मनोरंजन से आगे निकलता सिनेमा

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दिनों में फ्रांस की लुमिनीर कंपनी दुनिया भर में घूम घूम कर अपने नए अविष्कार ‘सिनेमा’ का प्रदर्शन कर रही थी। अन्य देशों की तरह सोवियत रूस के  अतिविशिष्ट लोग और साहित्यकार भी इस प्रदर्शनी के अजूबे के साक्षी बने।  इन्ही लोगों में शामिल थे महान साहित्यकार मेक्सिम गोर्की। ‘माँ’ जैसी कालजयी रचना के लेखक गोर्की ने भी उस समय की कुछ फिल्मों को देखा था। अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने लिखा था कि ‘आज लोगों को जीवन के साधारण लम्हों में आनंद नहीं आता, लेकिन यही साधारण क्षण गहरी नाटकीयता के साथ सिनेमा में उतर कर दर्शक के मन में हलचल पैदा कर देते है। मुझे आशंका है कि एक समय आएगा जब सिनेमा में दिखाई गई दुनिया वास्तविक दुनिया से आगे निकल जायेगी।’ भविष्य द्रष्टा गोर्की के शब्दों को फिल्मकारों ने अपनी कल्पनाशीलता से महज तीस चालीस वर्षों में चरितार्थ कर दिखाया!

मौजूदा समय की फिल्मों को देखे तो गोर्की की आशंका बहुत पीछे छूट गई प्रतीत होती है। सिनेमा ने वास्तविक जीवन को लगभग ‘ओवरटेक’ कर दिया है।  सिनेमा मनोरंजन के साधन मात्र से आगे बढ़कर बहुआयामी रूप में खुद को गढ़ चूका है। भाषा और संस्कृति के प्रसार प्रचार के प्लेटफॉर्म के  रूप में  उभर कर इसने सामाजिक पैठ बना ली है। दुनिया की बड़ी इ – कॉमर्स कंपनी ‘अलीबाबा’ के संस्थापक जेक मा अपने भाषणों में हॉलीवुड फिल्मों के संदर्भो के माध्यम से अपने कर्मचारियों को प्रेरित करते है। सिर्फ जेक मा ही नहीं भारत के छोटे कस्बों में अंग्रेजी सिखाने वाले संस्थान भी अमेरिकन फिल्मे लगातार देखने का सुझाव देते है। इस तरह की पहल से गैर अंग्रेजी क्षेत्रों में भी इस भाषा की पहचान बनाने में हॉलीवुड फिल्मों की बड़ी भूमिका रही है।

हांलाकि भारत में यह सुनना अजीब लग सकता है कि कोई चिकित्सक अपने  मरीज को किसी विशेष फिल्म को देखने की सलाह दे ! परंतु पश्चिमी देशों में ‘सिने थेरेपी’ की मदद से अवसाद में डूबे व्यक्ति के उपचार में इस तरह के सुझाव देना सामान्य बात हो चुकी है। मनोचिकित्सकों द्वारा किये जाने वाले ऐसे उपचार को कानूनी मान्यता भी मिल चुकी है। जीवन में आने वाली बड़ी समस्याओ के समाधान तलाशने के लिए मानसिकता बनाने में ‘परसुइट ऑफ़ हैप्पीनेस’ या ‘कास्ट अवे’ जैसी फ़िल्में मनोचिकित्सकों की पहली पसंद रही  है। भारत में लाखों लोग अवसाद, असफलता  निराशा और मनोविकारो  के शिकार रहे है परन्तु हमारा सामाजिक सोंच कुछ इस तरह बना हुआ है कि ऐसे मामलों में किसी मनोचिकित्सक की शरण में जाना जनचर्चा बन जाने के भय से ग्रस्त रहा है। अधिकांश पीड़ितों को पुरानी फिल्मों के गीत गजलों में डूबा हुआ देखा जा सकता है। यह ‘संगीत थेरेपी’ बगैर चिकित्सीय  मशवरे के  भी कारगार मानी गई है।

आम धारणा रही है कि आम आदमी  अपनी समस्याओ से पीछा छुड़ाने के लिए कल्पना की दुनिया में विचरण करता है। सिनेमा कुछ देर के लिए ही सही यहाँ  उसकी मदद करता नजर आता है। घुप्प अँधेरे में थोड़ी देर के लिए अपनी दिक्कतों से पलायन कर जाने का रोमांच और कहाँ संभव है। सिनेमा यही नहीं रुकता पलायन के आरोपों को ख़ारिज करते हुए वह दर्शक को अपने वातावरण से आगाह करता चलता है। पिछले कुछ वर्षों में देश और दुनियाभर में दर्शक को जागरूक करती कई फिल्मों का निर्माण हुआ है। बॉलीवुड में ही ऐसी दर्जन भर से ज्यादा फिल्मे दर्शको तक पहुंची जिन्होंने अलग अलग सामाजिक पहलुओं को टटोला। ‘ रंग दे बसंती ‘ के लापरवाह युवाओ को करप्शन और नौकरशाही के खिलाफ खड़ा होते देखना सुखद लगता है। ‘ थ्री इडियट्स ‘ के पात्र जड़ शिक्षा पद्धति पर सवाल खड़े करने का साहस जुटा लेते है , तारे जमीन पर ‘ का नायक शारीरिक अक्षमता से  जूझते छात्र की मदद करने में खुद को झोंक देता है , ‘ चक दे इंडिया ‘ का नायक एक बेजान हॉकी टीम में आत्मविश्वास फूंक देता है।  मेक्सिम गोर्की के दौर में बनी फिल्मे और भारत में दादा साहेब फालके द्वारा निर्मित फिल्मे भले ही आज अनगढ़ लग सकती है परन्तु यह मानना ही होगा कि  ‘चल चित्रों ‘ के सफर ने सौ वर्षों का सफर कई घुमावदार रास्तों से होकर तय किया है। अभी इसके और आगे जाने की भरपूर संभावनाएं है।

मनुष्य के मस्तिष्क की बुनावट आज भी अबूझ पहेली है। अपने अवचेतन में वह  कब कैसे क्या जमा करता जाता है स्पस्ट नहीं किया जा सकता। फिल्मों की ‘ लार्जेर देन लाइफ ‘ छवियाँ ( सकारात्मक नकारात्मक दोनों ही ) उसके मनोभावों को बनाने में अहम् भूमिका निभाती है। मनोवैज्ञानिकों का आग्रह रहा है कि दर्शक को खुद तय करना होगा कि वह अपना व्यक्तित्व कैसा बनाना चाहता है। उसे वैसी ही फिल्मे देखना चाहिए जो उसे लम्बे समय तक हास्य बोध बनाये रखते हुए प्रेरित करती रहे।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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