सिनेमा इतिहास को बचाने की ज़िद, प्रशिक्षण और फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन   

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सुदीप सोहनी/

सुदीप सोहनी

फ़िल्मों का संरक्षण, संग्रहण और दस्तावेजीकरण बाकायदा एक आर्काइव के रूप में करना, ये हमारे देश में सरकारी ज़िम्मेदारी ही माना जाता रहा है। सन् 1964 में पुणे स्थित नेशनल फ़िल्म आर्काइव बनने के पहले ख़ुद फ़िल्मकारों ने भी इसके बारे में नहीं सोचा था। सन् 1913 में शुरू हुआ भारतीय सिनेमा उद्योग अपनी ऐतिहासिक सिने धरोहर के पचास साल बाद जब धरोहर के रख-रखाव के प्रति सचेत हुआ तब तक आधी सदी बीत चुकी थी और जब शुरुआत हुई तो मूक फ़िल्मों से लेकर बोलती फ़िल्मों के दौर तक हज़ारों फ़िल्मों में से नाम मात्र का ही बच सका था।

पुणे फ़िल्म आर्काइव के स्वप्नदृष्टा पी के नायर पर ‘सेल्यूलॉइड मैन’ फ़िल्म बनाने के दौरान शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर ने नायर के बहाने जो भी महसूस किया उसका हासिल केवल यह नहीं था कि ‘सैल्यूलॉइड मैन’ दुनिया भर के फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में दिखाई जाने वाली भारतीय फ़िल्म बन गई थी। बल्कि यह भी कि भारतीय फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान में शिवेंद्र के टीचर रहे नायर का जुनून और स्वप्न जैसे उन्होंने भी देख लिया हो। वर्ष 2014 में मुंबई में शिवेंद्र ने फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन की स्थापना की और तब से अब तक बीते वर्षों में सिनेमा से जुड़े हुए दस्तावेज़, फ़िल्में, फोटोग्राफ, रीलें, अखबार, किताबें बचा लेने की जद्दोजहद में फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन और शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर की कोशिशों ने भारत ही नहीं दुनिया के फ़िल्मकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। शिवेंद्र की कोशिश है कि फ़िल्मकारों की आँखों में पले हुए सपने न सिर्फ आज बल्कि आने वाले कई सालों तक उसी मोहब्बत से महफूज रहें। और आने वाली पीढ़ी अपने सिनेमाई इतिहास को गर्व से याद रख सके और उससे सीख सके।

शिवेंद्र यूं तो अपनी धुन के पक्के हैं ही। इसलिए जब उन्होंने फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन की नींव रखी और बाकायदा काम करना शुरू किया तो अमिताभ बच्चन, श्याम बेनेगल, कमल हासन जैसे नाम बतौर अम्बेसेडर उनसे जुड़े। एक के बाद हिन्दी और देश की कई भाषाओं में काम करने वाले फ़िल्मकार भी जुड़े। एकाएक सबको अपना गुज़रा काम याद आया और पुरानी रीलों में बंद फिल्में फाउंडेशन को मिलने लगीं। उसके बाद दुनिया के फ़िल्मकार जिनमें मार्टिन स्कोरसेसे जैसे विश्व ख्याति के निर्देशक जुड़े।

इस मेहनत का नतीजा यह निकला कि ख्यात नर्तक उदय शंकर की फ़िल्म ‘कल्पना’ और श्रीलंका के फिल्म इतिहास के युगपुरुष डॉ लेसर जेम्स पेरीज़ की फ़िल्म ‘निधान्या’ के रूप में कान और वेनिस फ़िल्म समारोह में दुनिया भर से आए सिनेमा के हज़ारों मुरीदों ने इन फ़िल्मों को देखा और फ़िल्म संरक्षण के महत्त्व को समझा। शिवेंद्र यहीं नहीं रुके।

क्रिस्टोफ़र नोलन के साथ शिवेंद्र

बीते तीन सालों 2015, 2016 और 2017 में क्रमश: फ़िल्म डिवीजन मुंबई, राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय पुणे, और प्रसाद फ़िल्म्स लैब चेन्नई में ‘फ़िल्म प्रिज़र्वेशन एंड रिस्टोरेशन वर्कशॉप’ के नाम से आयोजित हुई कार्यशाला उनकी ज़िद, समर्पण और जज़्बे को ही दिखाती है। शिवेंद्र कहते हैं, ‘भारतीय सिनेमा और उसके जानकार, फ़िल्मकार, समीक्षक आदि उनकी पीठ थपथपाते रहे कि काम बढ़िया है, बेहतरीन मगर मुश्किल है।

फ़िल्म आर्काइव को चलाने और पुरानी फ़िल्मों के संरक्षण में होने वाला ख़र्च मगर तब भी एक समस्या बना रहा है’। मगर उनकी इन कोशिशों के लिए अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व का मौक़ा इस साल अप्रैल की 1 से 3 तारीखों के बीच आया। हॉलीवुड के विश्व ख्याति के निर्देशक क्रिस्टोफ़र नोलान जो सैल्यूलॉईड (रील) पर फ़िल्म बनाने के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने अपनी कोशिशों को दुनिया के फ़िल्मकारों से साझा करने के लिए फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन और शिवेंद्र को चुना। उनके साथ रील पर काम करने वाली ख्यात आर्काइविस्ट टेसीटा डीन भी थीं। नोलान का भारत आना हिन्दी फ़िल्म उद्योग के लिए एक ऐसा सबक रहा कि उसके बाद बड़े स्टुडियो और निर्माता, निर्देशक फ़िल्मों के संरक्षण की शिवेंद्र की कोशिशों के साथ खड़े नज़र आने लगे।

इन्हीं कोशिशों का अगला पड़ाव इस वर्ष नवंबर की 15 से 22 तारीख़ तक कोलकाता में होने वाली चौथी फ़िल्म प्रिज़र्वेशन और रिस्टोरेशन वर्कशॉप है। इस तरह से यह बंगला सिनेमा को ट्रिब्यूट भी है जिसके 100 बरस पूरे होने जा रहे हैं। बंगाल की सिनेमा परंपरा में पी सी बरुआ, देबकी बोस, नितिन बोस, बिमल रॉय, सत्यजित रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, असित सेन, अजॉय कर, उत्तम कुमार, सुचित्रा सेन जैसे कई नाम गिनाए जा सकते हैं।

शिवेंद्र कहते हैं, ‘बंगाल ने भारतीय सिनेमा को समृद्ध किया है।  दुर्भाग्य से बंगाल का सिनेमा हेरिटेज अभी तक हम संभाल नहीं पाये हैं। सन 1931 की फ़िल्म ‘जमाई बाबू’ के अतिरिक्त मूक सिनेमा के दौर की कोई बांग्ला फ़िल्म हम बचा नहीं पाये हैं’।

इस बार होने वाली कार्यशाला इस मामले में भी अनूठी है कि दुनिया भर से चुने हुए प्रतिभागियों को बहुत विस्तृत तरीक़े और विशेष पाठ्यक्रम के तहत फ़िल्म प्रिजर्वेशन, फ़िल्म रील हैंडलिंग, रिपेयर, पहचान, कैटलोगिंग, फोटो और पेपर कंजर्वेशन, फ़िल्म स्कैनिंग आदि की तकनीक सिखाई जाएँगी। इसके साथ ही नई तकनीक पर आधारित एरी फ़िल्म स्कैनर के जरिये ध्वनि मुद्रण और स्कैनिंग के सत्र भी होंगे। दुनियाभर के विशेषज्ञ प्रशिक्षण के लिए रहेंगे। पर उससे भी सुखद और महत्त्वपूर्ण यह कि टाटा ट्रस्ट की स्कॉलरशिप के ज़रिये चुने हुए सभी विद्यार्थियों के लिए यह प्रशिक्षण मुफ़्त होगा।

शिवेंद्र इस ओर करियर की संभावनाओं को भी बाकायदा तलाशते रहे हैं। इंटेरनेशनल फेडरेशन ऑफ फ़िल्म आर्काइव, कोलकाता इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल, एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स सहित विश्व की दर्जन भर संस्थाओं के सहयोग से होने वाली इस कार्यशाला के उदघाटन मौके पर बंगाली फ़िल्मों के सदाबहार अभिनेता सौमित्र चटर्जी, माधवी मुखर्जी, अपर्णा सेन, गौतम घोष जैसे नाम उपस्थित रहेंगे। वर्कशॉप के दौरान ‘बाइसिकल थीव्स (नि. वितोरियो दे सिका)’, ‘मलहॉलैंड ड्राइव (नि. डेविड लिंच)’, ‘लूसिया (नि. उम्बेर्तो सोलस)’, ‘मैग्निफ़िसेंट एम्बर्सन्स (नि. ऑर्सन वेल्स)’ ‘ब्लो अप (नि. माइकल एंजेलो एंतोनिओनी), ‘आमरकोर्ड (नि. फेदरिको फेलिनी), ‘कल्पना (नि. उदय शंकर) और सत्यजित रे निर्देशित अपु ट्रायलॉजी की फ़िल्में ख़ास रिस्टोर किए प्रिंट में दिखाई जाएंगी। अपने सिनेमाई इतिहास के प्रति सम्मान और संरक्षण की ज़िद का यह सपना शिवेंद्र के इन प्रयासों में आकार लेता नज़र आता है।

सिनेमा अहसास का माध्यम है। न जाने कितनी पीढ़ियों ने सिनेमा के ज़रिये दुनिया को देखा, जाना और महसूस किया है। कलाएँ इस तरह भी जीवन में प्रवेश करती हैं। तेज़ी से सिमटती और दौड़ती जा रही दुनिया में यह तक याद नहीं कि हमने दो दिन पहले कपड़े कौन से पहने थे। हर बीतता क्षण इतिहास बनता जा रहा है। ऐसे में सौ सालों में फैले सिनेमाई वैभव को आने वाली पीढ़ी के हाथ में संरक्षित तरीक़े से संवारने, बचा लेने और चमकदार बनाए रखने की शिवेंद्र की इन कोशिशों का यह क़दम भी इतिहास रचे, ऐसे उम्मीद तो है ही। सिनेमा का एक नया दरवाज़ा भी यह अवसर खोल रहा है। निश्चित तौर पर आने वाले सौ सालों के लिए ही फ़िल्म हेरिटेज फाउंडेशन यह क़दम बढ़ा रहा है।

(फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया से शिक्षा ग्रहण कर सुदीप सोहनी आजकल विहान ड्रामा वर्क्स से जुड़े हुए हैं. मूलतः खंडवा के रहने वाले सुदीप आजकल भोपाल में रहते हैं.)

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