बघेली लोक कवि: तीसरी किश्त

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बाबूलाल दहिया/

(बाबूलाल दहिया बघेली भाषा के कवि हैं. साथ ही आप सर्जना सामजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच, पिथौराबाद के अध्यक्ष भी हैं. बघेली कवियों पर आपका  काम शानदार है. इस कड़ी में यह इनका तीसरा  लेख है )

सैफुद्दीन सीद्दीकी उर्फ़ सैफू

बघेली कवियों की कड़ी में आज हम आप का परिचय करवा रहे हैं सैफुद्दीन सीद्दीकी उर्फ़ सैफू से. 

बाबूलाल दहिया

सैफू जी का जन्म सन 1923 में अमरपाटन तहसील के अंतर्गत रामनगर में हुआ था पर उसके बाणसागर के डूब में आजाने के कारण बाद में वे सतना सिविल लाइन से जुड़े गाँव गढियाटोला में बस गए.

सैफू स्वभाव से अत्यंत सहज और सरल किन्तु अनुभव से सम्पन्न कवि थे. उनके जैसा लोक जीवन का अनुभव बिरले ही पाया जाता है. जिसका प्रतिफल है बघेली बोली की कविताओ ,कहानियों ,पहेलियों और उपन्यास आदि की सात पुस्तकें.
वे सेवा निवृत्ति के पहले हमारे ही सर्किल में राजस्व निरीक्षक के पद पर थे इस लिए कवि सम्मेलन और कवि गोष्ठियां उनके साथ अक्सर होती रहती थी. संयोग से उनदिनों कालिका त्रिपाठी भी नागौद में ही तहसीलदार थे इसलिए साहित्य का एक अच्छा माहौल सा बन गया था. किन्तु रिटायर होने के 1-2 दो वर्ष बाद ही सैफू जी का निधन हो गया था जो बघेली बोली के लिए अपूर्णीय क्षति थी.

सैफू ने बघेली को न सिर्फ नए आयाम दिए, बल्कि एक सुदृढ काव्य परम्परा प्रदान की है. देश की तत्कालीन श्थिति में उनकी एक कविता देखें,

धनमानव रुपिया केर महातिम है भारी।
खोलवाय लिहा तुम मील चली मोटर लारी।।
वैकुंठा लोक अस बड़े बड़े माकान बने।
आराम केर तोहरे खातिर सामान बने।।
तोहरे खातिर जे खून पसीना एक करिन।
तोहरे पक्कन मा जे गिलाव अउ ईंट धरिन।।
कबहू तुम उनके ठठरिउ कइत निहारया है।
रोटिउ भर पेट दिहा की भूखन मरया है।। 
सब रकम तिजोरिन मा गिन गिन के गाज दिहा।
लछमिनिया के कुछ अइसन काजर आज दिहा।।
वा तोहइन का बस आँखी फार निहारा थी।
तोहरे घर मा बस बल भर गोड पसारा थी।

गरीबी का बड़ा ही सटीक चित्रण उन्होंने अपनी एक कविता में किया है. यथा:

कस री काल्ह कहेंन तय तोखा पइरा मोट दसाए।
दुअरा मा कउड़ा जराय के डूडा जबर लगाये।।
या कंडा करसी के माथे जई न न्नचिउ जाड।
फटही कथरी ओढ़त ओढ़त अटढिआय गे हाड।।
तय ता छाट लिहे दुइ धोतिया लड़िकन का छुपकउती।
जाड़ लाग ता परेंन परे कुछ सोहर बनरा गउती।।
चाउर नबा हेर के राधस माठा डार खबाबस।
अपने जान करस निकहा पै मरहम जान न पाबस।।
पूसउर केर बइहरा बहिगा मसकय लाग ठहारी।
तय कोहड़उरी बरी राधि के बनय लिहे तरकारी।।
भात बलुक कोदई का राधे अउ ज्वन्हरी कै रोटी।
या जड़हांये माठा लक्चा कोऊ न सरपोटी।।

सैफू जी की अनेक कविताएँ हैं जिनमें गरीबो मजलूमो और किसानों की अभाव-ग्रस्त जिंदगी का बड़ा बेबाक वर्णन है. पर वैचारिक रूप से परम्परावादी सोच के कारण कुछ कविताओं में भटकाव भी स्पष्ट देखा जा सकता है. यथा
रीवा नरेश महाराज मार्तंड सिंह जी के गद्दी नशीन होने के समय की एक कविता देखे,

कोलाबा बी ए एम ए पास बाम्हन ककहरा फेल,
चंदन सरपोटा दिहे फाद लेय झोरी।
रीमा के भास्कर निहारय जो किरपा दिठ्ठ,
छूट जाय रिमहन कै सगली दतनिपोरी।।

आजादी के पहले इस क्षेत्र में कुछ इस तरह की विचारधारा ही बनी हुई थी, जिसमें शिक्षा कुछ ख़ास वर्ग की पूँजी मानी जाती थी. किसी आदिवासी का पढा लिखा होना परम्परा के खिलाफ माना जाता था.
इस तरह सैफू जी की कविताओं में अनेक आयाम देखे जा सकते हैं.

 

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