एक चुलबुले सवाल के 25 वर्ष: हम आपके हैं कौन..!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

सन् 1947 में देश की आज़ादी के साथ ही एक फिल्म कंपनी अस्तित्व में आई। इस कंपनी की शुरुआत की थी ताराचंद बड़जात्या ने, जो कि मूलतः राजस्थान से आकर बंबई में अपने सपने तलाश रहे थे। कंपनी का नाम रखा गया ‘राजश्री पिक्चर्स ‘ जो कालांतर में राजश्री प्रोडक्शंस बना। बीते सात दशकों में राजश्री ने पारिवारिक और सामजिक सोद्देश्य की फिल्में बना और इसी तरह की फिल्मों का वितरण कर अपनी अलग पहचान बनाई है। साल 1962 में इस प्रोडक्शन की पहली फिल्म आरती दर्शकों के साथ समालोचकों को भी पसंद आई। अगली ही फिल्म दोस्ती (1964) ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी। इस फिल्म के दोनों ही नायक साधारण परिवेश से आये थे। फिल्म की सफलता राजश्री के लिए पहला नेशनल अवार्ड भी लेकर आई। तब से लेकर अब तक राजश्री लगभग साठ फिल्में निर्मित कर चुका है और एक हजार फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन। यह इकलौता प्रोडक्शन हाउस है जिसने सबसे ज्यादा नई प्रतिभाओं को मौका दिया है।

वर्तमान में इस प्रोडक्शन की कमान परिवार की तीसरी पीढ़ी के हाथ में है। ताराचंद बड़जात्या के पोते सूरज बड़जात्या पारिवारिक फिल्मों की परंपरा को सहेजते हुए फिल्म निर्माण और निर्देशन में व्यस्त हैं। वर्ष 1989 में प्रदर्शित मैंने प्यार किया ने न केवल सूरज बड़जात्या को निर्देशक के रूप में पहचान दिलाई बल्कि सलमान खान को भी दूसरी ही फिल्म से स्टार बना दिया।

सन् नब्बे से देश में बहुत से परिवर्तन हो रहे थे। कुछ स्पष्ट से दिखाई दे रहे थे तो कुछ सतह के नीचे आकार ले रहे थे। सेटेलाइट टेलीविजन की बदौलत चकाचौंध कार्यक्रम छोटे परदे पर बरसना आरंभ हो गए थे। सांता बारबरा, द बोल्ड एंड ब्यूटीफुल जैसे बोल्ड धारावाहिक बेधड़क घर की बैठक में पसर रहे थे। इन चैनलों में दूरदर्शन की तरह समय की कोई पाबंदी नहीं थी, फलसवरूप सिनेमाई दर्शक घर में ही अटक रहे थे। सिनेमा के इस संक्रमण काल को वीडियो कैसेट लायब्रेरियों ने और गहरा कर दिया था। इसी समय बड़जात्या परिवार में अगली फिल्म को लेकर मंथन चल रहा था। मैंने प्यार किया की सफलता ने और बड़ी सफलता के लिए प्रेरक माहौल बनाना आरंभ कर दिया था। नई कहानियों और पुरानी पटकथाओं को टटोला जा रहा था। सूरज बड़जात्या अपना कौशल दिखा ही चुके थे तो निर्विवाद रूप से उन्हें ही अगली फिल्म निर्देशित करना था।

कहानी की खोज अपने ही बैनर की फिल्म नदिया के पार (1982) पर जाकर ठहरी। दर्शकों को याद होगा कि पारिवारिक प्रेम और बलिदान के रेशों से गुंथी ग्रामीण पृष्टभूमि की इस फिल्म ने जबरदस्त सफलता पाई थी। गीत संगीत के लिहाज से भी नदिया के पार इक्कीस थी। सूरज बड़जात्या ने इसी कहानी को शहरी कलेवर देकर एक बार पुनः लिखना आरंभ किया। इक्कीस माह की ड्राफ्टिंग की मेहनत का परिणाम हम आपके हैं कौन..! की पटकथा के रूप में सामने आया। हांलाकि अब तक फिल्म का शीर्षक तय नहीं हुआ था। पटकथा के बाद कास्टिंग, शूटिंग, फोटोग्राफी, गीत-संगीत संयोजन, एडिटिंग ने दो साल का वक्त और ले लिया।

5 अगस्त 1994 को फाइनली हम आपके हैं कौन..! ने सिल्वर स्क्रीन का मुंह देखा। आज 25 बरस बाद जब इस फिल्म के बारे में बात करते हैं तो बहुत सारे बदलाव नजर आते हैं जो सिर्फ इस फिल्म की वजह से हिंदी सिनेमा में दिखाई दे रहे हैं।

राजश्री ने इस फिल्म को शुरुआत में सिर्फ 35 स्क्रीन पर ही रिलीज़ किया था क्योंकि वह दौर ज़बरदस्त पायरेसी का था। फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन का यह नायाब तरीका था। कम स्क्रीन के साथ फिल्म रिलीज़ करने से उसकी पायरेसी पर नियंत्रण लगाया जा सकता था। इस समय ऐसा माहौल था कि फिल्म रिलीज़ होते ही उसकी कैसेट बाजार में आ जाती थी। ऐसे में सिनेमाघर जाकर उन्हें देखने की ज़हमत कौन उठाता?

शुरुआत में फिल्मों के सभी जानकारों ने इस फिल्म को खारिज करते हुए इसके फ्लॉप होने की भविष्यवाणी कर दी थी। इसे किसी विवाह की वीडियो कैसेट की तरह प्रचारित किया जा रहा था क्योंकि पहली बार किसी फिल्म में शादी के प्रसंग को इतनी ज्यादा फुटेज दी गई थी। परन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया दर्शक सिनेमाघर का रुख करते गए। फिल्म में कुल चौदह गाने थे और धीरे-धीरे वे लोगों को लुभा रहे थे। चौदह में से ग्यारह गीतों को लता मंगेशकर ने आवाज दी थी. आज पच्चीस बरस बाद भी सभी गीत कितनी ही बार सुनने के बाद भी ऊब पैदा नहीं करते।

बयालीस करोड़ के बजट से बनी हम आपके हैं कौन…! ने जब अपना सफर आरम्भ किया तो छः हफ़्तों तक दर्शकों की कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं सुनाई दी। चूँकि राजश्री ने फिल्म को बेचा नहीं था इसलिए चिंता की कोई वजह नहीं थी। एक बार फिल्म ने चलना शुरू किया तो अब तक अनसुने आंकड़े सुनाई देने लगे। फिल्म ने सौ करोड़ की कमाई के सुनहरी क्षितिज को पार कर दिया। यह ऐसी घटना थी जो इससे पहले भारतीय सिनेमा में नहीं दिखाई दी थी।

देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोग सिनेमाघरों की और लौटने लगे थे। परिवार एक उत्सव है और विवाह त्योहार की तरह मनाया जा सकता है – यह बात इससे पहले किसी फिल्म ने रेखांकित नहीं की थी। हम आपके हैं कौन…! की वजह से रीते सिनेमा हाल गुलजार होने लगे थे। इधर फिल्म ने दो सो करोड़ की कमाई के अंक को छुआ उधर विदेशों में भी 64 करोड़ डॉलर की कमाई का पहाड़ खड़ा कर दिया। यह पहली बार हो रहा था लिहाजा ‘गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स’ ने इसे मील का पत्थर मानते हुए अपनी सूची में शामिल किया।

फिल्म ने न केवल अप्रवासी भारतीयों को देश से जोड़ा वरन विवाह की रस्मों पर भी गहरा असर डाला। गीतों का माधुर्य , नायक-नायिका की ताजगी एवं दो परिवारों की चुहलबाजी ने फिल्म की रिपीट वैल्यू को बढ़ा दिया। हम आपके हैं कौन..! फिल्मों के उस छोटे से समूह (किस्मत 1943, मदर इंडिया 1957 ,मुगले आजम 1960, शोले 1975) का हिस्सा बनी जिन्हें वर्षों से बारम्बार देखा जा रहा है। फिर अगर मरहूम चित्रकार एम् ऍफ़ हुसैन ने इसे साठ बार या करण जौहर ने पच्चीस बार देखा तो वे गलत नहीं थे।

लता मंगेशकर ने अब तक अवार्ड्स फंक्शंस से रिटायरमेंट ले लिया था। वे किसी भी तरह के पुरस्कार नहीं स्वीकार रही थीं, चुनांचे एक देशव्यापी अपील की गई कि स्वर कोकिला को अपने गीतों के लिए फिल्म फेयर अवार्ड लेना ही पड़ेगा। लता जी को अपने प्रशंसकों की ज़िद के आगे नतमस्तक होना पड़ा। परंपरा और आधुनिकता के मध्य सेतु निर्मित करती हम आपके हैं कौन..! ने पांच फिल्म फेयर के साथ उस वर्ष का नेशनल अवार्ड भी हासिल किया। लंदन में इस फिल्म पर आधारित नाटक ‘ फोर्टीन सांग टू वेडिंग एंड अ फ्यूनरल’ का मंचन वर्षों तक हुआ। हम आपके हैं कौन…! ने फिल्म के हर किरदार को लोकप्रियता के आसमान पर बैठा दिया। फिल्म का हिस्सा रहे ‘टफी’ डॉग को भी एक पत्रिका के सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान मिला।

इस फिल्म ने इस तथ्य को भी  स्थापित किया कि बगैर अश्लीलता, बगैर द्विअर्थी संवादों, बगैर खलनायक, बगैर हिंसक दृश्यों के भी ऐसी फिल्म बनाई जा सकती है जिसका  परिवार का हर सदस्यसाथ बैठकर आनंद ले सके।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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