एक कुलपति के चरित्र को समझने में मदद करती है ‘अनारकली ऑफ आरा’- एक लीक से हटकर फिल्म

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अश्विनी कुमार/

कुछ फ़िल्में समय के लीक को तोड़कर अपना एक नया इतिहास बना डालती है. समाजशास्त्र का एक नया परिभाषा गढ़ डालती है और सबसे बड़ी बात तो यह कि वह समाज के लोगों को संवाद करने के लिए मजबूर करती है.  पत्रकार से फ़िल्मकार बने अविनाश दास की फिल्म ‘अनारकली ऑफ आरा’ इसी कसौटी पर खरी उतरने वाली फिल्म है. यह अलग बात है कि मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों में इस फिल्म को न तो ज्यादा दर्शक मिले, न शो और न ही फिल्म वहां ज्यादा देर तक टिक सकी.  कारण जो भी रहा हो उसकी पड़ताल यहाँ लाज़िमी नहीं है.

‘अनारकली ऑफ आरा’ मुख्यधारा फिल्मों के समक्ष एक बड़ी लकीर खींच डालती है. समाजशास्त्र की नयी परिभाषा गढ़ती है.  वह दर्शकों से संवाद करती है. संवाद दर्शकों से ही नहीं बल्कि सत्ता के केंद्र से भी करती है.  उससे उलझती है.  हारती है. हार कर जीतती है.  एक बार के लिए कह उठती है कि ‘मरे हुए को और कितना मारोगे’.  यह सुनकर लगता है कि अनारकली हार गई.  अब वह संघर्ष नहीं कर सकती.  अब भाग भी नहीं सकती.  लेकिन वह हारती नहीं है.  अपने जीत के रास्ते को तलाश ही लेती है.

दरअसल फिल्म में ‘अनारकली’ एक पात्र है.  कहिए तो इस सिनेमा का मुख्य चरित्र. साहित्य के छात्र यहाँ ‘स्त्री विमर्श’ भी तलाश सकते हैं.  फिल्म की कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ती है – फिल्म शुरू होने के साथ अनारकली की माँ चमकी देवी को एक शादी समारोह में गाते हुए पर्दे पर दिखाया जाता है.  आमतौर पर अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए लोग ऐसे कार्यक्रमों में बंदूक लेकर पहुँचते हैं.  रूपये लुटाते हैं.  बंदूक के नली में भी रूपये रखकर उसको हवा में लहराया जाता है.  इसी रूपये को लेने के लिए वह ओठों से बंदूक की नली को छूने की कोशिश करती है.  तभी  बंदूक से गोली चल जाती है और अनारकली की माँ की हत्या हो जाती है.  एक पल के लिए पर्दे पर स्याह अँधेरा.  सन्नाटा.  लेकिन फिल्म रूकती नहीं.  चल पड़ती है.  चमकी देवी की मौत मानो किसी मनुष्य की मौत बल्कि किसी कीड़े – मकौड़े की मौत हो.  कहीं कोई आवाज़ नहीं.  जीवन वापस अपने ढर्रे पर बेरोकटोक चल पड़ती है.

माँ की विरासत को अनारकली (स्वरा भाष्करा) संभालती है.  वह गाँव और उस छोटे से शहर आरा में मंचीय कार्यक्रम करती है.  जिसे बोलचाल की भाषा में ‘साटा’ कहा जाता है.  यूपी – बिहार के ग्रामीण अंचलों में आज भी यह शब्द मौजूद है.  अनारकली का अपना का दल है.  ‘साटा’ की बात रंगीला (पंकज त्रिपाठी) के माध्यम से होता है.  एक ‘साटा’ उसे थाना से मिलता है.  अनारकली को पुलिस पर भरोसा नहीं है क्योंकि वे पैसे नहीं देते.  अनारकली का अपना स्वाभिमान है.  वह थाना में कार्यक्रम नहीं करना चाहती लेकिन रंगीला के जिद के आगे उसको झुकना पड़ता है.  इस कार्यक्रम में आरा विश्वविद्यालय के कुलपति धर्मेन्द्र चौहान (संजय मिश्रा) यानि ‘भीसी’ (वीसी) मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले हैं.  शराब के नशे में वे मंच पर चढ़कर अनारकली के साथ बदतमीज़ी कर बैठते हैं.  अनारकली विरोध करती है.  थप्पड़ मारती हैं अपनी अस्मिता बचाने के लिए.  कार्यक्रम थाना में है.  पुलिस वहां मौजूद है.  लेकिन वे मदद नहीं करते.  पुलिस यहाँ सत्ता के समक्ष बौनी दिखती है.  इसके बाद अनारकली थाना पहुँचती है.  अपने साथ हुई बदतमीज़ी की रिपोर्ट लिखाने के लिए.  पुलिस रिपोर्ट लिखने से मना कर देती है.  क्योंकि कुलपति रसूखदार व्यक्ति था.

[spacer height=”20px”]फिल्म में यहीं से एक नया मोड़ शुरू होता है.  कुलपति समझौता की कोशिश में लगा रहता है.  लेकिन इसमें उनके अन्दर कोई पश्चाताप या पछतावा नहीं बल्कि धमकी भरे अंदाज़ में अपना रवैया रखता है.  बारूद की ढेर पर खड़ी अनारकली को मानो यहाँ एक चिंगारी मिलती है.  कुलपति उसे रूपये के बल खरीदना चाहता है.  अनारकली रूपये झटक लेती है लेकिन मजबूर नहीं बल्कि मज़बूत होती है.  सत्ता क्या – क्या करवा सकती है.  उसे यहाँ देखा जा सकता है.  अनारकली को झूठा मुकदमा यानि वेश्यावृत्ति में फँसा दिया जाता है.  रंगीला, उसकी ज़मानत करवाता है. अनारकली की मुश्किलें यहीं कम नहीं होती.  इसके बाद गुंडे उनको जान से मारने के लिए पीछा करते हैं.  वह भागती है और भाग कर दिल्ली पहुँचती है.  यहीं साथ में अनवर भी पहुँचता है.  अनवर, उनके गायकी मंडली का हिस्सा है.  अनारकली के पास उतने पैसे नहीं इसी कारण वह दिल्ली की झुग्गी में रहती है.  एक भोजनालय में अनारकली का परिचय कैसेट कंपनी में काम करने वाले हिरामन से होता है.  हिरामन भी आरा का है.  हिरामन नाम सुनकर एकाएक फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ अर्थात् ‘तीसरी कसम’ की याद ताज़ी हो जाती है.  वहां भी एक हिरामन है.  वह हीराबाई की मदद के लिए पहुँचता है.  वहां रेणु का हिरामन और हीराबाई है तो यहाँ अविनाश दास का अनारकली और हिरामन.  हिरामन तो मन – ही – मन अनारकली के प्रेम में दीवाने हो जाते हैं.  अनारकली जब टूट कर बिखरने लगती है तब हिरामन ही ही उन्हें लड़ने का साहस देता है.  यहाँ तक कि वी.सी. से लड़ने का हथियार भी देता है.  यहाँ हिरामन एक मज़बूत चरित्र के रूप में उभरकर सामने आता है.  दिल्ली में जब अनारकली अपना टिकने का ठिकाना ढूँढ रही होती है तब हिरामन उसके लिए देवदूत साबित होता है.  वह अनारकली की मदद करता है. उसे कैसेट कंपनी में काम दिलाने के लिए जी जान लगा देता है.  वह कैसेट कंपनी के मालिक से अनारकली को मिलवाना चाहता है.  मालिक मिलने को तैयार नहीं.  वह कहता है कि, ‘सर एक बार सुन लीजिये. गरदा है गरदा. ’ मालिक डपट कर भगा देता है.  लेकिन एक दिन अनारकली ‘रिकॉर्डिंग रूम’ देखने के बहाने चुपके से स्टूडियो पहुँच जाती है और गाना, गाना शुरू कर देती है.  इसी बीच कैसेट कंपनी का मालिक वहां पहुँचता है और अनारकली की आवाज़ पर मुग्ध हो जाता है.   अनारकली का गाना यहाँ रिकॉर्ड हो जाता है.  कैसेट दूर – दूर तक बिक्री के लिए पहुँचती है.  इसी क्रम में यह कैसेट आरा (बिहार) भी पहुँचती है.  पुलिस की नज़र उस पर पहुँचती है.  आरा पुलिस बिहार से दिल्ली जाती है.  अनवर के अपहरण का झूठा मुकदमा उस पर लाद कर पुलिस सबसे पहले कैसेट कंपनी के कार्यालय पहुँचती है और फिर अनारकली के किराये के घर.  अनारकली को घर भी छोड़ना पड़ता है और कैसेट कंपनी भी.  इसी वक़्त हिरामन एक बार फिर उसकी मदद के लिए आता है.  वह मोबाइल फ़ोन में वीडियो दिखाता है.  आरा वाली घटना का.  जिसमें कुलपति बदतमीज़ी कर रहे होते हैं.  अनारकली को शायद एक नयी रोशनी यहाँ दिखती है.  वह हिरामन से कहती है कि, ‘आरा थाना फोन लगाइए.’ अनारकली आत्मसमर्पण करती है.  कुलपति धर्मेन्द्र चौहान खुश होता है.  जिस दिन न्यायालय में सुनवाई होती है उस दिन कुलपति भी वहां पहुँचते हैं.

आश्चर्यजनक रूप से अनारकली अदालत के बाहर समझौते के मूड में आती है.  अनवर उसे रोकता है.  वह किसी की नहीं सुनती.  एक बार के लिए लगता है कि अनारकली टूट कर बिखर गयी.  स्त्री शक्ति हार गयी.  सत्ता के आगे उसने घुटने टेक दिए.  वह कुलपति से कहती है, ‘भीसी साहब मरे हुए को और कितना मारेंगे. इधर का मामला आप देख लीजिये और आपका मामला हम देख लेते हैं.’ फिर वह आगे कहती है कि, ‘… कढ़ाई आपका है, तेल आपका.  इसमें पूड़ी छानिये या हलवा बनाईये.’ यह संवाद एक पल के लिए चौंकाती है. ‘भीसी’ साहब उनकी बातों में बहक जाते हैं.  आरा विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम रखा जाता है. अनारकली गाने आती है. इसी वक़्त गाना, गाते हुए मंच पर लगे प्रोजेक्टर पर पुराना सीडी चलवा देती है. जिसमें कुलपति महोदय की सारी काली करतूतें बाहर आ जाती है. उस कार्यक्रम में कुलपति की पत्नी और बेटी भी शिरकत कर रहीं थीं. कुलपति महोदय को अनारकली, आरा से चीर डालती है. फिल्म का यह संवाद ‘गरदा है गरदा’ वह यहाँ सार्थक हो जाता है. फिल्म एक ‘बोल्ड’ दृश्य के साथ ख़त्म होती है.

वरिष्ठ आलोचक पुरूषोत्तम अग्रवाल लिखते हैं कि, “अनारकली यहाँ मरती नहीं है, मारती भी नहीं हैं, बस नशे में चूर लोगों का उपचार करती है. वह औरत के न कहने की अधिकार की दो – टूक घोषणा भी करती है, ‘रंडी हो, रंडी से कुछ कम हो, या घरवाली हो, हाथ पूछकर लगाना …’ वह सिस्टम के सामने इतना ‘संगीन मामला’ पेश कर देती है, कि ‘करवाई तो करनी पड़ेगी, सर.”

यहाँ यह भी सार्थक होता है फिल्म का वह संवाद जब वह कहती है, ‘मैं आरा की अनारकली हूँ.’ दरअसल यह संवाद स्त्री – विमर्श की एक नयी परिभाषा गढ़ती है. उसका प्रतिरोध का स्वर वहां दिखता है.  मानो अनारकली अपना अस्तित्व बता रही हो. यहाँ यह भी बता देना ज़रूरी है कि अनारकली कोई निर्देशक की मन की उपज नहीं है. बचपन से ही गाँव में रहते हुए ‘अनारकली’ के चरित्र से परिचय रहा है. सत्ता और धन की ताकत यूँ तो हर जगह दिखती है. लेकिन ग्रामीण अंचलों में इसका एक अलग रूप नज़र आता है. बारात जब आती है तब कई जगह उनकी हैसियत का अंदाज़ा तब लगाया जाता है जब देख लिया जाए कि महफ़िल के शमियाने में कितने गोलियों से छलनी किया गया. अक्सर कई धार्मिक अनुष्ठानों पर गाँव और छोटे शहरों में ऐसे कार्यक्रम होते रहते हैं. नर्तकी गोलियों का शिकार भी होती रहती है. कह सकते हैं कि यह एक नए तरीके का सामंतवाद है. यूपी – बिहार में ऐसी घटनाएँ आम हैं. निर्देशक की यह खूबी है कि उन्होंने इस समस्या को पर्दे पर दिखाने की हिम्मत की. दरअसल आज हिन्दी पट्टी की समस्या हिन्दी फिल्मों से गायब हैं. लगभग दो – तीन साल पहले जब मैंने फ़िल्मकार गौतम घोष जो बांग्ला और हिन्दी में समान रूप से जाने जाते हैं, का एक साक्षात्कार लिया था.  उसमें उन्होंने इस बात पर चिंता ज़ाहिर की थी कि, हिन्दी सिनेमा अपने समाज की समस्याओं, कहानियों, संस्कृतियों से दूर होती जा रही है. जबकि दिखाने के लिए उनके पास प्रचुर सामग्री है.

यह बात काफ़ी हद तक सही भी है.  अब अगर ‘अनारकली ऑफ आरा’ की ही बात करें तो इस फिल्म में एक साथ कितनी बातों पर संवाद किया जा सकता है. यहाँ स्त्री का मर्दवादी समाज से संघर्ष है, सत्ता का दुरूपयोग है, पुलिस के प्रति आम जनता में नफरत है, सामंतवाद है, जातिवाद है और भी बहुत कुछ …

फिल्म का एक दृश्य जो है बहुत छोटा सा लेकिन कई एक कहानियों को कह ही नहीं डालता बल्कि जातिवाद का भय भी सामने लाता है. वह दृश्य कुछ इस तरह है – अनारकली लिपस्टिक खरीदने एक दुकान पर जाती है तो दुकानदार उसे मुफ़्त में देता है और अपनी लिखी शायरी पढ़ने को कहता है किसी मंच से. संभवतः दुकानदार किसी के प्रेम में पड़ा है. लेकिन अपना नाम लेने से मना करता है. वह कहता है की ‘कास्ट’ का मामला है, नाम लीजियेगा तो खेला हो जायेगा. यह डर है. जातिवाद का यह आतंक हिन्दी पट्टी की समस्याओं में से एक है. भले ही साईबर युग हो लेकिन अभी तक हम जातिविहीन समाज बना ही नहीं सके हैं. सत्ता जिसके पास है वह न्यायोचित समाज की स्थापना करना ही नहीं चाहता. देश के बाकी हिस्सों का तो नहीं पता लेकिन बिहार का होने के कारण इस बात को हमेशा से महसूस करता रहा कि जातिवाद यहाँ कैंसर की तरह है. चुनाव के समय नेता खुले मंच से जाति के नाम पर वोट मांगते हैं.  ज़रा सोचिये कि हम कैसा समाज स्थापित कर रहें हैं. फिल्म का यह छोटा संवाद कई बड़े गंभीर सवाल खड़े करता है.

फ़ैयाज़ अहमद वजीह लिखते हैं, “… बड़ी बात है कि अविनाश दास ने एक नचनिया की जिंदगी में स्त्री – विमर्श और देह – विमर्श के उन पहलुओं की छान – बीन की है, जिसका एक सशक्त संवाद मंटो की ‘हतक’ वाली सौगंधी के यहाँ नज़र आता है. … जब देशी तंदूर और इंग्लिश ओवन वाली अनारकली ऑफ आरा की हतक यानी स्त्री – अस्मिता के साथ हज़ारों लोगों के सामने खिलवाड़ किया जाता है तो फिल्म के वी.सी. साहब मंटो की कहानी के सेठ लगने लगते हैं. मंटो और अविनाश की कहानी का आपस में कोई लेना – देना नहीं लेकिन स्त्री – अस्मिता के सवाल पर दोनों कहानियाँ एक – दूसरे से गहरा संवाद करती नज़र आती हैं.”

अनारकली का यह संवाद ‘नाचने – गाने वाले हैं तो क्या, कहीं भी बजा दीजियेगा ?’ दर्शकों को चीरते हुए निकल निकल जाता है और हिरामन का बात – बात में यह संवाद कि ‘देस के खातिर …..’ ; दर्शकों को बांधे रखता है. फिल्म में रंगीला यानि पंकज त्रिपाठी और धर्मेद्र चौहान यानी संजय मिश्रा ने भी अपना किरदार बखूबी निभाया ही नहीं बल्कि जीया भी है.

पत्रकार अरविंद शेष लिखते हैं कि, ‘बेशक अभिजात्य आग्रहों की दुनिया में अनारकली के संघर्ष को स्त्रीवाद की क्लासिकी के तौर पर नहीं देखा जायेगा. इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं. लेकिन दिलचस्प यही है कि स्त्री के ज़मीनी संघर्ष के अलग – अलग आयामों और आख्यानों से ही स्त्रीवाद की सैधान्तिकी तैयार होती है, हो सकती है.  अनारकली अपनी लड़ाई और ज़वाब की ज़मीन खुद बनाती है.’

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