बॉलीवुड का कंटेंट मैनीपुलेशन: झूठ का हास्य सच के हास्य को ख़त्म कर देगा

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सैयद एस. तौहीद/

सैयद एस. तौहीद

फिल्मों का सतहीपन कभी कभी आपको बहुत परेशान करता होगा| मुझे भी करता है|  मनोरंजन को एक नया आयाम देने की कोशिश हो रही है| मनोरंजन के नाम पे कंटेंट मेनीपुलेशन का  चलन सा हो गया है। माना कि टीवी के बनावटी ठहाकों ने बहुतो को खुश किया होगा, लेकिन विचार करें कि बनावटी ठहाकों के लिए फ़िल्में बनाने का चलन टीवी के कॉमेडी नाइट्स एवं सर्कस से शक्ति नहीं पा रहा है? हालात से उपजा लाफ्टर दर्शकों से आसानी से अनुकूलन कर लेता है। स्वाभाविक व्यंग्य स्वत: उत्पन्न हुआ करता है। हांस्य -व्यंग्य दरअसल आरोपित ना हो तभी भाता है।यह तो स्पष्ट है कि बनावटी तालियों व ठहाकों के मकसद को लेकर बना सिनेमा सतही मनोरंजन से अधिक कुछ नहीं दे सकेगा। आज की हॉरर हिंदी फिल्मों एवं एडल्ट कॉमेडी फिल्मों का ओवर-मेनीपुलेटेड कंटेंट मनोरंजन को लम्बी उम्र नहीं दे सकता। सिनेमा स्वयं अपने भविष्य का नुकसान करने वाला साबित ना हो इसके लिए निर्माता को नजर एवं नजरिया दोनों बदलना होगा। उन्हें विचार करना होगा कि वर्तमान परिदृश्य में इस तरह की फिल्मों को स्वीकार करने के लिए क्या भारतीय समाज रेडी है? दूसरा यह कि उस पर इस किस्म का कंटेंट नकारात्मक दबाव नहीं बनाएगा?

हिंदी फिल्म ‘क्या कूल’  के संस्करण का पोर्न वेबसाइटों पर प्रमोशन किया गया| सेंसर की ओर से इसे  ‘ए’ सर्टिफ़िकेट के साथ पास किया गया| एडल्ट फ़िल्में  धोखा देने के लिए प्रेरित करती हैं | हंसी मजाक में सही लेकिन एडल्ट कॉमेडी फ़िल्में धोखा देने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं| सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी| मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे हैं|

एक जमाना था जब बीआर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों की धूम थी। उनकी फ़िल्म ‘चेतना’ ने एक साथ कई नई बहसों को जन्म दिया था। इन फ़िल्मों में सेक्स-चित्रण,  यौन-शूचिता और नैतिकता के साथ-साथ सेंसर बोर्ड पर भी सवाल उठाए। चेतना की रेहाना सुल्तान ने एक काल गर्ल की भूमिका निभाई। लेकिन उनका किरदार पारंपरिक वेश्याओं (सेक्स वर्कर) से नितांत अलग था। हिंदी सिनेमा में यह चरित्र पहले भी आ चुके हैं। रेहाना देह को सक्षम मानती है, साथ ही दिमाग का भी इस्तेमाल करती है। इशारा की फिल्मों ने व्यस्कता को अधिकार की तरह रखा। लेकिन इशारा की फिल्में सतही-नीरस एडल्ट फिल्मों  से काफी आगे थी। आप चाहे तो इशारा के काम को सी व डी ग्रेड में रख लें, किंतु उनके सिनेमा की गुणवत्ता कम नहीं कर सकते। कंटेंट की वैचारिक धुरी के आधार पर यह फ़िल्में कूल थीं|  आपकी फिल्मों की कहानी सतही आइडिया से उत्पन्न नहीं थी| आज की एडल्ट हिंदी फिल्मो की कथा में इशारा की तरह गंभीरता नहीं नजर आती| एडल्ट कॉमेडी फिल्मों से गंभीरता की उम्मीद करना बेमानी सी बात होगी| लेकिन इससे वो सामूहिक जिम्मेवारी से बच नहीं सकती|

रामसे की हारर फिल्मों में मौजूद सेक्सुआलिटी में सतहीपन –स्टीरियोटाईप में वैचारिकता की घोर कमी थी। विक्रम भटट की हारर फिल्मों में खुलापन तो जरूर है,लेकिन रामसे की तुलना में दूसरे किस्म का है। आधुनिक जमाने में ‘सेक्सुआलिटी’ एक दबा हुआ सा लेकिन अभिव्यक्त विषय बन गया है। हेट स्टोरी के कई संस्करण आ गए हैं|  दशकों पूर्व ‘कर्म’ में देविका रानी-हिमांशु राय के बीच सीन को लेकर काफी तर्क-वितर्क हुआ, लेकिन  सिनेमा में एडल्ट कंटेंट नहीं रूका। शार्ट टाइम कलाकारों को लेकर वो फ़िल्में बनने लगी| फिर एडल्ट कॉमेडी फिल्मों की धारा विकसित की गई| हंसी मजाक को व्यस्क एंगल देकर एडल्ट कंटेंट जारी रहा| कभी अनजान कलाकारों को लेकर रिलीज हुई एड्ल्ट फिल्मों में आज जाने-पहचाने कलाकार भी काम करते देखें जा सकते हैं| अब की ‘एडल्ट’ फ़िल्में सतहीपन-स्टीरियोटाईप को चुनौती देने के नजरिए से बन रही हैं, लेकिन सतहीपन से मुक्ति की राह इतनी सीधी भी नहीं जैसा कि ये बताना चाह रहीं हैं| यह दरअसल विचारधारा के संकट का दौर है।

आज भोजपुरी सिनेमा इस बात को सम्मान मान रहा कि उसने सी व डी ग्रेड की फिल्मों अथवा मोर्निंग शो की फिल्मों को खत्म कर दिया है। लेकिन क्या वो नहीं भूल रहे कि सफाई अभियान में गंदगी की ओर झुक गए? उसका घोर रूप से हिस्स्सा बन गए! भोजपुरी सिनेमा का खुलापन शब्दों से होकर फिल्मांकन- संगीत व दृश्यों तक पहुंच गया है। कहानियों से हटकर चर्चा करें तो वहां आ रहे आईटम गानों में सेक्सुआलिटी की बडी संकीर्ण परिभाषा नजर आती है।

बड़े शहरों में अब सुबह के शो वाली सी-डी ग्रेड हिंदी फिल्में नहीं नजर आती हैं। छोटे शहर-कसबे व गांवों के सिनेमाघरों में टाईमपास के लिए यह फिल्में अब भी दिखाई जाती हैं। इनके निर्माताओं को नामकरण के लिए पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए! लेकिन फिल्मो को किस श्रेणी में रखा जाए, इस पर आप भी विचार करें| कांति शाह की फिल्मों को आप किस कतार में रखते हैं?

फिल्म चेतना का पोस्टर

व्यस्क फिल्मों के लेखक भी बडे कलाकार किस्म के हैं। एडल्ट कहानी-पटकथा लिखना जोखिम वाला काम होता है, क्या वो अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को व्यर्थ नहीं कर रहे? कहा जाता है कि इस किस्म की फिल्मों से कला व सार्थक की कामना नहीं करनी चाहिए, क्या इनकी चिता से जन्म लेने वाली मुख्यधारा व्यस्क अथवा एडल्ट कॉमेडी फिल्मों से भी कामना नहीं करें। हालीवुड की एडल्ट व स्ट्रीक्टली एडल्ट फिल्मों में भी सतहीपन होता है!  वहां की ए ग्रेड सिनेमा में खुलेपन  का असर देश में बन रही फिल्मों पर हुआ, यहां के सिनेमा में खुलापन परोसने वालों का तर्क देखिए !  एडल्ट फिल्मों के दर्शक घोर अवसाद की स्थिति में होते हैं। मन व काया पर कामुकता का विस्फोट करने वाली फिल्में आदमी का काफी नुकसान करती हैं।

आज की हॉरर हिंदी फिल्मों एवं एडल्ट कॉमेडी फिल्मों का ओवर-मेनीपुलेटेड कंटेंट मनोरंजन को लम्बी उम्र नहीं दे सकता

मानवीय रिश्तों पर फिल्में बनाने वाले फिल्मकार/निर्माता भी कंटेंट में खुलेपन को बडी चतुराई से डाल रहे हैं। कुछ युं हो रहा मानो वो नहीं किया तो फिल्म चलने वाली नहीं। इधर देखने में आ रहा कि किरदार का गाली अथवा अपशब्द बोलना लाजिमी है | साहसी फिल्मों के सारथी  लोग सेक्सुआलिटी को व्यक्त करना साहस मानते हैं। गालियों व कामुक प्रसंगों का प्रसार समाज में उन्माद की स्थिति नहीं बना रहा? अपराध व सेक्स के मेलजोल से बनी कहानियों का चलन सिनेमा में काफी समय से है। इस मामले में किरदार व कहानियां में बदलाव तो हुआ, लेकिन प्रेरणा टाईपकास्ट रही। विज्ञान व आधुनिकता के जमाने में भूत-पिशाच की हारर फिल्में बननी चाहिए थी? ज्यादातर स्त्री आत्माएं कामुक व बलाजान सुंदरी क्यों बनाई जा रही हैं? जिस कलाकारी व खुलेपन से आत्माओं का रूप-रंग गढा जा रहा, उसे देखकर मालूम पड़ता है कि फिल्मकार ने उन्हें  देखा है! रामसे व कांति शाह की हारर फिल्मों में भूत-पिशाच अमूमन कुरूप व डरावने किस्म के रहे, इनके रूप-रंग की एक नयी परिभाषा हिंदी की मुख्यधारा फिल्मों ने रची।

एडल्ट सर्टीफीकेट पर रिलीज हुई फिल्मों में मौजूद खुलापन पारिवारिक फिल्मों को भी मायाजाल में खींच लाया। पहले ‘कामेडी’ का मतलब केवल हास्य-व्यंग्य हुआ करता था। अब के दौर में कामेडी में सेक्सुआलिटी का पुट देकर एक नए किस्म के हास्य-व्यंग्य (फूहडता) को रचा गया। कहना होगा कि इस किस्म के प्रयोग मूल विधाओं को बर्बाद कर रहे हैं।

अनेक बार काफी वैचारिक कामों को अनावश्यक आईटम गानों द्वारा खराब होते देखा है । हिंदी में अब बन रही व्यस्क फिल्मों को शायद इन हिट गानों से भी प्रोत्साहन मिला होगा।  सिनेमा में सृजनात्मक संभावनाओं की अपार क्षमता हुआ करती है, एक मामूली से कहे जाने वाले प्रसंग को कहानी में ढलते देखा है। अभिवयक्त करने के पचासों तरीके फिल्मकार आजमाया करते हैं। सृजनात्मक महत्वकांक्षाओं ने फिल्मकारों को अनावश्यक चीजों तक पहुंचाया। क्या वो आवश्यक चीजों तक जा सकते थे? सिनेमा को गैर-जरूरी चीजों से बचाए रखने से ही सतहीपन से मुक्ति मिलेगी।

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सैयद एस. तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। पटना से ताल्लुक रखते हैं। सिनेमा केंद्रित पब्लिक फोरम से लेखन की शुरुआत की। सिनेमा व संस्कृति विशेषकर फिल्मों पर लेखन करते हैं।फ़िल्म समीक्षाओं में निरन्तर सक्रिय। सिनेमा पर दो ईबुक्स प्रकाशित। प्रतिश्रुति प्रकाशन द्वारा सिनेमा पर पुस्तक प्रकाशित । [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

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