यश चोपड़ा जयन्ती विशेष: नीला आसमान सो गया

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चन्दन पाण्डेय/

यश चोपड़ा को बॉलीवुडीय सफलताओं के लिए वो लोग याद रखेंगे जिन्हें प्रेम तथा प्रेम को समझने के टूल्स हमेशा उप्लब्ध रहे. अपने लिए यश चोपड़ा प्रेम विषयक मामलों में किसी किताब की तरह खुले और वो भी उस समय जब घरों में सिनेमा को साहित्य से अधिक महत्व मिलने लगा था या कह लें कि सिनेमा को साहित्य से कम नुकसानदायी माना जाने लगा था. दिल तो पागल है, डर, सिलसिला और दाग, इन सबमें प्रेम के विभिन्न शेड्स दीखते हैं. बड़ी और अनूठी बात यह कि फिल्मकार उन्हें छू भर कर नहीं निकल जाता. ठहर कर उन भावनाओं का विकास को, जो पर्दे पर निखर रहा होता है, दर्शकों के मन में पसरने देता है.

 नवम्बर 1997 के किसी दिन की बात होगी, जब हम आठ दस दोस्तों ने जीवन में पहली और आखिरी बार कोई फिल्म लगातार दो शो देखी : दिल तो पागल है. स्त्री पुरुष के बीच प्रेम और मित्रता किस तरह लगातार आवाजाही करता है उसकी बेमिसाल मिशाल है यह फिल्म. वैसे भी अगर स्त्री पुरुष सम्बन्धी लोकप्रिय अतिवाद से कुछ देर के लिए खुद को बरी रखें तो स्त्री पुरुष सम्बन्धों पर हिन्दी सिनेमा / साहित्य / कला आदि की सभी विधाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम यश चोपड़ा के खाते में है. एक बड़ा रचनाकार एक वक्त में एक ही थीम चुनता और उसे सम्पूर्णता की हद तक ले जाता है. यश जी ने यह खूब किया है. उनकी फिल्में जिस अंत तक पहुँचती हैं उस पर बहस हो सकती है पर उसके लिए यह ध्यान रखना होगा कि ये सभी फिल्में व्यवसायिक थीं जिनमें सकारात्मकता ही प्रमुख लक्षण है. इस वजह से अंत बहसतलब हो सकते हैं.

विवाहेत्तर सम्बन्धों पर बनी सिलसिला सम्बन्धों के बिगड़ने के लिए किसी बनावटी तर्क का सहारा नहीं लेती. दो जोड़े हैं और कमाल यह कि अवैध सम्बन्ध में लिप्त जो लोग हैं वो अपने अपने वाजिब साथी से अधिक आत्मविश्वासी और निर्णायक हैं. उन पर कोई जुल्म नहीं है जिसके एवजी में वो अवैध की तरफ जाते दिखें – यह दिखाना निर्देशक का कमाल है वरना तो अधिकतर निर्देशक की रुमानी कहानियाँ अपनी जड़ ही में जुल्म से शुरु होती है, सहानुभूति का एक कोना न सिर्फ उन्हें चाहिए जो ऐसे अवैध सम्बन्धों में दाखिल होते हैं बल्कि उन रचनाकारों को भी जो ऐसे विषयों पर पन्ने या रील खराब करना चाहते हैं. सिलसिला ने ऐसे सम्बन्धों के शिकार लोगों की कहानी भी उतनी ही शिद्दत से कही है जितनी शिद्दत से उनकी कहानी जो अवैध की ‘ग्लोरी’ में जीना जीवन उद्देशय समझते हैं.

इकतरफा इश्क की बेहतरीन पड़ताल करते हुए यश चोपड़ा ने डर बनाई. जब जब सुनने में यह बाते आई कि अमुक जगह किसी लड़की पर तेजाब फेंक दिया गया, अमुक जगह हत्या हो गई तब तब आपके जेहन में डर फिल्म घूम जायेगी. इं

तिहा की हद तक प्रेम का हिसंक पागलपन हिन्दी सिनेमा या कह लें हिन्दी की किसी भी विधा में पहली बार था. पुरुष वर्चस्व वाले समाज में ऐसे ‘महान’ नायक यह समझ नहीं पाते कि इंकार भी कोई निर्णय है. वैसे यश साहब अगर होते और कभी मैं उनसे मिल पाता तो एक फिल्म इस विषय पर भी बनाने को कहता और पूछता कि जब प्रेमी/प्रेमिका में से कोई एक इंकार / इसरार का आधुनिक हिंसक खेल खेलने लगता है तब किस तरह की कहानी बनती है.

चाँदनी जीवन के झंझावातो के बावजूद पुन: शुरुआत करने की थीम पर बनी खूबसूरत फिल्म है. प्रेम यहाँ भी है. यह बहुतेरा कहा गया है और हिन्दी फिल्मों का प्रिय विषय है कि प्रेम एक बार ही होता है या पहला प्रेम ही प्रेम होता है.इस मिथ को सलीके से नष्ट करती हुई फिल्म है चाँदनी. पहले प्रेम की ओर लौटने वाला अंत यहाँ भी है पर फिल्म देखते हुए आप समझ रहे होते हैं कि यह तो सुखद अंत का तरीका है वरना अपनी बात निर्देशक फिल्म के बीच में कह ले गया है.

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