मौजूदा जम्हूरियत के जनाज़े पर चढ़ा एक फूल है, न्यूटन.

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श्रुति कुमुद/[spacer height=”20px”]
भारत के दण्डकारण्य स्थित दूरस्थ एक जंगली गाँव में होने वाले चुनावी प्रक्रिया को देख कर, फ़िल्म में अंग्रेजी पत्रकार गिटपिट अंग्रेजी में कहती है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं. इसी के बरक्स संजय मिश्रा का क़िरदार पीठासीन अधिकारियों की तैयारी कराते हुए कुछ इस आशय की बात कहता है कि- हर अगला चुनाव पिछले चुनाव द्वारा बनाये विश्व रिकार्ड को तोड़ता है और नया बनाता है. इन बातों से न्यूटन एक सधी हुई रचना, यह स्थापित कर देती है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हम उसके ज़िम्मेदार नागरिक हैं. [spacer height=”20px”]
लोकतंत्र की स्थापना के बाद फ़िल्म इसकी प्राण प्रतिष्ठा यानी चुनाव के माध्यम से यह बताती है कि जिसे हम लोकतंत्र कह रहे हैं, उसकी असलियत क्या है?[spacer height=”20px”]
कहानी यों आगे बढ़ती है कि जिस जगह चुनाव होना है उस पूरे क्षेत्र में कुल 76 मतदाता हैं. चुनाव कराने गए अधिकारी और उनकी सेवा में लगी एक बड़ी सैन्य टुकड़ी मतदाताओं का इंतज़ार रही है. सुबह से दोपहर ढलने को आई, कोई मतदाता कहीं दूर तक नही दिखता. सेना के अधिकारियों का बंदोबस्त कुछ ऐसा है कि पूरे दिन भी कोई दिखे भी न.[spacer height=”20px”]
तभी कहानी में एक मोड़ आता है डीआईजी साहब विदेशी पत्रकार पर अपनी धमक ज़माने के लिए उस बूथ का दौरा करने की योजना बनाते हैं. घोषित लोकतंत्र के समानांतर एक जो दूसरा अनकहा अदृश्य तंत्र पुलिस, सेना तथा अन्य अधिकारियों के बीच है वह इतना गतिमान और विश्वस्नीय है कि डीआईजी के दौरे की तैयारी होते ही मतदाता भी  ख़ोज लिए जातें हैं. [spacer height=”20px”]
[spacer height=”20px”]सेना अपने आप तो तीन टुकड़ियों में बांटती है.  एक टुकड़ा  मतदान केंद्र की सुरक्षा में रुकता है, बाकी दो टुकड़ियाँ दो अलग अलग गाँव मे मतदाताओ को ले आने जाती हैं. यही कुछ दृश्य फ़िल्म की कुंजी हैं. यहाँ फ़िल्म में दृश्यांकन की गति गजब की तेज़ी पकड़ती  है. हर एक दृश्य खट खट के अंदाज में बदलता है. लगता ऐसा कि निर्देशक कितना कुछ बता देना चाहता है. और हो भी क्यों न? [spacer height=”20px”]
 टुकड़ियों के गाँव में पहुँचने से लेकर नागरिकों के मतदान केंद्र तक ले जाये जाने तक के सभी दृश्य क्लोज शॉट्स में लिए गए हैं. टुकड़ियों के आमद का दृश्य और पार्श्व संगीत  कुछ ऐसा रचती हैं जैसे सेना किसी बड़ी करवाई पर निकली है. लेकिन जो दृश्य है, वो कुछ ऐसा है- कपड़ा सुखाती स्त्री, कट. चार स्त्रियाँ बैठ कर अनाज बीनती हुईं, कट. घर मे बैठे लोग, कट. मुर्गियाँ, कट. जानवर,  फिर वही फौजी बुटों की आवाज़.[spacer height=”20px”]
फिर धर पकड़ शुरू होती है, लोगो को बाहर निकाला जा रहा है. अगले दृश्य में एक स्त्री मुर्गी पकड़ने के लिए दौड़ रही है..कट.. लोगों को मालूम नहीं कि सेना उन्हें बाहर क्यों निकाल रही है और एक जगह जमा होने को क्यों कह रही है लेकिन सब लोग भागने की फिराक में हैं..कट.. मुर्गा भी नहीं जानता कि औरत उसे क्यों दौड़ा रही है लेकिन वो भी भाग रहा है..कट.. लोग पकड़ कर एक जगह जमा कर लिए गए हैं..मुर्गा पकड़ लिया गया है, गड़ासे की आवाज आती है, कोमल पंख का एक टुकड़ा हल्के हल्के नीचे गिर रहा है और फिर आत्माजी यानी सैन्य अधिकारी का भाषण शुरू होता है जिसे दुभाषिये, जो कायदे से सेना के लिए ही काम करते हैं, लोगों को बता रहे हैं. इसके बाद का दृश्य है कि लोगों को लाइन में लगा कर मतदान केंद्र तक लाया जा रहा है और अगले दृश्य में खाना पकाती हुई वो स्त्री मुर्गे का मांस पकाते हुए मिट्टी की देगची में मशाला बाट रही है.  यह दरअसल सैन्य अधिकारी और सैनिकों के लिए बन रहा भोजन है.  [spacer height=”20px”]
फ़िल्म अपने चरमोत्कर्ष पर तब पहुँचती है जब मतदान करने वाला पहला आदमी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के आगे खड़ा है. देर तक खड़ा रहता है. पीठासीन अधिकारी न्यूटन इस प्रक्रिया को आश्चर्य से देखता है, पूछने पर पता चलता है कि उस आदमी को मालूम ही नहीं करना क्या है.[spacer height=”20px”]
इसके बाद जो फ़िल्म में घटित होता है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाम साहचर्य की पुरातन व्यवस्था का महाकाव्यतामक टकराव है. इस प्रकिया को जानने भर के लिए यह फ़िल्म देखी जानी चाहिए. न्यूटन समझा रहा है कि ग्रामीणों को मतदान क्यों करना चाहिए? लेकिन जो सवाल उसके सामने पेश आते हैं उनके आगे वो भौचक्का रह जाता है. उन निर्दोष बातों का कोई जवाब तक उसे नहीं सूझता जो आदिवासी उससे करते हैं.[spacer height=”20px”]
इस महान टकराव को दर्ज करने के बाद निर्देशक भी फंस सकता था लेकिन ऐन मौके पर सैन्य अधिकारी यानी पंकज त्रिपाठी समझाने का मोर्चा संभाल लेता है. वह ईवीएम को खिलौना बताते हुए और ग्रामीणों का भावनात्मक दोहन करते हुए एक झटके में मतदान के लिए तैयार कर लेता है. पीठासीन अधिकारी चिल्लाते रह जाता है कि चुनाव को खेल और ईवीएम को खिलौना बताना अपराध है और मैं इसकी शिकायत लगाउँगा.[spacer height=”20px”]
चुनाव और मतदान इस फ़िल्म का शिल्प भर है.  कथा तो सभ्यताओं का टकराव और लोकतंत्र का पाखंड में तब्दील हो जाना है.[spacer height=”20px”]
यह फ़िल्म व्यक्ति बनाम समाज के द्वंद पर भी भिड़ती है.  नायिका का किरदार दिलचस्प है. मलको कहती है, क्योंकि वो इसी क्षेत्र की है तो उसे खतरा बुलेटप्रूफ जैकेट से है. बिना बुलेट प्रूफ के ही वो ज्यादा सुरक्षित है.[spacer height=”20px”]
राजकुमार राव तो जैसे सुरख़ाब के पंख हैं, इस फ़िल्म पर लगे हुए. ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति का किरदार बेहतरीन निभाया है. पंकज त्रिपाठी ने सैन्य अधिकारी का किरदार बखूबी निभाया है. नकारात्मक चरित्र के लिए अतिरिक्त क्रूरता अर्जित करने के क्रम में जो परिपाटी दर्ज है उससे कोसो दूर रहते हुए नए तरह का किरदार रचते हैं पंकज. अभिनय सबने अच्छा किया है. निर्देशन, कहानी, अदाकारी के अलावा जो चौथी बात इस फ़िल्म को बेहतरीन बनाती है, वो इस फ़िल्म का पार्श्व संगीत है. नरेंद्र चंदावरकर और बेनेडिक्ट टेलर का पार्श्व संगीत रोमांच बनाए रखता है. सुलेमानी कीड़ा के बाद निर्देशक अमित  मसूरकर की यह दूसरी फिल्म उनसे बहुत उम्मीद जगाती है जिसे वो पूरा भी करते हैं.[spacer height=”20px”]
फ़िल्म देखते हुए बार बार अपने आपको हम किसी दूसरी दुनिया का रहनवारी पाते हैं. हमें लगता है कि सिनेमाहाल में बैठे लोग ऐसा ही कोई चुनाव जीत कर आये हैं, जिसे अव्वल तो होना ही नहीं चाहिए था.  [spacer height=”20px”]
(श्रुति कुमुद, विश्व-भारती, शान्तिनिकेतन में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं.)[spacer height=”20px”]

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