पचानवे बरस पुराना अपराधी!

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जर्मनी का औश्वित्ज़ ट्रायल

रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

इतिहास इस तरह के उदाहरणों से भरा पड़ा है जब रंग और वर्ण की वजह से एक पूरी कौम को ख़त्म करने का जतन किया गया। इस तरह के घृणित प्रयास दुनिया के लगभग सभी देशो में हुए है। इन अपराधों में शक्ति संपन्न वर्ग ने निशक्त और संख्या बल में कमजोर वर्ग को मानवता की आखरी हद तक जाकर प्रताड़ित किया। इस तरह के सामूहिक अपराधों ने न केवल उस देश को शर्मनाक स्थिति में ला खड़ा किया वरन सम्पूर्ण मानव जाति को वर्षो तक लज्जित किया है।

पिछले कुछ वर्षों से जर्मनी में ऐसा ही हो रहा है। वहाँ नाजी दौर में हुए नरसंहार के दोषियों को ढूंढकर अदालत के सामने लाया जा रहा है। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जितनी भी सरकार सत्ता में आई, उनका एकमात्र लक्ष्य नाजी अत्याचार के दाग मिटाने का रहा है।

गुजरे पचहत्तर वर्षों में हरेक जर्मन सरकार का संकल्प रहा है कि उस हिंसक दौर में नाजियों का साथ देने वाले अफसरों को ढूंढकर कानून के समक्ष लाया जाए। आज उस समय के ये सरकारी अधिकारी, सेना के अफसर बदकिस्मती से खुद प्राकृतिक मृत्यु को प्राप्त हो चुके होंगे क्योंकि इस नृशंस कांड को घटित हुए सात दशक बीत चुके है। यद्यपि उस समय के अब उम्रदराज पीड़ित दर्जन भर ही बचे है परन्तु सरकार उनके चेहरे पर न्याय का सुकून देखना चाहती है।

हिटलर ने अपने अभियान से सम्पूर्ण यहूदी कौम के सफाये का मंसूबा देखा था उसके लिए उसने नृशंसतम तरीके ईजाद किये थे। गैस चैम्बर, कॉन्स्ट्रशन कैंप, जहरीले इंजेक्शन और भी न जाने कितने ही अमानवीय  उपाय इस्तेमाल किये थे! और ये सब होता था जर्मन सैनिकों एवं नाजी गार्डो की मदद से। यह एक ऐसा अपराध था जिसमे अपने ही नागरिकों के खिलाफ अपनी ही आर्मी का उपयोग किया गया था।

हिटलर के पतन के बाद जर्मनी ने अपने नागरिकों के खिआफ़ अत्याचार करने वालों को चुन चुनकर सजा दिलाई।  सरकार ने उन लोगों को भी पकड़ा जो इस नरसंहार में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे परन्तु उनकी आँखों के सामने निरपराध लोगों को मारा गया था और वे मूकदर्शक बने रहे थे। ये लोग थे नाजी कैंपो में काम करने वाले तृतीय, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे जैसे रसोइये, अकाउंटेंट, क्लर्क और पहरेदार।

पिछले साल औश्वित्ज़ कैंप के एक अकाउंटेंट और पहरेदार को उस समय तलाशा गया जब उनकी उम्र नब्बे बरस से ज्यादा हो चुकी थी। और कोई मौका होता तो उन्हें उनकी उम्र को ध्यान में रखकर माफ़ कर दिया जाता परन्तु उन पर बाकायदा मुकदमा दर्ज कराया गया। अदालत की कार्यवाही के दौरान चौरानवे वर्षीय एक गवाह ने  पहरेदार रेनहोल्ड हैंनिंग से कहा कि अब तुम्हारे और भगवान् के बीच सिर्फ कुछ कदम का फासला बचा है, कह दो कि तुम्हे अफ़सोस है! परन्तु हैंनिग के मुँह से बोल नहीं फूटा। उनकी आँखों से आंसू टपकते रहे। ये दोनों अपराधी जेल जाने से पहले ही अपनी मौत मारे गए।

इनकी मृत्यु के बाद यह मान लिया गया था कि इस घटना के दोषी अब जीवित नहीं बचे है। परन्तु पिछले हफ्ते जर्मन पुलिस ने ऑस्ट्रिया में नाजी कैंप के एक सुरक्षा कर्मी को पकड़ा जहाँ 36223 निर्दोष नागरिकों को यातना देकर मारा गया था। जर्मन अभियोक्ता ने इस 95 वर्षीय सुरक्षाकर्मी हांस एच पर आरोप लगाया है कि वह अगर चाहता तो इतने सारे लोग बच सकते थे। वह उनकी मौत के अपराध से बच नहीं सकता लिहाजा  उसे अपने उम्र के इस पड़ाव पर भी कानून का सामना तो करना ही होगा !

जहाँ एक और इस तरह के लोहमवर्षक उदाहरणों का अम्बार है वही दूसरी और ऐसी भी नजीर है जिसने मानवता का सर गर्व से ऊँचा किया है। उस वहशियाना समय में कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने अपने जन धन की परवाह न करते हुए सैंकड़ों यहूदियों को बचाया था। ऐसे ही एक शख्स की कहानी को दुनिया के सामने लाये थे हॉलीवुड के ख्यातनाम निर्माता निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग। आस्ट्रेलियन उपन्यासकार के ‘बुकर विजेता’ उपन्यास ‘शिंडलर्स आर्क’ एक जर्मन व्यवसायी ऑस्कर शिंडलर के एक हजार से ज्यादा यहूदियों को शरण देकर बचाने के प्रयासों की सत्य घटना  पर आधारित कहानी पर बनी  फिल्म ‘ शिंडलर्स लिस्ट’ (1993) को स्पीलबर्ग ने निशुल्क निर्देशित किया था। वजह थी उनके परिवार ने भी होलोकास्ट का दंश झेला था।

इस फिल्म को डॉक्यूमेंट्री की शक्ल में ब्लैक एंड वाइट में बनाया गया था। शिंडलर की भूमिका लिआम नीसन ने निभाई थी और उनके सहायक की भूमिका में थे गांधी फेम बेन किंग्सले। इस फिल्म को ऑश्वित्ज़ और पोलैंड की रियल लोकेशन पर ही फिल्माया गया था। फिल्म में सिर्फ एक रंगीन दृश्य था जहाँ लाल कोट पहने एक नन्ही लड़की नाजी सैनिकों से छुपती नजर आती है।  बाद में शिंडलर उसकी लाश देखते है।

मानवता की मिसाल प्रस्तुत करती ‘शिंडलर्स लिस्ट’ ने सात ऑस्कर हासिल किये थे।

आतंक और अत्याचार से कितना ही घना अँधेरा हो जाए परन्तु उम्मीद और सकारत्मकता का उजाला उसे पीछे धकेल ही देता है। मानवता के इस प्रयास को अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित कर दिया गया है। शिंडलर की फैक्ट्री जहाँ एक हजार से ज्यादा यहूदियों को सुरक्षा दी गई थी अब संग्रहालय में बदल दिया गया है।

न्याय के प्रति जर्मनी का आग्रह काबिले तारीफ़ है। यह ऐसा उदाहरण है जिसे हर न्यायप्रेमी व्यक्ति और देश ताउम्र याद रखना चाहेगा।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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