एक प्रेम कहानी की चौथाई सदी

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन
रजनीश जे जैन

एक  विचार को यादगार फिल्म में बदलने में लगने वाला समय कई बरसों का होता है। आमतौर पर सिनेमा को डूबकर पसंद करने वाला दर्शक भी फिल्म निर्माण के कठिन और कष्टप्रद सफर से सरोकार नहीं रखता। सिनेमाहाल के अँधेरे में पॉपकॉर्न खाते हुए, कुछ घंटो लिए अपनी मानसिक परेशानियों को परदे पर  चुनचुना रही छवियों के भरोसे दरकिनार करते दर्शक से उम्मीद भी नहीं की जाती है कि वह परदे के पीछे की कहानी जानने को उत्सुक होगा। इन्हीं दर्शकों की नज़र से ग़ुज़र कर कुछ फिल्में इतिहास हो जाने के बाद भी स्मरणीय बनी रहती हैं। यादगार फिल्मों को लेकर दर्शकों में जरूर कुछ उत्सुकता रहती है। वे उसके बारे में सुनना, बात करना पसंद करते हैं। इस तरह की फिल्मों में कुछ बाते बहुत ही कॉमन होती हैं। इनका संगीत कर्णप्रिय और सदाबहार होता है ,चरित्रों का  चित्रण अलहदा , नायक -नायिका का  अपने काल के श्रेष्ठतम दौर में होना, गीतों में उस जीवन दर्शन की झलक होना जिसकी कोई ‘एक्सपायरी डेट’ नहीं होती।

भारत में बनने वाली हर तीसरी फिल्म के केंद्र में ‘प्रेम’ स्थायी भाव रहा है। गीतविहीन या प्रेमविहीन फिल्मों को भी सराहा जाता रहा है परन्तु उनकी संख्या नगण्य रही है। यद्यपि केंद्रीय भाव ‘प्रेम’ होने के बाद भी फिल्में असफल होती रही हैं। कुछ को छोड़कर सभी प्रेम कहानियां भी अमर नहीं होतीं। मगर  जो अमर होतीं वे हर काल में दर्शनीय होती हैं।  ऐसी ही एक फिल्म 1994 में आई – 1942 ए लव स्टोरी  इसके नाम से ही जाहिर था कि यह भारत छोड़ो आंदोलन के समानांतर प्रेम कहानी होगी। इस म्यूजिकल प्रेम कहानी के निर्माता निर्देशक थे, आज के दौर के सफलतम निर्माता विधु विनोद चोपड़ा। पिछले माह (अप्रेल 2019) में इस फिल्म ने अपने प्रदर्शन  के पच्चीस वर्ष पूरे किये।

यद्यपि पांच करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर महज़ सात करोड़ रुपये ही बटोरे थे। व्यावसायिक रूप से फिल्म औसत ही रही,पर अपने मधुर  संगीत की  वजह से आज भी याद की जाती है। यूट्यूब पर ही इसके गीतों को पांच करोड़ से ज्यादा दर्शक मिल चुके हैं। अन्य म्यूजिक स्ट्रीमिंग साइट्स के आंकड़े भी जोड़े जाएँ तो यह संख्या यूट्यूब से कई गुना अधिक हो सकती है।

इस फिल्म के बनने  की कहानी भी काफी दिलचस्प रही है।

सन् 1989 में विधु विनोद चोपड़ा की यथार्थवादी क्राइम ड्रामा ‘परिंदा’ बेहद सफल रही थी। पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट से ग्रेजुएट विधु ने अपने प्रोजेक्ट के लिए बनाई फिल्म ‘मर्डर एट मंकी हिल ‘ (1976) से ध्यान आकर्षित किया था। इस फिल्म को देखकर अमिताभ  बच्चन ने कहा था कि एक दिन वे इस आदमी के साथ जरूर काम करेंगे! और उन्होंने अपना वादा निभाया भी।

फिल्म परिंदा आलोचकों के साथ दर्शकों द्वारा भी सराही गयी और कहानी  लेखकों ने भी इसे पसंद किया। ऐसी ही एक लेखक कामना चंद्रा थीं। कामना ने ‘प्रेमरोग’ एवं ‘चांदनी’ जैसी सफल फिल्में लिखी थीं। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब कामना अपने परिवार  से मिलने न्यूयोर्क गईं तो उनकी बेटियां अनुपमा (अनुपमा आगे चलकर विधु विनोद चोपड़ा की जीवन संगिनी बनी) और तनुजा चंद्रा तब तक ‘परिंदा’ से खासी प्रभावित हो चुकी थीं। दोनों बहनों ने अपनी माँ को भी यह फिल्म दिखाई। विधु की इंटेंस  फिल्म मेकिंग और डार्क सब्जेक्ट से प्रभावित होकर अनुपमा ने अपनी माँ को सुझाव भी दे डाला कि उन्हें इस नवेले डायरेक्टर के लिए एक अनूठी प्रेम कहानी लिखना चाहिए।

अमेरिका से वापसी पर कामना जी को अपनी बेटी की बात याद आई। विधु से मुलाकात तय की गई। नटराज स्टूडियो में किसी और काम के लिए गए विधु ने कोने में बैठकर कामना के दो तीन आइडिया सुने और एक को पसंद कर लिया। इस बार विधु कोई संगीतमयी फिल्म बनाना चाहते थे। एक बरस बाद कामना अपनी कहानी लेकर हाजिर थीं. परन्तु विधु ने इसे सुनते ही सिरे से नकार दिया। वे गुज़रे दौर में घटित किसी प्रेमकथा को फिल्माना चाहते थे। कामना का एक साल कुछ ही देर में बर्बाद हो गया था। परन्तु वे हार नहीं मानने वाली थीं। चार महीने बाद दूसरी सिटिंग हुई, इस बार कहानी में प्रेम कहानी के समानांतर  स्वतंत्रता संग्राम भी था। विधु ऐसी ही कहानी चाहते थे। इस कहानी को स्क्रीन प्ले में बदलने में विधु के साथ अभिजात जोशी ने भी  योगदान दिया।

विधु ‘परिंदा’ की ही स्टार कास्ट में से ही अपने एक्टर लेना चाहते थे. लिहाजा, नायिका के लिए माधुरी दीक्षित से संपर्क किया गया परन्तु उनके साथ डेट्स की समस्या थी। स्क्रीनप्ले में दो बहनों की कहानी थी।  बड़ी बहन की भूमिका माधुरी को ध्यान में रखकर लिखी गई थी और छोटी बहन का रोल  मनीषा कोइराला निभाने वाली थीं। बदले हालात में माधुरी का रोल हटाकर स्क्रिप्ट को फिर से लिखा गया। मेन लीड के लिए  मनीषा का स्क्रीन टेस्ट लिया गया परन्तु वे फेल हो गईं। उन्हें दूसरी बार फिर टेस्ट देना पड़ा तब जाकर वे सलेक्ट हो पाईं। इस बीच ‘हिना’ की नायिका अश्विनी भावे ने भी स्क्रीन टेस्ट दिया  परन्तु उन्हें ऑन द स्पॉट ही रिजेक्ट कर दिया गया। अश्विनी ने अपना गुस्सा अनिल कपूर पर यह कहते हुए निकाला कि यह सब उनके इशारे पर हुआ है। यद्यपि अनिल कपूर को लेकर भी संशय था। उनकी ‘लम्हे’ फ्लॉप हो चुकी थी यही इकलौती बात उनके खिलाफ जा रही थी। आमिर खान से संपर्क किया गया परन्तु उनके पास भी समय नहीं था। कुछ समय के लिए अनिल कपूर के छोटे भाई संजय कपूर पर भी विचार किया गया अंततः सारे विकल्पों पर अनिल कपूर ही भारी पड़े। सेकंड लीड में जैकी श्रॉफ फाइनल हो चुके थे अचानक उन्हें डेट्स की समस्या हो गई। एक बार फिर चेयर रेस शुरू हुई। अनिल कपूर वाली भूमिका के लिए सलमान खान  से कहा गया और जैकी श्रॉफ की जगह अनिल कपूर को शिफ्ट किया गया। रघुवीर यादव के रोल के लिए शाहरुख़ खान लगभग तय हो चुके थे। नाना पाटेकर से संपर्क नहीं किया गया था परन्तु वे अनुपम खेर की जगह लेना चाहते थे। प्राण साहब, मनोहर सिंह, सुषमा सेठ, डेनी डेंजोंगपा, ब्रिटिश एक्टर ब्रायन ग्लोवर (जनरल डगलस) आदि के रोल को लेकर कोई विवाद नहीं था।

यह तो मानना ही होगा कि यह  फिल्म अपने कालजयी गीत संगीत की वजह से ही पच्चीस बरसों का सफर तय कर पायी है। जावेद अख्तर का अतीत स्क्रिप्ट राइटर का रहा है। कैरेक्टर, सिचुएशन और मेंटेलिटी की समझ उन्हें गीत लिखने में बेहतर मदद करती है। इस फिल्म के लिए, उनके लिखे गीत उनकी शायरी को ऐसे मुकाम पर बैठा देते हैं जिसकी मिसाल गीत संगीत के गोल्डन एरा में ही मिलती है। प्रेम के उफान के बावजूद भावनाओं की शुद्धता और गहराई उनकी समझदारी प्रकट करती है।

विधु ने जो स्क्रिप्ट लिखी थी उसमें गानों की कही गुंजाइश नहीं थी, बावजूद इसके वे इसे गीत-संगीत से भिगोना चाहते थे। उन्होंने स्क्रिप्ट जावेद अख्तर को थमाई और कहा कि इसमें गानों की सिचुएशन बनाओ! जावेद स्क्रिप्ट लेकर अपने पैतृक गाँव निकल गए ताकि प्रकृति के बीच तन्हाई में कुछ लिख सकें। परंतु  कुछ दिन वहाँ बिताने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। वे खाली हाथ मुंबई लौट आये। उनके लौटते ही विधु ने बुलावा भेजा कि गीत तैयार हों तो सुनाओ। जावेद ने हड़बड़ी में एक मुखड़ा बनाया ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा वैसा लगा और मिलती-जुलती उपमाएं जोड़ दी। गीत का मुखड़ा पास हो गया। अगले पांच दिन में दो अंतरे और तैयार हो गए। यह गीत जावेद ने माधुरी दीक्षित को ध्यान में रखकर लिखा था लेकिन किस्मत में मनीषा की था और उन पर सूट भी हुआ।

इसी फिल्म का एक और गीत’ कुछ ना कहो, कुछ भी ना कहो’ गहरी दार्शनिकता वाला गीत है। इस गीत को ध्यान से देखे यह कहीं से भी फिल्म के कथानक से मैच नहीं करता नजर आता है। यहाँ विधु ने ‘रोमियो जूलियट’ के नाटक मंचन की तैयारी के बीच इस गीत के लिए गुंजाइश बनाई। स्टूडियो का सेट और दीवार पर सूर्यास्त  दृश्य। गोधूलि बेला, सफ़ेद झक गाउन में झूले पर झूलती नायिका, मादक संगीत। ऐसे में  सच में कुछ कहने की जरुरत ही नहीं है। जावेद के अलावा इस गीत को और कोई नहीं लिख सकता था। ‘क्या कहना है क्या सुनना है, सबको पता है सबको पता है ‘ कोई और होता तो वह शायद नायिका के नख शिख वर्णन से अंतरे को भर देता। यहाँ जावेद, नायक की इच्छा, सौन्दर्य ,प्रणय निवेदन सब कुछ मतलब सब कुछ जोड़ सकते थे।  तब शायद यह गीत आम चलताऊ गीत  हो जाता परन्तु जावेद उसे आसमानी बनाना चाहते थे। पर जावेद ने जब मुखडे में कह दिया कुछ नही कहना है तो दोनों अंतरे भी केवल नायक के मन की आवाज बनते हैं और कुछ ना कहो की मानसिकता को बरकरार रखते हुए नायिका से कुछ ना कहकर खुद ही खुद से  कहता है-

कितने गहरे-हल्के शाम के रंग है छलके/ परबत से यूं उतरे बादल जैसे आंचल ढलके

और इस पल में कोई नही है/ बस एक मै हूं/ बस एक तुम हो

सुलगी-सुलगी सांसे/ बहकी-बहकी धडकन/ महके-महके शाम के साये/ पिघले-पिघले तन मन

और इस पल में कोई नही है/ बस एक मै हूं/ बस एक तुम हो

इसके अलावा रुनझुन रुनझुन भीगी-भीगी रुत में , और  दिल ने कहा चुपके से ये क्या हुआ चुपके से ,और ….  रूठ ना जाना तुमसे जो कहूँ तो , और …..ये सफर बहुत ही कठिन है…. ऐसे  गीत हैं जिन्हें आप चाहकर भी अपनी स्मृतियों से नहीं निकाल सकते। ये ऐसे गीत हैं जिन्हें आप अपने अंतिम समय तक सुनना पसंद करेंगे।

संगीत के लिए विधु की एकमात्र पसंद आर डी बर्मन ही थे। इस सच्चाई  के बावजूद भी कि उस  समय आर डी अपने जीवन के सबसे कठिनतम दौर से गुजर रहे थे। उनका संगीत चल नहीं रहा था और उनका आत्मविश्वास रसातल में जा चुका था। म्यूजिक कंपनी एच एम वी ने लगभग चेतावनी दे डाली थी कि आर डी के नाम से जुड़ा संगीत वे नहीं खरीदेंगे! फिर भी विधु, आर डी के पास पहुंचे और उनसे  ‘1942’ के लिए कम्पोजीशन बनाने को कहा। पहली धुन ‘कुछ ना कहो’ के लिए बनी और ऐसी बनी कि विधु बगैर कुछ बोले उठ खड़े हुए। आर डी ने पूछा भी कि क्या हुआ? कैसी लगी? परन्तु इधर चुप्पी थी। अब आर डी भी बच्चों की भांति मचल गए कि बताना तो पड़ेगा ही ! विधु को बोलना ही पड़ा-  बकवास! हताश आर डी ने एक हफ्ते का समय माँगा विधु बोले एक साल लगाओ परन्तु मुझे वही  दो जो मै चाहता हूँ ! सात दिन बाद कुछ ना कहो की धुन दोबारा बनी। आरडी ने अपना सारा एकांत और नैराश्य  धुन में उतार दिया। विधु विनोद प्रसन्नचित्त। उन्हें पता था कि आरडी ने कमाल कर दिया है। विधु विनोद के सिनेमाई जीवन के इस प्रसंग के कारण भी उनके लिये सम्मान हमेशा रहेगा। ढलते सूरज को भी नमस्कार करना उन्होंने ही बताया !  इस बार विधु ने आर डी को सचिन देव बर्मन की कुछ अधूरी धुनों का कैसेट सुनाया। आर डी ने हारमोनियम संभाला और तान छेड़ी रोंगीला… रोंगीला…. रोंगीला…रे -इसी नोट को बदल कर कुछ ना कहो  में ढाला गया। दरअसल 1955 में सचिन देव बर्मन ने देवदास  के गीता दत्त की आवाज में गाये गीत ‘आन  मिलो आन मिलो श्याम सांवरे  की कम्पोजीशन बनाई थी। कुछ ना कहो के लिए आर डी ने वो रच दिया जो अकल्पनीय था। कुछ ना कहो  में जब बांसुरी वाला भाग आता है तब गीता दत्त वाले गीत को महसूस किया जा सकता है।

‘कुछ ना कहो..’ के दो वर्ज़न बने। एक कुमार शानू की आवाज में है दूसरा लता जी की आवाज में। लता जी वाला वर्ज़न आर डी बर्मन की मृत्यु के बाद रेकॉर्ड किया गया था। गहरी उदासी लिए लता जी ने मानो आर डी के अवसान के अवसाद को जस का तस व्यक्त कर दिया।  यह गीत दुनियावी नहीं रह जाता, रूहानी हो जाता है। इसके उलट  कुमार शानू ने जैसे इस गीत में नशा घोल दिया। आर डी ने किशोर कुमार को ध्यान में रखकर धुन बनाई थी। किशोर के जाने के बाद इस धुन को छोड़ दिया। कभी काम ही नहीं किया। लगा किशोर कुमार के साथ ये धुन भी खत्म हो गई है। बुरे समय में आरडी को अपनी इस धुन की याद आई।

इस फिल्म के डायरेक्टर विधु विनोद थे परन्तु इसके सभी गीत उनके सहायक संजय लीला भंसाली ने डायरेक्ट किये थे। फिल्म की पृष्ठभूमि में अंग्रेजी राज उतार पर है। क्रांतिकारी अपने काम को गंभीरता से अंजाम दे रहे हैं। ऐसे में नायक नायिका की मुलाक़ात होती  है।  क्रांतिकारी परिवार की नायिका और अंग्रेजों के समर्थक परिवार का नायक। मेल कही संभव नहीं था परन्तु प्रेम शायद ऐसी ही परस्पर विरोधी स्थितियों में जन्मता है। अनिल कपूर इतने ग्रेसफुल इससे पहले कभी नही लगे, सुशील सलोने पहले शायद ही लगे हो। स्त्रीत्व का प्रतिक नजर आती मनीषा –  निर्मल, चंचल, शुद्ध नारीत्व की पराकाष्ठा को छूती हुई।

इस फिल्म के कॉस्ट्यूम गाँधी  फेम भानु अथैया ने डिज़ाइन किये थे। ब्रिटिश दौर के चरम पर भारतीय किस तरह के कपडे पहनते थे यह बात इस फिल्म ने बारीकी से प्रदर्शित की थी। महिलाएं उस समय गांधीजी के आह्वान पर हाथ से बने हुए कपडे ही पहन रही थीं, सो मनीषा कोइराला की अधिकांश साड़ियां हाथ से बुनी हुईं और खादी की थीं। वहीं अनिल कपूर के कपड़े जूते और हाथ घड़ी में उस दौर के फैशन को देखा जा सकता है।

आर डी जिन्हें प्यार से पंचम भी बुलाया जाता था, पर पाश्चात्य संगीत से प्रभावित होने का लेबल लगा हुआ था। 1942  में उन्होंने ऑर्केस्ट्रा को छोड़ भारतीय वाद्यों  और रागों  का सुन्दर उपयोग किया है। कुछ ना कहो में बांसुरी प्रमुखता से महसूस की जा सकती है। इस गीत को दादरा ताल में रोनू मजूमदार की बांसुरी से सजाया गया है। इसी तरह प्यार हुआ चुपके से  में कविता कृष्णमूर्ति अपनी आवाज  जलतरंग, सितार और संतूर की जुगलबंदी को राग देस में  पिरोकर भाव विभोर कर देती है। एक लड़की को देखा – इंडियन क्लासिकल इंस्ट्रूमेंट्स वीणा, मटकी, संतूर, और बांसुरी के बेहतरीन कॉम्बिनेशन से हरबार  ऐसा मूड बनाता जैसे इसे पहली बार ही सुन रहे हों। घावों पर मरहम लगाता शिवाजी चटर्जी की गहरी और दिलासा देती आवाज में ये सफर बहुत ही कठिन है  उदासी के साथ प्रेरणा भी जगा देता है।

इस फिल्म को देखते वक्त दर्शक इसकी लोकेशन से प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। दिलचस्प तथ्य यह है कि  इसकी  सत्तर फीसदी शूटिंग मुंबई के  फिल्मसिटी स्टूडियो में संपन्न हुई थी। विधु विनोद की माली हालत उस समय ऐसी नहीं थी कि पूरी यूनिट को डलहौज़ी ले जा सकें तो आर्ट डायरेक्टर नितिन देसाई के आग्रह पर फिल्मसिटी में ही डलहौसी के मकानों और सदर बाजार के सेट लगाए गए । हिन्दुस्तान का स्विट्ज़रलेंड कहे जाने वाले ‘खज्जियार ‘हिलस्टेशन  के ही एक कॉटेज में ‘एक लड़की को देखा ‘ शूट किया गया था।

सन् 1995 के  फिल्मफेयर अवार्ड्स में सिर्फ 1942-ए लव स्टोरी का ही जलवा था। इसे 14 श्रेणियों में नामांकन मिले थे जिसमें से 9 पुरस्कार इसके हिस्से आये थे। (बेस्ट म्यूजिक डाइरेक्टर – राहुल देव बर्मन, बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर -जैकी श्रॉफ, बेस्ट लिरिसिस्ट -जावेद अख्तर, बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर – कुमार शानू, बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर -कविता कृष्णमूर्ति, बेस्ट आर्ट डायरेक्टर -नितिन देसाई, बेस्ट सिनेमाटोग्राफर – विनोद प्रधान, बेस्ट एडिटिंग -रेणु सलूजा, बेस्ट साउंड डिजाइनिंग -जीतेन्द्र चौधरी)

सबसे दुखद बात थी इसकी रिलीज़ के पहले ही आर डी बर्मन का आकस्मिक निधन हो जाना। यह दुर्भाग्य ही था कि वे अपने रचे  संगीत की अपूर्व सफलता को देख नहीं पाए।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

4 COMMENTS

  1. अपने संगीत की वजह से फ़िल्म इतिहास में अमर हो चुकी इस फ़िल्म पर एक सुरीला और संपूर्ण लेख। हार्दिक बधाई।

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