नकाशिमा तेत्सुया: मनुष्य की अच्छाईयों के सापेक्ष उनकी कमियों पर आकर्षित फिल्मकार

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अरविन्द/

विश्व सिनेमा के चर्चित निर्देशक सोहराब शाहिद  और  हिरोकाजू कोरीदा  से आपका परिचय कराने के बाद, अरविन्द इस बार नकाशिमा तेत्सुया से आपका परिचय करा रहे हैं.  सौतुक पहले भी बताता रहा है कि अरविन्द कविता और कहानी में बराबर रुचि रखते हैं.  विश्व सिनेमा के प्रति शौक और नज़र दोनों काबिलेतारीफ है.

बयां पत्रिका के सिनेमा अंक में कभी विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्मों के बारे में बताते हुए कहा था कि आदमी के अन्दर का अँधेरा मुझे आकर्षित करता है. यह पंक्ति पढ़ते हुए मुझे ख्याल आया कि क्या आदमी के अन्दर के अँधेरे को मापा जा सकता है? इसका जवाब नकाशिमा तेत्सुया की फिल्मों ने दिया जिसे देखने के बाद कहा जा सकता है कि हाँ उस अँधेरे की  तीव्रता का भी आकलन जरुर किया जा सकता है.

डार्केस्ट डायरेक्टर’ के विशेषण से नवाज़े गए नकाशिमा की फ़िल्में जापानी फिल्मों की एक ख़ास श्रेणी में आती हैं- सीशुन ईगा (Seishun Eiga), जिसका अर्थ है नौजवान सिनेमा. इस श्रेणी में युवाओं से सम्बंधित कई फ़िल्में हैं और इसी मकसद से इस तरह का वर्गीकरण किया गया है.

नकाशिमा तेत्सुया
नकाशिमा तेत्सुया

तेत्सुया की फिल्मों की दो और विशेषताएं हैं. वे हैं- विनाशी और कामुक-परपीड़क. नाईलिज्म की परम्परा जिसे विनाशवादी परंपरा भी कहते हैं, इससे इनकी फ़िल्में भरी पड़ी हैं. इसके अलावा हत्याओं से, कामुकता से जिस सुख-दुःख का आच्छादन- विच्छेदन होता है, यह भी खूब मिलता  इनकी फिल्मों में.

नकाशिमा कई अर्थों में ध्यानाकर्षित करते हैं. फिल्मों में शिल्पगत तोड़-फोड़ अभूतपूर्व हैं. जिसने नकाशिमा को देखा होगा, वे जानते हैं कि ऐसे शिल्पों से भरी फ़िल्में दुर्लभ हैं. खासकर उनकी फ़िल्में कथावाचक के दृष्टिकोण से चलती हैं. आत्मकथात्मक ढंग से चलती हैं. आत्मालाप के सुर में हैं. नैरेशन का इतना अद्भुत संयोजन कम से कम मैंने बहुत ही कम फिल्मों में देखा हैं.

इसके अतिरिक्त जिस सन्दर्भ के लिए कोई कलाकार जाना जाता है, वह है समय और किसी दृश्य की टाईमिंग पर पकड़. नकाशिमा अपनी फिल्मों में वर्तमान, अतीत और भविष्य को ताश के पत्ते की तरह फेंटते हैं.

इनकी फिल्मों में समय-संयोजन इतना प्रखर है कि वह दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेता हैं. कहा जाए कि अपनी तीव्रता की बदौलत नकाशिमा की फ़िल्में, एक बैठक की फ़िल्में हैं.

नकाशिमा ने कम फ़िल्में बनाई. लेकिन अच्छी बनाईं. नकाशिमा की तीन फिल्मों से मेरा वास्ता पड़ा. उनकी फिल्म मेमोरीज ऑफ़ मत्सुको (Memories of Matsuko) थोड़ा सा कथा-विचलन के बाद (मेरी समझ में) यह फिल्म अपने अस्तित्व में अप्रतिम है. यह नायिका मत्सुको के जीवन की कहानी है. प्रभाव की तीव्रता सम्बंधित तुलना किया जाए तो यह विश्व-विख्यात उपन्यास पाश्कुआल दुआर्ते का परिवार से मिलता-जुलता होगा. यह फिल्म अतुलनीय है.

मेमोरी ऑफ़ मत्सुको का एक दृश्य

नकाशिमा की लगभग सभी फ़िल्में हत्याओं और उनसे जुड़ी श्रृंखला की एक बेचैन खोज हैं. अपनी बुआ मत्सुको की हत्या के बाद नायक उसके जीवन-प्रसंगों, कारणों और विशेषकर दुर्भाग्य की दशा की पड़ताल करता है.

तेत्सुया की  फिल्म अपने दृश्यों में एक सांगीतिक यात्रा है. दृश्यों का उनके यहाँ यूँ सजावट है कि उन्हें देखना एक रिदम में होना है. उनकी सभी फिल्मो में यह बात है.

तेत्सुया  की दूसरी फिल्म है ‘कन्फेशन’. मैंने एक महिला मित्र को कुछ सालों पहले इस फिल्म को देखने का सुझाव दिया था. उन्होंने अपने बेटे के साथ यह फिल्म देखी थी. वे लोग कई दिनों तक इसके असर से उबर नहीं सके थे. कन्फेशन एक छोटी बच्ची के हत्या के बारे में हैं. स्कूल में हत्या होती है. बच्चे करते हैं.  उसी स्कूल में बच्ची की माँ अध्यापक है जो उस हत्या की पड़ताल करती है. एक प्रतिशोधक पड़ताल. यह एक ऐसी खोज है जिसकी सच्चाई जानकार दर्शक हिल जाता है. इस फिल्म में भी नकाशिमा, जैसे बार-बार एक ही दृश्य को रिवाईंड करके, कई पात्रों के नरेशन से पहचान करते रहते हैं.

किशोरों और युवाओं का संसार उम्र के सबसे नाजुक पुल पर खड़ा होता है. वे उस नाजुक समय के बर्बाद होने की कथा कहते हैं और यह बहुत जरुरी है कि किशोर मन के तूफानों, टकराव और विचलन को पकड़ने के लिए माँ-पिता नकाशिमा की फिल्में देखें.

नकाशिमा अपनी फिल्मों में कोई ऐसा पात्र नहीं गढ़ते जो अनुकरणीय हो. सर्वथा अपराधिक. सर्वथा नकारात्मक और पराजित पात्रों से अपनी कथा बुनते हैं. आखिर इतनी नकारात्मकता क्यों? इसके जवाब में नकाशिमा का कहना है कि मुझे मनुष्य की अच्छाईयों के सापेक्ष उनकी कमियाँ आकर्षित करती हैं.

तेत्सुया नकाशिमा की फिल्मों का आधार उपरोक्त विषय-वस्तु है, जिसके आलोक में वे इतना डार्कनेस रचते हैं. क्या उनकी फ़िल्में जापानी समाज का प्रतिनिधित्व करती है? उनके पास इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता, पर ऐसा नहीं है कि नकाशिमा कि फ़िल्में समाज से नहीं है. वे बस समाज की कमियों के बारे में हैं.

कन्फेशन का एक दृश्य

नकाशिमा अपनी फिल्में किसी न किसी किताब को लेकर बनाते हैं. किताबें ही क्यों? इस बात का उत्तर देते हुए कहते हैं कि किताबों को लेकर बनाने से फिल्मे एक ट्यून में हो जाती हैं. जाहिर सी बात है कि नकाशिमा की फिल्मों की ट्यूनिंग गजब की है. उनकी तीनों फिल्में उपन्यास पर आधारित हैं.

उनकी जिस फिल्म को मैं तीसरे पायदान पर रखूँगा वह है दी वर्ड ऑफ़ कनको. यह कनको नामक एक हाईस्कूल की लड़की के खोज की एक थ्रिलिंग कहानी है. कनको की खोज उसका पिता ही कर रहा है. कनको का जीवन आजकल के शहरी जीवन की तरह एकाकी हो चुका है. वह एक ऐसे मोड़ की ओर मुड़ चुकी है जहां से लौट पाना असंभव सा है. जैसा कि उनकी फिल्म कन्फेशन में है कि माँ, पुत्री के हत्या की पड़ताल करती है. इस फिल्म में माँ की जगह एक पिता है पर दुहराव एकदम नहीं है. किशोर और युवा वर्ग को तो यह फिल्म देखनी ही चाहिए. माँ-बाप को भी. कनको को याद करते हुए किम की डुक की फिल्म समारिटन गर्ल भी याद आती है. वह इसलिए कि इन दोनों पिताओं का आखिरकार एक ही स्वप्न है वह है अपनी पुत्री की हत्या करने का स्वप्न.

नकाशिमा की फ़िल्में कोई सन्देश नहीं देती हैं. वह इतने नाजुक विषय पर होती हैं कि ‘सावधानी ही बचाव है’ कहती सी लगती हैं. यह अतिश्योक्ति से भरी हुई बात लगेगी पर सच है कि अपने अगर तेत्सुया नकाशिमा को नहीं देखा है तो सिनेमा ज़रा सा कम देखा है.

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