समय से पहले का सिनेमा

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

अमूमन सिनेमा में वही दिखाया जाता है जो वर्तमान में घट रहा होता है या घट चुका होता है। अधिकांश कथानक गुजरे वक्त की कहानियाँ कहते नजर आते है। लेखन के बाद यह इकलौता माध्यम है जहाँ वास्तविकता और कल्पना के मिश्रण की भरपूर संभावना हमेशा मौजूद रही है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बहुत से दृश्य और कहानियां  आने वाले समय की रुपरेखा और रुझान तय करने में सहायक होते हैं। फिल्मे मनुष्यों की तरह ही पैदा होती है और अपनी कालावधि पूरी कर दर्शक की स्मृतियों में दर्ज  हो जाती है। कुछ फ़िल्में अपने प्रदर्शन के  बहुत समय बाद अपने होने को सार्थक करती है। इस तरह की फिल्मे शुरुआत में बॉक्स ऑफिस पर ढेर हो जाती है परंतु समय बीतने के साथ ‘कल्ट’ बन जाया करती हैं। ये वे फिल्मे होती हैं जिन्हें इनके निर्माता निर्देशक ने मन से बनाया होता है। निर्देशक कहानी और दृश्यों के माध्यम से जो कहना चाहता है दर्शक उसे सिरे से नजरअंदाज कर देता है। अक्सर इस तरह की फ़िल्में प्रयोगधर्मी होती हैं। प्रयोगधर्मी इस लिहाज से कि निर्देशक तयशुदा फार्मूले से भिन्न कथानक पर काम करने का साहस जुटाता है।  इस श्रेणी में आने वाली फिल्मों की संख्या दो दर्जन से अधिक होगी जिन्हे उनकी रिलीज़ के समय ही ख़ारिज कर दिया गया था। समय गुजरने के साथ दर्शकों ने इन्हे देखने लायक समझा।

दर्शकों की उपेक्षा का शिकार हुई सबसे पहली फिल्म थी ‘नीचा नगर’ (1946) इसके निर्माता रशीद अनवर थे। सदा युवा अभिनेता देवानंद के बड़े भाई चेतन आनंद ने इस फिल्म का निर्देशन किया था। मेक्सिम गोर्की की एक कहानी से प्रेरित इस फिल्म ने समर्थ और असहाय के बीच खींची लकीर को उभारा था। कथानक इतना समसामायिक है कि आज सात दशक बाद भी प्रासंगिक है। आज ‘कांस फिल्मोत्सव’ का नाम  और महत्व  औसत दर्शक भी जानता है परंतु 1946 में इस फिल्म ने प्रतिष्ठित ‘पाम डी आर’ पुरूस्कार जीतकर सनसनी मचा दी थी।

ख्वाजा अहमद अब्बास इस फिल्म के सह लेखक थे और अभिनेत्री  कामिनी कौशल बतौर नायिका पहली बार रुपहले परदे पर अवतरित हो रही थी। प्रख्यात नृत्यांगना जोहरा सहगल की भी यह पहली फिल्म थी। ख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर ने पहली बार किसी फिल्म में संगीत दिया था वह यही फिल्म थी। इतने सारे अच्छे एलिमेंट्स होने के बाद भी भारतीय दर्शकों ने इसे देखने लायक नहीं समझा। गीत विहीन दो घंटे सात मिनट की फिल्म अगर सोशल फिलॉसोफी की बात करे तो भला दर्शक क्यों उधर आना चाहेगा जबकि उस दौर में बीस पच्चीस गीतों से लदी फैंटेसी  फिल्मों का विकल्प बहुतायत में उपलब्ध था! दर्शकों के रवैये से क्षुब्ध होकर  रशीद अनवर साहब  इस फिल्म का प्रिंट लेकर पाकिस्तान चले गए।

देश को पहला अंतराष्ट्रीय पुरस्कार दिलाने वाली फिल्म का प्रिंट उसके निर्माता के पास था। भारत के पास सिर्फ एक खबर थी कि उसकी फिल्म को एक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। उस समय तक भारतीय सिनेमाई क्षितिज पर सत्यजीत रे का उदय नहीं हुआ था। 1955 में सत्यजीत रे ने ‘पाथेर पांचाली’ से एक बार फिर भारत को विश्व सिनेमा  के नक़्शे में शामिल कराया।

कुछ सालों बाद  रे साहब के कैमरा मेन सुब्रत मित्रा को कबाड़ में  एक डिब्बा मिला। इस डिब्बे में एक फिल्म के नेगटिव थे।  मित्रा साहब इस कबाड़ को खरीद लाये।  बाद में जब प्रोजेक्टर पर इसे चलाया गया तो पता लगा कि यह ‘नीचा नगर’ का प्रिंट है। देश को सम्मान दिलाने वाली इस अभागी फिल्म को अब राष्ट्रीय अभिलेखागृह में संरक्षित किया गया है। यूट्यूब चैनल पर भी इस फिल्म को देखा जा सकता है।

निर्देशक चेतन आनंद की पत्नी उमा आनंद ने अपनी पुस्तक ‘पोएटिक्स ऑफ़ फिल्म’ में एक दिलचस्प उल्लेख किया है। जब चेतन आनंद इस फिल्म को प्रदर्शित करने के लिए डिट्रिब्युटर्स से विनती कर रहे थे तब उन्हें कलकत्ता से एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र  लिखने वाले ने लिखा कि उसे ‘नीचा नगर’ की वजह से अपनी पहली फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली है। पत्र के अंत में लेखक ने अपना नाम लिखा था – सत्यजीत रे!

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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