अंधाधुन हमारे समाज में मौजूद शक्ति संरचना पर अनवरत कमेंट्री है

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चंदन पांडेय/

आपने कोई फ़िल्म ऐसी देखी है, जिसे देखते ही आप बेचैन हो जाएँ, जिसे देखने के बाद भी बेचैनी बढ़ती रहे और बहुत देर बाद तक वो बेचैनी तारी रहे? ऐसी कोई फिल्म जो अपने प्रभाव में डुबा दे?

नहीं देखी हो तो देख आइये और देखी हो तो आइए दुबारा देखते हैं.

अंधाधुन!

अविश्वसनीय. अकल्पनीय. मैं तो इसी बात की अतिरिक्त खुशी लिए बैठा हूँ कि हिंदी में इतनी गजब की फ़िल्म बन सकती है.

इस फ़िल्म में रौशनी का किरदार वही है जो किरदार हमारी जिंदगी में विवेक, नीति और न्याय भावना का है. अंधाधुन की सबसे बड़ी खूबी है कि प्रत्येक अन्याय के वक्त जो नायक की लाचारी दिखती है, वो हमारी अपनी लाचारियों की याद तुरन्त दिला देता है. वहीं के वहीं. लगेगा कि आप हैं, खुद आप, जिसका चश्मा लिफ्ट में गिर गया है. आप हैं, खुद आप, जिसने लाश लाँघी है. और यह खुद आप हैं जिन्हें इसका अभिनय करना है कि लाश तो आपने देखी ही नहीं. लाश तो वहाँ है ही नहीं.

अंधाधुन को थ्रिलर कहना नाफरमाबरदारी है. एक पल के लिए आप परदे से निगाह हटा नहीं सकते तो भी थ्रिलर तो महज इसका तेवर है. इस फ़िल्म का कथानक एक आईना है, बड़े परदे का विशाल आईना, जिसके पीछे की लालछौंहा परत कहीं कहीं से उघड़ गई है, जिसमें आर पार भी दिखता है और अपना चेहरा भी.

उस आदमी की मनःस्थिति सोचिए जिसके सामने एक लाश है और उसे कमाल का पियानो बजाना है. कला जो जिंदगी से टीडीएस काटती है उसके एवज में कठकरेज बनाती है.

फ़िल्म की कहानी नहीं बता सकता इसलिए एक दृश्य बताता हूँ कि एक आदमी हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराने पुलिस थाने पहुँचता है और वहाँ उसे जो दिखता है उसके असर में अपनी बिल्ली के गुम होने की रिपोर्ट लिखा कर चला आता है. उसे ऐसा क्या दिख गया होगा?

तब्बू का किरदार जिसने लिखा होगा उस पर भविष्य में नजर रखनी चाहिए. खजाना छिपा है

फ़िल्म की कहानी नहीं बता सकता इसलिए फ़िल्म की कर्णधार के बारे में बताऊँगा. तब्बू. उनके अभिनय से यह फ़िल्म सँवर पाई है. तब्बू इस फ़िल्म की आत्मा हैं. अस्तित्व, चांदनी बार, दृश्यम के बाद एक और बेजोड़ किरदार निभाया है.

आयुष्मान ने मुँह चुमियाना (गोल करना) कम किया है और अच्छा अभिनय किया है. फ़िल्म इतना डरा चुकी थी कि जाकिर हुसैन को पर्दे पर देख कर राहत की साँस आई कि क्या पता अब कुछ अच्छा हो, लेकिन अच्छा क्यों होने लगा! पाँच लेखकों की टीम ने इस फ़िल्म को लिखा है: अरिजीत विश्वास, योगेश चांदेकर, हेमन्त राव, पूजा लाढा सूरती और खुद श्रीराम राघवन. इन पाँचों को क्रमशः पाँच पाँच सितारे मिलने चाहिए.

तब्बू का किरदार जिसने लिखा होगा उस पर भविष्य में नजर रखनी चाहिए. खजाना छिपा है. आश्चर्य तो यह कि फ़िल्म का चुस्त सम्पादन भी पूजा लाढा ही ने किया है. डेनियल बी जॉर्ज का संगीत ठीक है, इसलिए ठीक है कि फ़िल्म को डूबने नहीं देता. अनिल धवन, अश्विनी कालेष्कर, मानव विज सबने अपने पार्ट बखूबी निभाए हैं.

यहाँ यह कहते हुए मैं अपनी बात समाप्त करता कि अंधाधुन हमारे समाज में मौजूद शक्ति संरचना पर अनवरत कमेंट्री है, जहाँ उसे ही दिखने का, आँखे सलामत रखने का हक है, जो शक्तिशाली है. जो शक्तिहीन है, उसके लिए आंखों की रौशनी उसके अपराधबोध बढ़ाने का टूल भर हो कर रह गई है.

लेकिन क्या इतना कहने से बात खत्म हो जाती?

बात राधिका आप्टे पर ही खत्म हो सकती है. राधिका की उपस्थिति में एक जादू है. उनके शरीर की लहर दुनिया में मानी पैदा करती है. इतनी खूबसूरत कि जिसका सब माफ हो. यहाँ तक कि पर्याप्त भींगने के बाद, ठंढ सी हालत में, शरीर से पानी पोंछने के बाद प्रेम करते हुए पसीने से छलछला जाने का अवैज्ञानिक दृश्य भी. राधिका को पसंद करने के अनेक संस्मरण हैं.

हिंदी में अब तक देखी गई बेहद कम बेहतरीन फिल्मों में से एक है: अंधाधुन.

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