आर के स्टूडियो: सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी!

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रजनीश जे जैन/

अखबार, टेलीविज़न  और सोशल मीडिया में राजकपूर के आइकॉनिक आर के स्टूडियो के बिकने की खबर अब ठंडी पड़ने लगी है। ट्विटर और फेसबुक पर उनके प्रशंसक अफ़सोस और हताशा भरी प्रतिक्रिया के बाद चुप हैं। यह पहला मौका नहीं है जब किंवदंती बनी विरासत को उसके वारिस सहेज नहीं पाये। भारत के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना के बंगले ‘आशीर्वाद’ और किशोर कुमार के खंडवा स्थित ‘गौरीकुंज’ की जो गति  हुई  वही सब अब इस स्टूडियो के साथ घटने जा रहा है। सत्तर बरस पुराना स्टूडियो अब कुछ ही समय में इतिहास के गलियारों में गुम  हो जाएगा और उसकी जगह ले लेगी कोई बहुमंजिला इमारत या कोई हाउसिंग कॉलोनी।

हमारे देश का सामूहिक चरित्र, जीवन के दो परस्पर विरोधी बिन्दुओं के बीच पैंडुलम की तरह डोलता रहता है। एक तरफ हम बेहद अतीतजीवी मानसिकता में जकड़े रहते हैं, अपने तथाकथित गौरवशाली अतीत के लिए मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। वहीँ दूसरी तरफ, अपनी इमारतों और सांस्कृतिक विरासतों के प्रति बेहद लापरवाह और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रुख अपना लेते हैं। व्यक्तित्व का यही भटकाव, न हमें गुजरे समय से जुड़े रहने देता है न ही भविष्य के प्रति सजग होने देता है।

अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रति हमारा लगाव विश्वविख्यात है। भाषा और रहन-सहन के मान से हम ‘गोरों’ की तरह हो जाना चाहते हैं। हमारे फिल्म पुरूस्कार बतर्ज़े ‘ऑस्कर’ और ‘बाफ्टा’ की फोटोकॉपी बनने का प्रयास करते हैं। परन्तु हम उनकी तरह अपनी विरासतों के प्रति संवेदनशील नहीं बन पाते। अमेरिका के पास अपनी कोई ऐतिहासिक संस्कृति नहीं है, पर हॉलीवुड ने जिस तरह अपनी फिल्मों और फिल्मकारों को सहेजा है वैसा हमने अभी प्रयास भी करना आरंभ नहीं किया है। सिनेमा के शुरूआती दौर में बनी भारतीय फिल्मों के प्रिंट तो दूर की बात है हमारे पास पहली सवाक फिल्म ‘ आलमआरा’ का पोस्टर भी सुरक्षित नहीं बचा। जबकि हॉलीवुड ने उस दौर की 40 प्रतिशत फिल्मों को नष्ट होने से बचा लिया है।

हमारे पास पहली सवाक फिल्म ‘ आलमआरा’ का पोस्टर भी सुरक्षित नहीं बचा। जबकि हॉलीवुड ने उस दौर की 40 प्रतिशत फिल्मों को नष्ट होने से बचा लिया है

अपने फिल्मकारों की स्मृतियों को आमजन में ताजा रखने के लिए कैलिफोर्निया के रास्तों पर पीतल के सितारों को जमीन पर मढ़ा गया है। इन सितारों पर उल्लेखनीय अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के नाम उकेरे गए है। उम्रदराज और असहाय फिल्मकारों की देखरेख करने के लिए ‘ मूवी पिक्चर एंड टेलीविज़न फंड’  नाम की संस्था है जो उन्हें जीवन की शाम में भी सम्मान से जीने का मौका देती है। एक जमाने के सुपर स्टार भारत भूषण, भगवान दादा की तरह उन्हें अपना जीवन झुग्गी झोपडी में नहीं गुजारना पड़ता। ए के हंगल जैसे वरिष्ठ और लोकप्रिय अभिनेता के इलाज के  लिए चंदा नहीं करना पड़ता।

एक वर्ष पहले जब आर के स्टूडियो में आग लगी थी तब ही तय हो गया था कि अब इस महान विरासत पर पर्दा गिरने वाला है। राजकपूर ने अपनी फिल्म के कॉस्टयूम,  जूते,  स्मृतिचिन्ह ‘बरसात’ का छाता,  ‘मेरा नाम जोकर’ का जोकर, श्री 420 का हैट, जैसी बहुत सी छोटी-छोटी चीज़ों को स्टूडियो में  सहेजा था। यह सारा इतिहास उस आग में भस्म हो गया। दूसरों की फिल्मों में काम करने वाले उनके पुत्र अपने पिता के सपनो की रखवाली नहीं कर पाये। यहाँ शशिकपूर के परिवार, खासकर, उनकी पुत्री संजना कपूर की तारीफ़ करनी होगी जिसने विकट  परिस्तिथियों में भी ‘ पृथ्वी थिएटर ‘ को चालीस वर्षों से चलायमान रखा है।

हमारे दौर के वारिसों के लिए संग्राहलय से ज्यादा उसकी जमीन का दाम महत्वपूर्ण रहा है। प्रसिद्ध फ़िल्मकार कमाल अमरोही (पाकीज़ा के निर्माता) के वारिसों ने उनकी प्रॉपर्टी के लिए कितने दांव-पेंच लगाए, इस पर अलग से एक फिल्म बन सकती है।

केलिन गोव ने अपने उपन्यास ‘बिटर फ्रॉस्ट’ में कहा है ‘ विरासत-इस पर गर्व हो क्योंकि आप इसकी विरासत होंगे। अपनी विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी आपकी है, अन्यथा यह खो जाएगी!

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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