्छा रखी जाए तो वह इच्छा पूरी हो जाती है. वे दोनों अपने दोस्तों के साथ निकल पड़ते हैं लेकिन जब पता चलता है कि एक बच्चे ने कुछ और ही मांग लिया है तब यहाँ से कोरीदा के बड़े स्वप्न-सन्दर्भों का पता चलता है.

कोरीदा की जो चौथी फिल्म मैंने देखी, वह है ‘मबोरोसी’ (Maborosi-Phantasmic light). कोरीदा की यह फिल्म शानदार काव्यात्मक दृश्यों से भरी हुई है. यह फिल्म एक ऐसी पत्नी की कहानी है जिसका पति चोरी से अपनी आजीविका चलाता है. एक दिन वह रेल दुर्घटना में मारा जाता है. मौत का कारण स्पष्ट तो नहीं होता पर इशारा आत्महत्या की तरफ होता है. पत्नी एक बच्चे की माँ है. साथ ही गर्भवती भी. वह दूसरी शादी करती है. परन्तु तमाम कमी-बेशी के साथ उसका जीवन वही निकलता है जो पहले था.

कोरीदा की यह फिल्म सन्नाटों और चुप्पियों और घोर अकेलेपन से लिपटी हुई कथा है. एक काव्य संसार की तरह यह कथा रूपकों और उपमाओं में चलती है. दृश्यांकन की नज़र से यह अति महत्वपूर्ण फिल्म हैं.

आफ्टर द स्टॉर्म का एक दृश्य

कोरीदा की फिल्म ‘आफ्टर द स्टॉर्म थोड़ी उनकी पहचानी लीक से हटकर है. इसमें कॉमेडी का पुट भी है. लेकिन कोरीदा ने किसी भी फिल्म में खुद को दोहराव से बचाया है.  इसका विषय-वस्तु भी अलग हो चुके पति-पत्नी ही है. पति उपन्यासकार है. पत्नी छोटी सी नौकरी करती है. एक बच्चे के साथ अलग रहती है. एक रात जब तूफ़ान आता है तो पत्नी अपने पति के घर पर रुक जाती है. वहीँ पर उस तूफानी रात में कुछ ऐसा होता है कि पति-पत्नी का अलगाता रिश्ता सम पर आता है.

कोरीदा अपनी फिल्मों में अंत का सफल चुनाव करते हैं. शुरुआत, उतार-चढ़ाव और अंत को मापा जाए तो सबका ठीक-ठीक अनुपात चीजों को क्लासिक दर्जे में ले जाता है. उनकी सभी फिल्मों के साथ इस फिल्म की  भी यही विशेषता है.

अब कुल मिलाकर अंत में यही कहना होगा कि कोरीदा जापानी सिनेमा के एक सज्जन पुरुष (Gentle Man) हैं. जिसका स्वप्न परिवार की नींव पर ईंट की तरह पड़ता है. और जब भी घर-परिवार की बात सिनेमा में उठेगी, कोरीदा को याद किये बिना नहीं रहा जा सकेगा.

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