लालच और पतन की कहानियाँ

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन
रजनीश जे जैन

पिछले दिमों देश की शीर्ष विमानन कंपनी जेट एयरवेज के ज़मीन पर आ जाने की दास्तान ने ऐसे लोगों का भी ध्यान आकर्षित किया है जिन्होंने सिर्फ आकाश में सफ़ेद लकीर छोड़ते हवाई जहाज को उड़ते देखा है। बिज़नेस और कॉर्पोरेट जगत की खबरें रोज़ाना ही मीडिया की सुर्खियां बनती हैं परन्तु उन्हें देखने पढ़ने वाला व्यक्ति इन ख़बरों को अक्सर नज़रअंदाज़ ही करता है। सामान्य जनधारणा रही है कि यह बड़े लोगों की दुनिया है इससे हमें क्या सरोकार? यही वजह रही है कि हमारे फिल्म जगत ने भी इस विषय पर कहानियाँ तलाशने की कोशिश नहीं की जिन्हें परदे पर उतारा जा सके।

हिंदी फिल्में अपनी कहानियों में पात्रों को बिजनेसमैन या उद्योगपति तो बताती हैं परंतु उसका चित्रण रस्म अदायगी से  ज्यादा नहीं होता। सतही तौर पर इस बात से संदेश जाता दिखाई देता है कि फिल्म उद्योग कॉर्पोरेट जगत को बेरंग और ग्लैमरहीन मानता है।

गुजरे समय में गहरे न उतरते हुए, सिर्फ पिछले बीस बरसों के ही  बही-खाते ही टटोले जाएँ जाए तो हमारे हाथ वे हैरतअंगेज कॉर्पोरेट कहानियां लगेंगी जिनमें भरपूर इमोशनल  ड्रामा है, एक्शन भी है, षड्यंत्र भी है और परोपकारिता के किस्से भी हैं। फिल्मकार अक्सर इस बात की दुहाई देते नजर आते हैं कि नये विषयों पर कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है, चुनांचे पुराने विषयों को दोहराना और रीमेक बनाना उनकी मज़बूरी है! यह इस समस्या का आधा सच है। पूरा सच तो यह है कि व्यावसायिक जगत के पात्रों को कहानी का हिस्सा बनाना इतना आसान नहीं है। यह  गहरे शोध का विषय है क्योंकि तथ्य में थोड़ी सी भी लापरवाही मानहानि का नोटिस लेकर प्रकट हो सकती है। हमारे देश के बहुत से  कॉर्पोरेट घराने फिल्मों के लिए फाइनेंस उपलब्ध कराते रहे हैं परंतु डॉक्यूमेंट्री या फिल्म की शक्ल में खुद परदे पर उतरने से परहेज करते हैं। इसी संकोच का परिणाम है कि बॉलीवुड के क्षितिज पर इस विषय से संबंधित एक दो फिल्में ही नजर आती हैं। 2006 में आई मधुर भंडारकर की ‘ कॉर्पोरेट ‘ इस जॉनर की अच्छी  फिल्म है।

हॉलीवुड इस मामले में थोड़ा उदार रहा है। वहाँ आर्थिक जगत की उथल-पुथल को सिनेमाई दस्तावेज में बदलने के हर संभव प्रयास का इतिहास काफी पुराना है। साधारण टीवी अभिनेता से प्रसिद्धि के शिखर पहुँचने वाले ओर्सन वेल्स द्वारा निर्मित, निर्देशित एवं अभिनीत ‘सिटीजन केन’ (1941) एक पैदाइशी करोड़पति  बिजनेसमैन के मन में पल रही इच्छाओ , लालच और कभी न मिटने वाली पैसे की भूख को दर्शाकर मास्टरपीस की श्रेणी में दाखिल हुई है। साल 2001 में, एक समय अमेरिकी शेयर बाजार की लाड़ली कंपनी ‘ एनरॉन कारपोरेशन ‘ के पतन ने कई लोगों को सड़क पर ला दिया था। ऊर्जा क्षेत्र की यह बड़ी  कंपनी महज एक रात में बिखर गई थी। इस घटना पर पांच भागों में बनी डॉक्यूमेंट्री ‘ एनरॉन द स्मार्टेस्ट गाय इन द रूम (2005)  कंपनी की  गड़बड़ियों के हर एक पहलु से दर्शक को रूबरू कराती है। वर्ष 2008 के आर्थिक संकट को केंद्र में रखकर ओलिवर स्टोन निर्देशित ‘वाल स्ट्रीट: मनी नेवर स्लीप’ स्टॉक मार्केट और आर्थिक जगत के क्रूर रवैये को सहजता से दर्शाती है। मार्टिन स्कॉर्सेस निर्देशित एवं लेनार्डो डी केप्रियो अभिनीत ब्लैक कॉमेडी ‘वुल्फ ऑफ़ वाल स्ट्रीट’ (2013 ) भोले-भाले  निवेशकों को सुनियोजित ढंग से लूटने वाले स्टॉक ब्रोकर्स की कारगुजारियों को उजागर करती है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और संस्थाओं में फैले भ्रष्टाचार और उसके प्रभावों की सिलसिलेवार परते उघाड़ती डॉक्यूमेंट्री ‘इनसाइड जॉब’ (2010) हरेक जागरूक नागरिक को देखना जरुरी है। क्योंकि भ्रष्टाचार का रंग पूरी दुनिया में लगभग एक सा ही है।

अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले पर डॉक्यूमेंट्री ‘फेरेन्हाईट 9/11’ बनाकर पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुए माइकेल मूर ने आर्थिक जगत के लालच और काली गतिविधियों पर भी अपना कैमरा चलाया है। उनकी डॉक्यूमेंट्री ‘ कैपिटलिज्म: अ लव स्टोरी ‘ बढ़ते पूंजीवाद के खतरों की हकीकत बयान करती है।

आर्थिक घोटाले और कॉर्पोरेट धोखेबाजी हमारे देश में जिस रफ़्तार से घटित हो रहे हैं और जिस तरह आरोपी खुद को  सुरक्षित बचाये हुए हैं उसने इस बात को बल  दिया है कि ‘पैसा बोलता है’।

पैसे के प्रभाव और राजनैतिक रसूख के चलते जो सच हम तक पहुँचता है बह ‘टिप ऑफ़ द आइसबर्ग’ से ज्यादा नहीं होता।

फिल्मकार चाहे तो अपनी फिल्मों के माध्यम से खोजी पत्रकारिता के अभाव में उपजे खालीपन को भर सकते हैं।  निर्विवाद व सम्मानीय उद्योगपति  अजीम प्रेमजी, नारायण मूर्ति, रतन टाटा, अदि गोदरेज, कुमार बिड़ला, लक्ष्मी मित्तल – कुछ  ऐसे नाम हैं जिनकी जीवन यात्रा पर प्रेरक डॉक्यूमेंट्री या फीचर फिल्म बनाई जा सकती है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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