सुना है तेरी महफिल में रतजगा है !

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कागज़ के फूल फिल्म का एक दृश्य

अम्बुज पाण्डेय/

गुरूदत्त हिन्दी सिनेमा के उन गिने-चुने लोगों में हैं,जिन पर बहुत लिखा और पढ़ा गया है।बावजूद इसके हर बार कुछ न कुछ शेष रह जाता है।

अम्बुज पाण्डेय

वह कौन सा आकर्षण है उनकी कला में, जो कभी रीतता नहीं?
उनकी श्वेत-श्याम संरचना में ऐसा क्या जादू है कि वह कभी आपको मोनोटोनी नहीं होने देता?
आधी सदी से ज्यादा समय बीत गया।सिनेमा की तकनीक, कौशल और व्यावसायिकता में चमत्कारी प्रगति हुई।फिर भी गुरूदत्त अप्रतिम बने हुए हैं।

दरअसल गुरूदत्त का पूरा अभिनिवेश हीं असफलता और दु:ख की आधारशिला पर टिका है।उनका पूरा व्यक्तित्व खंड-खंड उच्चाटन और

बूंद-बूंद विक्षोभ से निर्मित हुआ।उनके यहां जीवनोत्सव के लिए अवकाश नहीं है।वहां त्रासदी इतनी नीरन्ध्र है कि उसमे कुछ दूसरा नहीं समा सकता।
संसार की सारी विधाएं वेदना को हीं तो सिरज रही हैं।लेकिन वेदना का अपना अक्षय स्रोत है।उसका एक समृद्वध रिक्थ है।वह खाली नहीं होता।अपितु वह सारी विधाओं को चुनौती देता है।और उसमें डूबने वाला उत्तरोत्तर भास्वर होता जाता है।एक चुनौती गुरूदत्त ने भी स्वीकारी और ऐसी असफलता बुन दिया जो सफलता को तिरस्कृत करती है, सुखांतक का उपहास करती है।

गुरूदत्त जानते थे कि कोई भी कलात्मक विधा अंतिम सत्य का दावा नहीं कर सकती।और शायद अंतिम सत्य जैसा कुछ होता भी नहीं।विद्रोह की अधिकता व तीखा तेवर एक नारा भर बन के रह जाता है।दुष्यंत कुमार जैसे संवेदनशील और विद्रोही शायर के साथ यहीं हुआ।उनकी कविताओं को भ्रष्ट राजनेता भी ताली बटोरने और वैचारिक उत्तेजना पैदा करने के लिए उद्धृत करते हैं।

“प्यासा” का युवा शायर अपनी मौत से आंख मिचौली करके वापस आता है तो अपने दोस्त,रिश्तेदार और प्रकाशकों को लोलुपता में डूबा पाता है।इस वृत्ति के साक्षात्कार से वह गहरे अवसाद में डूब जाता है।स्वजनों का यह व्यवहार उसके स्नायुतंत्र को बेध देता है।पूरा समाज उसके सामने निर्वसन खड़ा है।दुनियां तो अब उसे नहीं पहचान रही थी।लेकिन वह अपनी पहचनी दुनियां को देखकर ग्लानि से भर जाता है।उसे यकीन हो गया यह दुनियां नहीं संभल सकती।इसे रचने वाला हीं संभाल सकता है।इस दुनियां का सर्वस्व पाकर भी अकारथ हीं होगा।

[spacer height=”20px”]प्यासा फिल्म के गीतों को रचा था साहिर ने।साहिर खुद भी गुरूदत्त की तरह हतभाग्य प्रेमी थे।उन्होंने अपनी मोहब्बत को सीने में हीं ज़ज़्ब कर लिया था।आखिर एक ज़ज़्बाती फनकार अपनी मोहब्बत की नुमाइश भी तो नहीं कर सकता।इसमें उपहास के अलावा क्या मिल सकता है?वह राजनीति का मुखापेक्षी भी नहीं हो सकता,जो आकंठ अपने हीं ताने-बाने में उलझी है।उसे किसी से उम्मीद नहीं है।साहिर के साहचर्य ने गुरूदत्त की प्यासा को और भी मारक बना दिया।

जीवन की तितिक्षा और निर्वेद से निकलकर गुरूदत्त कागज के फूल की तरफ चले जाते हैं।अब भी किसी से उन्हें शिकायत नहीं है।वहां उनकी कला और एकांत के सिवाय कुछ नहीं है।शराबनोशी उस साधक की दिनचर्या बन चुकी थी।अपनी असफलता का उत्सव मना चुकने के बाद यह स्थिति भी असह्य होने लगी।आखिर वह कब तक अपने हीं अन्तर्प्रकाश से दीपित होता रहेगा?

गुरूदत्त दुनियां से अलहदा दृष्टि रखते थे। एक पागल की तरह।जो दुनियां की परवाह नहीं करता।उसे बोहेमियन जीवन हीं अच्छा लगता है।ऐसा आदमी कभी-कभी बहुत निर्मम होता है।सौभाग्यशाली थे गुरूदत्त जिन्हें अबरार अलवी जैसा हमपेशेवर मित्र और गीतादत्त जैसी सहधर्मिणी मिली,जिन्होंने बार-बार अपने चहेते को संबल दिया। आख़िर गुरूदत्त ने इन्हें भी अपने ताप से जलाया हीं।अपनी आवारागर्दी का साधन माना।

लोग बताते हैं कि कागज के फूल गुरूदत्त की मौत का रिहर्सल था।मुझे तो लगता है कि गुरूदत्त का पूरा जीवन हीं मौत का रिहर्सल था।और सबका होता है।कोई इससे पलायन करता है कोई फिराक की तरह इसके उन्माद में शामिल हो जाता है, “मौत इक रात गीत गाती थी/ज़िन्दगी झूम-झूम जाती थी।”

गुरूदत्त अपने वास्तविक जीवन में भी वहीं कर रहे थे,जो सिनेमा में किया था।वे मौत के झीने आवरण को भेदकर उस पार जाना चाहते थे।और देखना चाहते थे अपनी रची दुनिया,दूसरे लोक से।लेकिन अफसोस! उन्होंने इतनी लंबी छलांग लगाई कि बहुत आगे निकल गये, जहां से दोबारा नहीं आ सकते।इस बार दुनियां गुरूदत्त को देख और पूज रही थी।वह गुरू को गले लगाना चाहती थी,उसके आंसुओं को अपनी अंजलि में रोप लेना चाहती थी। लेकिन गुरूदत्त….

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