बॉलीवुड में दक्षिण की बयार!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन
रजनीश जे जैन

मनुष्य के मन की थाह लेना मुश्किल है। कौन सी बात पर वह किस तरह की प्रतिक्रिया देगा या किस बात पर आक्रामक हो जाएगा स्पष्ट नहीं कहा जा सकता। एकांत के क्षणों में सामान्य व्यवहार करेगा परन्तु भीड़ में अपनी तटस्थता को सामूहिकता के बहाव में बह जाने देगा। तमिलनाडु और कर्नाटक कावेरी जल के बंटवारे पर लोग कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में डेरा डाले बैठे हैं। अक्सर विवाद की स्थिति में एक राज्य की भीड़ दूसरे राज्य की संपत्ति को इस तरह नष्ट करती है मानो दुश्मन देश को नुक़सान पहुंचाया जा रहा हो। एक अन्य परिस्थिति में उत्तर भारतीय कोई राजनेता जब किसी रौ में बहकर यह बोल जाता है कि साइन बोर्ड पर हिंदी में भी लिखा होना चाहिए! बस दक्षिण के सारे राज्य एक साथ उसके विरोध में उतर जाते हैं कि हम पर हिंदी थोपी जा रही है। परन्तु यही लोग फिल्मों को लेकर सहनशील हो जाते है। कभी कोई इस बात पर विरोध दर्ज नहीं कराता कि तेलुगु निर्देशक तमिल या हिंदी फिल्म को क्यों निर्देशित कर रहा है। राजनीति के नाम पर एक दूसरे के धूर- विरोधी दर्शक एक साथ बैठकर फिल्म देखते हुए एक सी भावनावों को महसूस करते हुए कभी एक दूसरे से असहमत नहीं होते। फिल्मों ने बगैर किसी नारेबाजी के क्षेत्रीयता और भाषा की दीवारें हटाने का काम किया है।

आम धारणा रही है कि बॉलीवुड भारत की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है और गैर-हिंदी भाषी फ़िल्में क्षेत्रीय होने के कारण दूसरी पायदान पर हैं। यह सिर्फ एक पहलु है एक व्यापक विषय का। साइलेंट फिल्मों की शुरुआत में मुंबई के ही साथ मद्रास में तमिल और आंध्र में तेलुगु फिल्मकारों ने लगभग थोड़े बहुत अंतराल के साथ फिल्में बनाना आरम्भ कर दिया था। चूँकि हिंदीभाषी दर्शकों की संख्या अधिक थी, तो सन्देश यह गया कि बॉलीवुड ही भारत का प्रतिनिधित्व करता है। आज जब दावा किया जाता है कि भारत में हर वर्ष एक हजार फिल्में बनती है तो उसमें इस बात की स्वीकारोक्ति भी होती है कि इस विशाल संख्या में हिंदी के साथ सभी क्षेत्रीय फिल्में भी शामिल हैं! हिंदी दर्शकों के लिए यह जान लेना भी ज़रूरी है कि क्षेत्रीय भाषाई फिल्मों ने भी प्रतिभाशाली फिल्मकारों को राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाने का अवसर दिया है। भाषाई सरहदों को लांघकर हिंदी फिल्मों में भी सफलता की इबारत कई बार दोहराने वाले सभी फिल्मकारों की बात करने के लिए यह लेख बहुत छोटा है।

पचास के दशक से ही हिंदी सिनेमा क्षेत्रीय फिल्मकारों को आकर्षित करने लगा था क्योंकि इसका कैनवास थोड़ा बड़ा था और दर्शकों के बढ़ने की संभावनाएं भी क्षितिज पर दिखाई देने लगी थीं। दक्षिण के सफलतम निर्देशकों ने बम्बई का रुख इस दशक के उत्तरार्ध में करना आरम्भ किया था। सी वी श्रीधर और एल वी प्रसाद जैसे दक्षिण के सफल नाम इसी दौर में सुनाई देने लगे थे। सी वी श्रीधर मशहूर बैनर ‘ए वी एम्’ की हिंदी निर्मित ‘भाई भाई’ (1956) के लेखक थे। अशोक कुमार किशोर कुमार अभिनीत यह फिल्म सुपर हिट रही थी। एल वी प्रसाद का हिंदी सिनेमा से जुड़ाव अप्रत्यक्ष रूप से आजादी पूर्व ही हो गया था। अभिनय के प्रति रुझान के चलते वे पृथ्वीराज कपूर के ‘पृथ्वी थिएटर’ से जुड़े और यहीं उनकी मुलाक़ात राजकपूर से हुई जो उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘ शारदा ‘(1957) के नायक बने। बहुमुखी प्रतिभा के धनी एल वी के नाम एक और उपलब्धि है जिसके बारे में कम ही लोग जानते है। भारत की पहली सवाक फिल्म ‘आलम आरा'( हिंदी) भक्त प्रह्लाद(तेलुगु) और ‘कालिदास’ (तमिल) तीनो में ही उन्होंने अभिनय किया था। ये तीनों फिल्में सन् 1931 में एक के बाद एक प्रदर्शित हुई थीं। एल वी प्रसाद की सफल हिंदी फिल्मों में ससुराल (1961), हमराही (1963), मिलन (1967), राजा और रंक (1968), खिलौना (1970), उधार का सिंदूर (1976), एक दूजे के लिए (1981) महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

एल वी प्रसाद की ही तरह सिनेमा की कई विधाओं में पारंगत ए भीमसिंह तमिल, तेलुगु, मलयालम सिनेमा में एक साथ सक्रिय रहे थे। सन् 1978 में अपनी मृत्यु से पूर्व इस फिल्मकार ने 18 हिंदी फिल्मों में कभी निर्देशक तो कभी लेखक तो कभी निर्माता के रूप में अपनी रचनात्मकता का परिचय दिया था। भीमसिंह की उल्लेखनीय हिंदी फिल्म सन् 1974 में आई ‘नया दिन नई रात थी, जिसमे संजीव कुमार ने नवरसों पर आधरित नौ भूमिकाएं निभाईं थीं। फिल्म की नायिका जया भादुड़ी थीं।

हिंदी सिनेमा की निर्देशक जोड़ी ‘अब्बास मस्तान’ की ही तरह दक्षिण की भी एक निर्देशक जोड़ी चर्चित रही है – कृष्णन पूंजू’ की। नाटक मण्डली से शुरुआत करने वाली इस जोड़ी ने सी एन अन्नादुरई को स्क्रिप्ट राइटिंग का मौका दिया जो आगे चलकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। इसी तरह एम करूणानिधि बतौर लेखक इस जोड़ी के पारस स्पर्श से लाइम लाइट में आकर मुख्यमंत्री पद पर पहुंचे। कृष्णन-पूंजू की चर्चित हिंदी फिल्म ‘भाभी’ (1957) थी, जिसमे मशहूर कॉमेडियन जगदीप और नंदा ने किशोर प्रेमियों की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म का गीत ‘चली चली रे पतंग मेरी चली रे -आज भी सुनाई दे जाती है।

एक भाषा से दूसरी भाषा में जाने वाले फिल्मकारों को कभी किसी विरोध का सामना नहीं करना पड़ा , बल्कि उनकी रचनात्मकता को खुले मन से सराहा ही गया। पी भारती राजा -सोलहवा सावन (1979 ), के भाग्यराज -आखरी रास्ता (1985), बालू महेंद्र-सदमा (1983 ), मणिरत्नम-रोज़ा (1992) बॉम्बे (1995) दिल से (1998) और प्रियदर्शन मलयालम सिनेमा से हिंदी में आये. उन्होंने तमिल तेलुगु में भी काम किया। किसी हिंदी निर्देशक से भी अधिक फिल्में निर्देशित करने का रिकॉर्ड प्रियदर्शन के ही नाम है। उनकी निर्देशित लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में हेराफेरी, हलचल, भूलभुलैया, गरम मसाला, दे दना दन -उल्लेखनीय हैं। ए आर मुर्गदौस तमिल तेलुगु फिल्मों के प्रमुख नामों में से हैं। मुर्गदौस ने अपनी सफल फिल्मों के हिंदी रीमेक बनाकर दर्शकों को उन विषयों से अवगत कराया, जिन पर हिंदी सिनेमा में अमूमन विचार भी नहीं किया गया है। गजनी (2008) हॉलिडे (2014) गब्बर इस बैक (2015) उनकी प्रमुख हिंदी फिल्में हैं। इसी तरह अपने धमाकेदार डांस से हिंदी दर्शकों के चहेते बने प्रभुदेवा ने अपनी सफल फिल्मों (वांटेड, रॉउडी राठौर, सिंह इस ब्लिंग) की हिंदी रीमेक निर्देशित कर धाक जमाई है। मौलिकता का आग्रह लिए अनूठे विषय छूने वाले शंकर (द जेन्टलमैन, नायक, रोबोट ) और सिनेमा में भव्यता लाने वाले एस एस राजमौली की बात किये बगैर यह लेख अधूरा रहेगा। भारत की सर्वाधिक वीएफएक्स उपयोग करने वाली कमाऊ फिल्म ‘बाहुबली’ उनके विज़न की ही उपज थी। सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी राजमौली ने ही लिखी थी।

कहना न होगा – बहुभाषी देश में जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक सरहदों को गिराने का जितना काम सिनेमा ने किया है उतना किसी और ने नहीं। राजनीति ने तो बिलकुल भी नहीं।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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