समय से आगे की फिल्म – मेरा नाम जोकर

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

किसी भी सफल फिल्मकार के करियर में एक पड़ाव ऐसा आता है जब उसे लगने लगता है कि अपने पसंदीदा विषय को स्क्रीन पर उतारने से उसे कोई बाधा नहीं रोक सकती। उसके पास एक कहानी होती है जिसमे उसके ही खुद के जीवन के अक्स हुआ करते हैं। इस पड़ाव पर पहुँचते हुए वह इतना सफल हो चूका होता है कि उसे हवा के खिलाफ बहने में भय नहीं लगता। इसी दुस्साहस के सहारे वह कई जोखिम एक साथ आमंत्रित कर लिया करता है। परिणाम स्वरुप आर्थिक रूप से तो वह लगभग सड़क पर आजाता है परंतु रचनात्मक स्तर पर ऐसे पैमाने खड़े कर देता है जो दशकों तक उसके पराक्रम की कहानियां बयान करते है।  ‘नीचा नगर’ में चेतन आनंद ने कुछ ऐसा ही किया, गुरुदत्त ने ‘कागज़ के फूल’ में इन्ही परिस्तिथियों को दोहराया और ‘मेरा नाम जोकर’ में राजकपूर कमोबेश इन्ही हालातों से रूबरू हुए थे।

प्रेम त्रिकोण की कहानी एवं कालजयी संगीत से सजी ‘संगम’ (1964) की छप्पर फाड़ सफलता ने राजकपूर को उत्साह से भर दिया था। ठीक इसी समय वे अपनी उम्र के साठवें वर्ष में प्रवेश कर रहे थे। उनके स्टूडियो में आवारा, श्री 420, बरसात, जिस देश में गंगा बहती है, चोरी चोरी, जैसी  अन्य  सफलतम और सदियों तक देखी जाने वाली फिल्मों की ट्रॉफियां सफलता के प्रतिक चिन्हों के रूप में कतारबद्ध रखी हुई थीं।

खुद राजकपूर की लोकप्रियता सरहदों को लांघकर सोवियत रूस में उन्हें पंडित नेहरू के बाद सर्वाधिक पहचाने जाने वाले चेहरे के रूप में स्थापित कर चुकी थी। संगम के तुरंत बाद राजकपूर अपनी फिल्म की तैयारी में जुट गए। यह फिल्म उनका ड्रीम प्रोजेक्ट साबित होने वाली थी जिसमे वे एक सर्कस के  जोकर को केंद्र में रखकर  सिल्वर स्क्रीन पर  जीवन दर्शन रचने जा रहे थे। हमेशा की तरह ख्वाजा अहमद अब्बास ने इस फिल्म की कहानी लिखी थी। फिल्म को शीर्षक दिया गया ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म का संगीत राजकपूर के प्रिय शंकर जयकिशन ने तैयार किया और नौ गीतों में से तीन गीत नीरज तीन हसरत जयपुरी एक प्रेम धवन एक शैलेन्द्र और शैलेन्द्र का  एक अधूरा  गीत उनके  पुत्र शैली शैलेन्द्र ने लिखा था।

पुरे छे वर्ष की मेहनत और राजकपूर की सारी जमा पूंजी लगने के बाद ‘मेरा नाम जोकर’ प्रदर्शन के लिए तैयार थी। यह भारत की सबसे लंबी अवधि की फिल्म बनने जा रही थी – 255 मिनिट इस फिल्म की लम्बाई थी जिसमे दो मध्यांतर की गुंजाइश थी। चूँकि राजकपूर ‘संगम’ में भी दो इंटरवल रख चुके थे और दर्शकों ने उसे सहन कर लिया था तो उन्हें ऐसा करना गलत नहीं लगा। 18 दिसंबर 1970 को मेरा नाम जोकर धूम धड़ाके से प्रदर्शित हुई। पोस्टर पर सारे बड़े सितारों के नाम थे ! धर्मेंद्र, मनोज कुमार, दारासिंह, राजेंद्र नाथ, रुसी तारिका कसानिया रायविंकेयो, सिमी ग्रेवाल, पद्मिनी वगेहरा वगैहरा। मधुर संगीत और मल्टी स्टार कास्ट सफलता की गारंटी था परंतु ऐसा नहीं हुआ। जिन दर्शकों ने राजकपूर को सर माथे बिठाया था उन्होंने  उन्हें उतारने में देर नहीं की। ‘मेरा नाम जोकर’ बॉक्स ऑफिस पर पानी भी नहीं मांग पाई।

फिल्म के असफल हो जाने ने राजकपूर की माली हालत बिगाड़ दी। उनकी लगभग सभी सम्पत्तियाँ कर्ज चुकाने के लिए रेहन रखनी पड़ी। यह एक सपने के बिखर जाने की तरह था। चूँकि फिल्म को बनाने में छः वर्ष लगे थे तो स्वाभाविक रूप से इसे लेकर फिल्म समीक्षकों में भी उत्सुकता थी। अधिकांश समीक्षकों का आकलन था कि राजकपूर दर्शको की नब्ज को नहीं टटोल पाए। जो दर्शन प्रतीकों के माध्यम से वे दर्शाना चाहते थे वह आने वाले  समय के लिए था, उस दौर के लिए नहीं ! कुछ लोगों के दृष्टिकोण से यह एक कलाकार का जयगान था जिसके जीवन के हरेक पड़ाव पर एक महिला थी और उस महिला से नायक का असफल प्रेम था। राजकपूर अपनी निजी जिंदगी में कुछ इसी तरह के अनुभवों से गुजरे थे। यह आत्मकथ्य सत्तर के दशक के लिहाज से काफी बोल्ड था और यही इसके फ्लॉप होने की वजह बना।

1972 में मेरा नाम जोकर सोवियत रूस में तीन अलग अलग हिस्सों में  फिल्म के रूप  में प्रदर्शित हुई और भारी सफल हुई। एक वर्ष में इसने वहां 16 करोड़ रूपये कमाए। आज की मुद्रास्फीति के हिसाब से यह रकम 800 करोड़ होती है। 1980 में इसे पुनः  सम्पादित कर भारत में रिलीज़ किया गया और यह बेहद सफल रही। भले ही पहली बार में यह फिल्म किसीको समझ नहीं आई परंतु बाद में इसके साथ ‘महान कलाकृति’ का विशेषण जुड़ा। वीडियो पर सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्म का गौरव भी मेरा नाम जोकर ने ही हासिल किया।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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