अलाउद्दीन खिलजी: भंसाली की कलात्मक स्वतंत्रता का नया शिकार

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हेमंत कुमार झा/

अलाउद्दीन खिलजी सल्तनत युग का सबसे प्रतापी सुल्तान था। उसकी सामरिक उपलब्धियां उसे भारतीय इतिहास के महान साम्राज्य निर्माताओं में शुमार करती हैं। मंगोल आक्रमणों का जिस साहस के साथ उसने सामना किया, वैसा उदाहरण कोई और सुल्तान प्रस्तुत नहीं कर सका। बाजार संबंधी उसके प्रयोग मध्यकालीन शासन प्रणाली और अर्थव्यवस्था में इनोवेशन का बेहतरीन उदाहरण हैं।

हेमंत कुमार झा

लेकिन,आजकल अलाउद्दीन जिन वजहों से चर्चा में है, उनका इतिहास से अधिक लेना देना नहीं। नई पीढ़ी उसके बारे में जान रही है कि वह ऐसा कामुक और वहशी सम्राट था, जिसने महज एक स्त्री को पाने के लिये अपनी सैनिक शक्तियों का भयानक दुरुपयोग किया, हजारों लोगों की हत्याएं की और अनगिनत महिलाओं को आत्महत्या के लिये विवश किया।

इन्हीं कहानियों के समानांतर ऐसे तथ्य भी सामने लाए जा रहे हैं कि वह औरतों का नहीं, बिना दाढ़ी मूंछ वाले कम उम्र मर्दों का शौकीन था। मलिक काफूर के साथ उसके संबंधों को इतने सीमित दायरों में परिभाषित किया जा रहा है कि लोग यह जान ही नहीं पा रहे कि काफूर कितना बहादुर, रणनीतिज्ञ और सफल सेनानायक था, जिसने अलाउद्दीन के साम्राज्य विस्तार में अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाई थी।

राजाओं, सम्राटों के विकृत यौन जीवन पर बहुत कुछ लिखा गया है। लेकिन, ऐसी कहानियों के जितने ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, उनसे अधिक ये किंवदंतियां ही हैं, जिनके कोई प्रमाण नहीं मिलते।

रचनात्मक स्वतंत्रता, जिसकी आड़ में आजकल फिल्मकार और सीरियलकार इतिहास से विकृत खिलवाड़ कर रहे हैं, नई पीढ़ी के मानस को दूषित कर रही है। वह अकबर को ऐसे विवश और खीजे बादशाह के रूप में जान रही है, जिसे अपनी पत्नियों के आपसी ईर्ष्या द्वेष को सुलझाने से फुरसत नहीं, चंद्रगुप्त मौर्य को ऐसे प्रेमी के रूप में पहचान रही है, जिसका दिल दिमाग अपनी मां और प्रेमिका के द्वंद्व में ही हमेशा उलझा रहता है।

अब दीपिका, प्रियंका चोपड़ा आदि चाहे जिस सम्मानित रानी का रोल करें, अगर वे अदाओं के साथ ठुमक ठुमक कर नाचें नहीं तो पब्लिक का पैसा कैसे वसूल हो? भाड़ में जाए पीढ़ियों की स्मृतियों में बसा रानी का सम्मान। भंसाली को रचनात्मक स्वतंत्रता जो है। उन्होंने सामंती समाज में विवश प्रेमिका की प्रतीक पारो को नचाया, महान योद्धा बाजीराव प्रथम की पत्नी काशीबाई को भरे दरबार में नचाया, अब वे चित्तौड़ की रानी पद्मावती के मोहक नृत्य को लेकर प्रस्तुत हैं।

स्त्री है, सुंदर है तो नाचती ही होगी, आँखें मटका मटका कर, अदाएं दिखा दिखा कर पुरुषों को रिझाती ही होगी, वह भी सार्वजनिक रूप से। इसी में उसकी संपूर्णता है। वो जो भी हो, है तो स्त्री ही ।

पता नहीं, भंसाली जैसों की रचनात्मक प्रेरणा लक्ष्मीबाई, इंदिरा गांधी आदि के आख्यानों में अपने लिए कब किन ‘रचनात्मक’ संभावनाओं की तलाश करने लगे। विरोध और हंगामें तो मुफ्त का प्रचार हैं।

(हेमंत कुमार झा मगध विश्वविद्यालय में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर कार्यरत हैं। देश में चल रहे वैचारिक बहसों पर इनकी खास राय है, जो तथ्य और शोध पर आधारित है। इन मुद्दों पर इनके लेख पाठकों की सोच को  नई दिशा देने के लिए बहुत जरुरी हैं।)

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