ये रास्ते हैं रीमेक के !

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/
रजनीश जे जैन/

दक्षिण से भारत में प्रवेश करने वाला मानसून सबसे पहले केरल में वर्षा कराता है और और फिर मुंबई को भिगोता है। सिनेमाई आकाश में भी चीज़ें अमूमन इसी क्रम में घटती  दिख रही हैं। वैश्विक स्तर पर भले ही बॉलीवुड की अपनी अलग पहचान बनी है परंतु, नई कहानी, पटकथा, वीएफएक्स के प्रयोग जैसे क्षेत्रों में टॉलीवूड (तमिल तेलुगु कन्नड़) बॉलीवुड से कई कदम आगे रहा है। इतना ही नहीं, वह सारे नये प्रयोग बॉलीवुड को आउटसोर्स भी कर रहा है! भारत की पहली सवाक फिल्म ‘आलम आरा (1931) के सात महीने बाद ही तमिल में  ‘कालिदास’  रिलीज़ कर दी गई थी।  ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि ‘कालिदास’ ‘आलम आरा’ की जगह ले सकती थी। दुर्भाग्यवश दोनों ही फिल्मों के  प्रिंट आज मौजूद नहीं हैं।

आज बॉलीवुड धड़ल्ले से तमिल तेलुगु फिल्मों के रीमेक बना रहा है। यह बात प्रत्यक्ष रूप से  भले ही शर्मिंदा न करती हो परंतु इस सच्चाई को तो रेखांकित करती ही है कि मायानगरी में मौलिकता का जबरदस्त अकाल चल रहा है!  बॉलीवुड का दक्षिण प्रेम यूँ ही नहीं परवान चढ़ा। दक्षिण के ही सफल निर्माता निर्देशकों के बालाचंद्र, दासरी नारायण राव, राघवेंद्र राव आदि ने सत्तर के दशक में अपने क्षेत्रीय दायरे को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने के लिए अपनी ही फिल्मों के ‘रीमेक’ हिंदी में बनाने की शुरुआत की थी। बाद के दौर में देखते-देखते यह चलन कब प्रचलन में आ गया दर्शक समझ ही नहीं पाए। गुजरे ज़माने के अभिनेता जीतेन्द्र एक समय हिंदी फिल्मों से लगभग ख़ारिज कर दिए गये थे। जुदाई, ,रास्ते हैं प्यार के, हिम्मतवाला , मवाली , जस्टिस चौधरी  जैसी दक्षिण भारत की रीमेक फिल्मों से उन्होंने हिंदी सिनेमा में जगह बनाई।

हिंदी दर्शकों के लिए कुछ आँखे खोल देने  वाले तथ्य  जान लेना भी जरुरी है कि किस तरह बॉलीवुड क्षेत्रीय सिनेमा के सामने पिछड़ता जा रहा है। केवल  2018 के आंकड़े ही इस ट्रेंड की सच्चाई बयान कर देते हैं। गत वर्ष में ही तेलुगु की 140 फिल्मे प्रदर्शित हुई हैं, वहीं तमिल की 180 और कन्नड़ की 122 फिल्मों के मुकाबले हिंदी की महज 116 फिल्में ही सिनेमाघर तक पहुँच पाईं हैं।

यह माना जाता रहा है कि रीमेक फिल्में बनाने की सीधी सी वजह है उनमें आर्थिक जोखिम लगभग न के बराबर होता है। एक हद तक यह बात सही भी है. पर  कई रीमेक फिल्मों की असफलता ने इस मान्यता को ध्वस्त किया है। सफल और शूरवीर टाइप के निर्माता भी जब रीमेक की आड़ में खड़े नजर आते हैं तो उनकी स्थिति पर तरस आता है। बॉलीवुड इस समय  मौलिकता के संकट से गुजर रहा है। उधार की कहानी, यहाँ वहाँ से उठाया हुआ संगीत, कहीं से चुराया हुआ प्लॉट! मतलब न के बराबर मौलिकता।

कुछ ही दिनों में एक और बेहद सफल तेलुगु फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’, हिंदी में  ‘कबीर सिंह’ के नाम से रीमेक होकर प्रदर्शित होने जा रही है। तेलुगु वर्ज़न को निर्देशित कर चुके संदीप रेड्डी वंगा ने ही हिंदी वर्ज़न भी निर्देशित किया है

इस समय  न केवल फिल्में बल्कि संगीत और गीतों के वास्तविक स्रोत इंटरनेट की वजह से पकड़ में आ रहे हैं, बल्कि देश के दूर दराज में पसरी प्रतिभा को भी उन्मुक्त आकाश में विचरण का  मौका दे रहे हैं। यूट्यूब पर ऐसे युवा शोधकर्ताओं की आमद बढ़ गई है जो साठ के दशक से लेकर मौजूदा समय तक के गीत-संगीत की मौलिकता की पड़ताल कर रहे हैं। इन उत्साही  यूट्यूबर की वजह से कई नामचीन संगीतकार और गीतकारों के चेहरे से नकाब उतर गए हैं। चूँकि आम दर्शक के पास इतना समय नहीं होता है कि वह इतनी जांच-पड़ताल करे परंतु जब भी  उसे वास्तविकता का पता चलता है तो उसे अफ़सोस होता है कि उसकी ‘प्रशंसा’ कोई यूँ ही लूटकर ले गया है।

कुछ ही दिनों में एक और बेहद सफल तेलुगु फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ हिंदी में  ‘कबीर सिंह’ के नाम से रीमेक होकर प्रदर्शित होने जा रही है। तेलुगु वर्ज़न को निर्देशित कर चुके संदीप रेड्डी वंगा ने ही हिंदी वर्ज़न निर्देशित किया है। घोर विवादास्पद परंतु सफल ‘अर्जुन रेड्डी’ निश्चित रूप से हिंदी दर्शक जुटा ही लेगी। निर्माता निर्देशक के बैंक एकाउंट में भी कुछ शून्य और बढ़ जाएंगे परंतु दर्शक को क्या मिलेगा ?

न केवल बड़ा स्क्रीन बल्कि छोटा स्क्रीन भी इस रीमेक की बीमारी की  जद में आ चुका है। टेलीविज़न के अधिकांश लोकप्रिय शो किसी न किसी विदेशी चैनल पर आनेवाले शो का रीमेक रहे हैं। हमने अपना कुछ भी मौलिक न के बराबर रचा है। वेब पोर्टल्स पर इन दिनों वेब सीरीज का पदार्पण हुआ है। थोड़ा अंदर उतर कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें भी आईडिया उधार का ही है। हॉटस्टार पर इस समय ‘क्रिमिनल जस्टिस’ की धूम है। पंकज त्रिपाठी और जैकी श्रॉफ के नाम पर जब आप इसे देखते हैं  तो याद आता है कि बीबीसी कई बरस पहले इसी नाम और इसी विषय वस्तु पर आधारित शो दिखा चुका है और अमेरिकन टीवी एच बी ओ पर इसी नाम का शो पहले से चल रहा है!

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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