ईरान अमरीका विवाद से उपजी फिल्म: आर्गो

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

अमेरिका ने दुनिया भर में अपनी छवि सुपर हीरो की बना रखी है। कहीं भी कोई झंझट खड़ी होती है वह उसे सुलझाने आ पहुँचता है। फिर चाहे उसे मात ही क्यों न खाना पड़ा हो। कूटनीतिक हो या सामरिक दोनों ही क्षेत्रों में अमेरिकी अपनी टांग अड़ाते जरूर नजर आ जाते है। शायद यह बात उनके चरित्र का हिस्सा बन गई है इसीलिए वहां चुनावों में घरेलु मुद्दों के बजाए विदेश नीति पर ज्यादा ध्यान दिया जाता रहा है।

बीते चार दशकों से अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में कड़वाहट बढ़ती रही है। ईरान को परमाणु शक्ति बनने का शौक चर्राया हुआ है और अमेरिका किसी भी कीमत पर ऐसा होने नहीं देना चाहता। पिछले कुछ सप्ताह में ये दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुँच कर वापस लौटे है। इस तनातनी में अमेरिका ने अपने दो तेल टेंकर और एक बहुत ही महंगा जासूसी ड्रोन गँवा दिया है। बदले में अमेरिका ने ईरान के सामरिक और महत्वपूर्ण संस्थानों पर सफलतम सायबर हमला बोला है और कई प्रतिबन्ध लागू कर दिए है ।

दुनिया सांस थाम कर शुक्र मना रही है कि ये दोनों इसी हद में रहे और बात आगे न बड़े। अगर आमने सामने की लड़ाई होती है तो यह केवल इन दोनों के बीच की बात नहीं रहेगी वरन आधी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगी। इस समस्या को समझने के लिए सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों की घटनाओ की तह में जाना जरुरी है।

पहलवी वंश के अंतिम शासक शाह रजा पहलवी ईरान की सत्ता पर काबिज थे। पश्चिमी रंग ढंग में रंगे शाह पर अमेरिका का वरदहस्त था जो धार्मिक नेताओ को नागवार गुजरता था। ऐसे ही एक धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमेनी ने शाह के खिलाफ क्रांति का शंखनाद कर दिया जिसे शुरुआत में छात्रों के साथ सभी वर्ग के लोगों का समर्थन प्राप्त था। चुनांचे शाह को ईरान छोड़ अमेरिका की शरण लेना पड़ी और सत्ता की चाबी खोमेनी के पास आ गई।

इसी दौरान एक भीड़ ने अमेरिकी दूतावास को घेर लिया।  कुछ लोग बंधक बना लिए गए और छः लोग निकल भागने में कामयाब हो गए। ये लोग भीड़ से तो बच गए परन्तु ईरान से बाहर नहीं निकल पाए। 1979 से 1981 तक चली लुका छिपी में ये दूतावास के कर्मचारी कभी ब्रिटेन के दूतावास में तो कभी कनाडा के दूतावास की मदद से अपनी जान बचाते रहे।

इसी दौरान अमेरिकी गुप्तचर संस्था सीआईए ने इन लोगों की सुरक्षित वापसी के लिए एक योजना तैयार की जिसे नाम दिया गया ‘आर्गो’। इस योजना को सफल बनाने की जिम्मेदारी सीआईए के हरफनमौला एजेंट ‘टोनी मेंडेज़’ को दी गई जो वेश बदलने, जाली दस्तावेज बनाने में माहिर थे। टोनी मेंडेज़ ने एक नामी हॉलीवुड फिल्म निर्माता का वेश धारण कर विज्ञान फंतासी फिल्म की शूटिंग ईरान में करने की अनुमति हासिल कर ली। एक रोमांचक घटनाक्रम में वे सभी अमेरिकी नागरिकों को ईरान से बाहर निकालने में कामयाब हुए। अपने नागरिकों के ईरान में फंस जाने से तात्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर को अपने ही देशवासियों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा और अंतराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी भी झेलना पड़ी थी।

इस सत्य घटना पर 2012 में हॉलीवुड के जाने पहचाने अभिनेताओं बेन एफ्लेक, जॉर्ज क्लूनी और ग्रांट हैस्लोव ने अपने साझा प्रयास से ‘आर्गो’ बनाई। इन अभिनेताओं की चर्चित फिल्मे भारतीय दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय रही है। बेन एफ्लेक इस फिल्म में ‘ टोनी मेंडेज़’ की केंद्रीय भूमिका निभाते नजर आते है। चूँकि फिल्म पूरी तरह से वास्तविक घटना पर आधारित है तो इसके तकनीकी पक्ष पर खासी मेहनत की गई है। पात्रों की वेशभूषा, ईरानियों का अंग्रेजी बोलने का लहजा, ईरान की सड़कों पर प्रदर्शन, सरेआम फांसी देने के दृश्य वीएफएक्स तकनीक से प्रभावशाली बन पड़े है। कथानक की बारीकियों  को पटकथा में बदलने में भी सीआईए ने सहयोग किया है। पटकथा इतनी चुस्त है कि विशेष घटनाक्रम न होने के बाद भी दर्शक को बांधे रखती है। यह पहला अवसर था जब किसी अभियान के लिए हॉलीवुड और सीआईए साथ आये थे।

आम दर्शक प्रायः सिनेमा के तकनीकी पहलुओं पर ध्यान देने की कवायद नहीं करता। इस फिल्म के क्लाइमेक्स को देखते हुए एडिटिंग  के कमाल को महसूस किया जा सकता है। बेन एफ्लेक ने अभिनय और निर्देशन दोनों ही क्षेत्रों में प्रशंसनीय काम किया है।  85 वे ऑस्कर अवार्ड समारोह (2013) में ‘आर्गो’ ने तीन पुरूस्कार हासिल किये थे और तीनो ही इसके तकनीकी पहलुओं की वजह से संभव हुए, बेस्ट पिक्चर, बेस्ट स्क्रीनप्ले एवं बेस्ट एडिटिंग। इसी तरह 66 वे बाफ्टा पुरूस्कार और 37वें होची पुरुस्कारों में भी ‘आर्गो’ पुरुस्कृत की गई। आर्गो को मिले बेस्ट फिल्म के ऑस्कर को एक घटना ने और महत्वपूर्ण बना दिया।

ऑस्कर के इतिहास में पहली बार बेस्ट फिल्म का लिफाफा वाइट हाउस में खोला गया। तात्कालीन फर्स्ट लेडी मिशेल ओबामा ने वीडियो कॉन्फ्रंसिंग के जरिये ‘आर्गो’ को बेस्ट फिल्म घोषित किया। ऐतिहासिक  घटनाओ पर बनी  रोचक और प्रभावशाली  फिल्म देखने वाले दर्शकों को  ‘आर्गो’ अवश्य देखना  चाहिए।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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