अमिताभ बच्चन : अभिनय की आधी सदी

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रजनीश जे जैन/

कोई तारीख तब अपनी सार्थकता पा जाती है जब उससे जुड़ी घटना इतिहास में दर्ज़ हो जाए.  आगामी 15 फ़रवरी ऐसी ही तारीख है. इस दिन महानायक अमिताभ बच्चन  हिंदी सिनेमा में पदार्पण के पचास वर्ष पूरे करने जा रहे हैं. कलकत्ता की अच्छी-भली नौकरी छोड़कर मुंबई का रुख करना वाकई जोखिम भरा निर्णय था. जोखिम इस लिहाज से भी थी कि सिफारिश और पनाह देने वाला भी इस स्वप्न नगरी में कोई नहीं था. भटकते, धक्के खाते अमिताभ ख्वाजा अहमद अब्बास के दर पर पहुंचे. उसूलों के पक्के अब्बास साहब ने उन्हें उलटे पैर  लौटा दिया कि बरखुरदार ! अपने वालिद से लिखित अनुमति लेकर आओ, तब कुछ सोंचेंगे. अनुमति की चिट्ठी आई और अमिताभ नाम मात्र के मेहनताने पर ‘सात हिंदुस्तानी’ के लिए अनुबंधित कर लिए गए. फिल्म के अन्य कलाकार थे कलाकार महमूद के छोटे भाई अनवर, उत्पल दत्त, जलाल आगा, दीना पाठक और एके हंगल. तारीख थी, 15 फ़रवरी 1969 .

सात हिंदुस्तानी ‘ उस सफर  शुरुआत थी जिसमें कई उतार चढ़ाव आने थे. अगली फिल्म ‘रेशमा शेरा’ थी जिसमें वे लोग थे जिन्हें अमिताभ सिर्फ परदे पर ही देख पाए थे. वहिदा रहमान की सुंदरता पर आसक्त अमिताभ के लिए अपनी चहेती नायिका के साथ एक ही फ्रेम में आना किसी पुरस्कार से कम नहीं था. इन 50 वर्षों में अमिताभ ने  कभी अपनी पसंद नहीं बदली. आज भी जब उनसे सबसे सुंदर महिला के बारे में पूछा जाता है तो वे आदर सहित वहिदा रहमान का ही नाम लेते हैं. अगली कई फिल्मों में वहिदा रहमान उनकी प्रेयसी भी बनीं और माँ बनकर भी आयीं. इसी तरह ‘रेशमा शेरा’ की अन्य नायिका राखी को, वे दीदी कहकर बुलाते थे. राखी ने अमिताभ के साथ ग्यारह फिल्में कीं , कभी वे उनकी पत्नी थीं तो कभी प्रेयसी और कभी माँ.

‘सात हिन्दुस्तानी’ के पूर्व मृणाल सेन ने उनकी बैरिटोन आवाज अपनी फिल्म ‘भुवन शोम’ में उपयोग की थी. यह वही आवाज थी जिसे आल  इंडिया रेडिओ ने यह कहकर ख़ारिज कर दिया था कि यह ज्यादा गूंजती है. अमिताभ की जगह अमीन सयानी अनाउंसर के रूप में चुन लिए गए थे. ‘आनंद’ का आना इस लिहाज से महत्वपूर्ण था कि इसे ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित कर रहे थे और संवाद लिखे थे गुलजार ने. परन्तु ‘आनंद’ के बाद भी बेकारी खत्म नहीं हुई थी. एक के बाद एक असफल फिल्में लाइन से आ रही थीं. यद्यपि बाद के वर्षों में, अमिताभ बच्चन ने दस फिल्में ऋषिकेश के मुखर्जी के साथ कीं और वे  सभी कालजयी श्रेणी में शामिल हैं. ये फिल्में इस लिहाज से भी अनूठी हैं कि इनमें अमिताभ के भाव प्रणय अभिनय की ऊंचाई देखने को  मिलती है.  अपनी लोकप्रिय ‘एंग्री यंग मेन’ छवि से उलट इन फिल्मों में वे कभी प्रेमी, पति और दोस्त बने नजर आये तो कभी मध्यमवर्गीय नायक.

अमिताभ जब अपनी जगह तलाश रहे थे तब राजेश खन्ना सातवें आसमान पर बैठे हुए थे.  उन्हें लगभग भगवान मान लिया गया था.  खुद राजेश खन्ना को भी लगने लगा था कि वे सर्व शक्तिमान हैं. अपने अहंकार में वे कई लोगो को अपमानित कर चुके थे. उनके शिकार सलीम जावेद भी हुए जिन्होंने उनकी सुपरहिट ‘हाथी मेरे साथी’ लिखी थी. काका के अपमान से आहत इन दोनों ने तय किया, कि वे किसी और को राजेश खन्ना से बड़ा स्टार बनाएंगे. लेकिन किसे, यह तय नहीं था.  सलीम खान के पास एक स्क्रिप्ट थी जिस पर कोई भी फिल्म बनाने को तैयार नहीं था. धरमजी,  देव साहब, राजकुमार और तो और नए नवेले नवीन निश्चल भी इस कहानी को रिजेक्ट कर चुके थे. लेकिन दो लोगों को यह कहानी पसंद आई वे थे प्राण साहब और ओमप्रकाश. इन दोनों ने प्रकाश मेहरा से अमिताभ की सिफारिश की. प्रकाश मेहरा ने अनमने मन से ‘ज़ंजीर’  शुरू की और इस फिल्म के रिलीज़ होते ही क्या हुआ – बताने की जरुरत नहीं है.

डॉ हरिवंशराय बच्चन ने एक साक्षात्कार में अपने पुत्र के व्यक्तित्व के बारे में चर्चा करते हुए कहा था कि अमित को हर चीज की गहराई में जाने की आदत है, फिर चाहे वह आधुनिक कविता हो या जिंदगी ! व्यक्तित्व के  इस गुण की वजह से वे हर पराजय से उबर कर वापस लौटे हैं.

इसी परिपक्वता के चलते उन्होंने शादीशुदा होने के बाद प्रेम किया और उसकी तपिश से घर में आग लगे, उसके पहले पारिवारिक जीवन में लौट आये. उल्लास और निराशा के माहौल में होश बनाये रखना उनसे सीखा जा सकता है.

उनके फ़िल्मी सफर से उनके प्रशंसकों को इस बात का अफ़सोस रहा है कि अमिताभ ने सिर्फ अपनी छवि को बचाने  के लिए ही ढेर सारी ऊलजलूल कमाऊ फिल्मों में अभिनय किया.  सिनेमा के कला पक्ष को समृद्ध करने के लिए उन निर्देशकों के साथ काम नहीं किया जो उन्हें और ऊंचाई दे सकते थे. वे चाहते तो अपने प्रभाव और पहुँच के चलते गुलज़ार, राजकपूर, सत्यजीत रे, बासु चटर्जी और बिमल रॉय के साथ काम कर सकते थे. यद्यपि गुलजार ने अपनी ओर से पहल करते हुए दो कहानियों पर उनसे बात की थी परन्तु बात से आगे बात नहीं बढ़ पाई. सत्यजीत रे उनके साथ काम करना चाहते थे परन्तु उनकी मार्केट प्राइस को चुका न पाने की हैसियत की वजह से बात करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाए.

फोर्ब्स पत्रिका में छपने वाले अमीरों की सूची में अमिताभ अब भी टॉप टेन में आसानी से जगह बना लेते हैं परंतु उनकी स्क्रीन इमेज हमेशा ही अभिजात्य विरोधी रही है और उसे ही सबसे ज्यादा सराहना भी मिली है. उन्हें मिली लोकप्रियता आज भी कई स्थापित नायकों के लिए स्वप्न से कम नहीं है. उम्र के इस पड़ाव पर भी काम के प्रति समर्पण उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग खड़ा करता है. उनका यह गुण फिल्मों से इतर जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी प्रेरणादायक रहा है.

अस्सी पार  हॉलीवुड अभिनेताओं मॉर्गन फ्रीमैन, रोबर्ट डी नीरो, जैक निकोल्सन की तरह उनके प्रशंसक यही चाहते है कि वे लगातार नई  भूमिकाओं और चरित्रों की मदद से आगामी वर्षों में भी हिंदी सिनेमा को रोशन करते रहें.

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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