भोजपुरी गीत संगीत लोकसाहित्य में जातीय आ मेहरारू लो के योगदान

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नवीन कुमार/

कबो कहो सांच के चबाइल मुस्किल होला त ओह के घोंटे के परेला । उदबिलाव लेखा मुड़ि माटी में गाड़ के रउवा अपना के लुकवा ना सकेनी । हम जवन लिखे जा रहल बानी ओह के पढ के ढेर लो के बाउर लागी बाकिर हमार किताबी ज्ञान आ जवना अपना क्षेत्र में देखले बानी ओह आधार प कहि रहल बानी ।

भोजपुरी के बढंती में सबसे बेसी योगदान पिछड़ा जाति , दलित वर्ग आ हर जाति के मेहरारून के रहल बा । एगो सवाल बेर बेर उठेला कि विद्यापति तुलसी लेखा महान लेखक भोजपुरी के काहें ना मिलल ? क गो किताबिन में एह बात के लिखल गइल बा कि काशी धार्मिक आ संस्कृत के केंद्र रहे जवना के असर भोजपुरी भाषा के बढंती प परल । जब हम बात काशी के करत बानी संस्कृत के करत बानी त हमार कहनाम बा कि भोजपुरी क्षेत्र के पढुआ आ विद्वान ( अधिकतर बाभन ) लो संस्कृत के ओर लरकल रहे , जवना के असर भोजपुरी का साहित्यिक विकास प परल । एहि से भोजपुरी में लोक साहित्य अउलाह मिलेला जवन वाचिक परम्परा के दायरा में बनल रहे गढाइल रहे बाकिर लिखीत साहित्य कम मिलेला ।

जदि हमनी के गीतन के समूह के उपर वर्गीकरण करब जा त मय बात सोझा आ जाई ।

वाद्ययंत्र के हिसाब से :

डफरा / डफ : चमरुआ बाजा के नाव से जानल जाला , चमार जाति ( चाम के काम करे वालि जाति ) मूल रुप से एह के बजावेला । डफ के गीत आ गावे के शैली एगो अलग शैली ह । एह लो के नाचे के आपन शैली बा । इंटरनेट प एह लो के गीत कम मिली आ अब विलुप्त होखे के कगार प आ गइल बा । डफ के प्रयोग बढत बा बाकिर शैली खतम हो रहल बिआ ।

पखाउज : भोजपुरी क्षेत्र में मूल रुप से पखाउज धोबी जाति के वाद्ययंत्र ह । एह लो के आपन गीत आ आपन नाच शैली बा । धोबी गीत , पखाउज आ धोबिया नाच अपना समय के बेहतरी शैली रहल बा ।

हुरूका : गोंड समुदाय के आपन वाद्ययंत्र , एह लो। के आपन नाच के शैली आ गावे के स्टाइल होला । आरोह अवरोह के बदलाव एह लो के खासियत होला ।

ढोलक / नाल : मुल रुप से एकर प्रयोग सामान्य रहल बा जवना के प्रयोग मूल रुप से मय वर्ग कइले बा भा करेला ।

मृदंग : संस्कृतिकरण में पंडी जी लो शास्त्रीयता के बचावे सजावे खातिर एकरा के अपनावे के कोशिश कइल लो बाकि भोजपुरी क्षेत्र में इ चल ना पावल ।

गीतन के विधा के हिसाब से :

पचरा : दुसाध जाति के पारम्परिक गीत
धोबी गीत : धोबी जाति के गीत
बिरहा : अहिर जाति के गीत
लोरिकी : अहिर जाति के गीत
गोंडउ गीत : गोंड़ जाति के गीत
कहंरुआ गीत : कहांर जाति के गीत ( चाक के घुमावत माटी पाथत गवाला )
रोपनी / सोहनी गीत : मजदुर वर्ग ( लगभग हर उ जाति जवन दलित आ पिछड़ा वर्ग के बा उ गावेला )

सास्कारिक गीत : सोहर , खेलौना , बिआह के गीत , संझा पराती आदि मेहरारू लोग हर जाति के मेहरारू लो गावेला ।

बारहमासा , चौमासा , छौमासा , चइता , फाग , कजरी , झूमर आदि हर धर्म हर जाति के लोग गावेला । पंडी जी बाबू साहेब लो भी एह के गावेला ।
इ पुरा वर्गीकरण हजार दु हजार बरिस के पहिले के ह । मुगल के प्रभाव गते गते परे लागल रहे , संस्कृत के बहुपाश से मय मातृभाषा निकल गइल रहली।

चुकि विद्वान लोग अपना के सिकुड़ावे लागल रहे एहि से खेत आदि में काम करे वाला हर वर्ग एह मय गीतन के गते गते अपनावे लागल आ नतीजा इ भइल कि जाति त ओइसहीं बनल रहे बाकिर जातिगत आधार प बनल गीत संगीत आपन सीमा तुर देहलस ।

हमरा मन परेला हमरा गांवे फगुआ में दु गो दल गावे ला । एगो बुढवा दल जवना में गीत भक्तिमय होला श्रृंगार के रहेला बाकिर संयमित रहेला अधिकतर गीत राम-कृष्ण प रहेला ।जबकि नवका दल में गीत गाना के संगे नाचो होला । गाना गीत के बोल अलग होला । आम आदमी के भावना एह नवका दल में बेसी रहेला ।

आज के वर्तमान त सुचिता के छोड़ी एकदम भरभंड हो गइल बा । गीत संगीत के जातिगत दायरा से बहरी निकलल , कामयाब नइखे हो पावत।

आज जहां उच्च वर्ग , दलित आ पिछड़ा वर्ग के गीतन के त अपनवलस बाकिर संगे संगे ओह में ब्यापार के अइसन लालच भर देहलस कि परम्परा के गरदन प अश्लीलता के गोड़ पर गइल बा ।

चुकि अश्लीलता फुहरपन से ना खाली भोजपुरी के नुकसान होता बलुक हिन्दू धरम प असर पर रहल बा । एह से समय अब कुछ सही सटीक कड़ेर आ बरिआर जोहि रहल बा ।

जागल जरुरी बा !

(नौकरी के बाबत आजकल नवीन कुमार शारजाह में  अपना ठिकाना बनाए  हुए है. इनकी भोजपुरी में जो नाज शामिल है वह विरले कहीं दिखता है.)

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