बघेली लोक कवि: चौथी किश्त

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बाबूलाल दहिया/

(बाबूलाल दहिया बघेली भाषा के कवि हैं. साथ ही आप सर्जना सामजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच, पिथौराबाद के अध्यक्ष भी हैं. बघेली कवियों पर आपका  काम शानदार है. इस कड़ी में यह इनका चौथा  लेख है )

शंभू द्विवेदी उर्फ़ काकू

बाबूलाल दहिया

काकूका नाम आते ही लोगों के जेहन में आज भी धोती-कुर्ता धारी हाथ में एक बेत का डंडा लिए एक सज्जन का चेहरा उभर आता है वह है बघेली के त्रयी बैजूसैफू, काकू- में से एक सुविख्यात बघेली कवि शंभू द्विवेदी काकू. जिन्हें रीवा सीधी शहडोल के प्रायः हर छोटे बड़े काव्य मंचों में देखा जा सकता था.
जिस मंच में काकू नहीं तो आधा कवि सम्मेलन यूँ ही फ्लॉप. एक पुरानी साइकलखैर, सुपाड़ी, तमाखू से भरी थैलीटूटी-फटी पनही उनकी पहचान थी.
कालिका त्रिपाठी जी ने उनकी पनही और बेत पर एक बार हँसी-हँसी में काहा था कि,,
टूट टूट अउ घिनही घिनही।
ई आही काकू की पनही।।
टेड टेड सब कै पहिचानी।
तउनय काकू केर घोटानी।।
शंभू काकू का जन्म रीवा जिले के खैरी गाँव में हुआ था. पर बाद में भतीजों द्वारा गाँव की जमीन हड़प लिए जाने के कारण रीवा से सटे एक गाँव में बस गए.
वे ऐसे कवि थे कि किसी ने कुछ कहा तो उसका जवाब कविताओं के रूप में ही उनके मुँह में तैयार होता था. परौहा ब्राम्हण होने के कारण तिवारी ब्राह्मणों का वे अपने को साधिकार मान समझते थे. इसलिये हमउम्र तिवारी लोगों के जीजा बन जाने में उन्हें ज़रा भी गुरेज नही होता था । आदरणीय जगजीवन लाल तिवारी जी से उनकी अक्सर नोक-झोंक होती रहती थी. पर यदि कम अवस्था वाले किसी तिवारी ने काकू पलागो कहा तो उनके लिए भी कविता ही आशीर्वाद के रूप में काकू के जुबान में होती कि,

जुग जुग जिया ससुर के नाती।
फुफू तोहार रहय अहिबाती।।

अब वे अर्थ लगाते रहे कि काकू किसकी सलामती चाहते हैऔर फूफू के अहिबाती रहने का अर्थ क्या है.
काकू की कविताएँ दोहासवैयाघनाक्षरीकुण्डलिया आदि अनेक छन्द विधाओं में है. लम्बे समय तक उनकी एक कुण्डलिया प्रति दिन देश बन्धु अखबार में छपती रही है.
उनकी एक कविता तो लोगों के जुबान मे बस गई थी वह है,
हर हर गंगे गोदावरी। 
बोले चला निरा लबरी ,,

पर यहाँ भ्र्ष्टाचार को उजागर करती उनकी एक कविता देखें  ,

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
खाये चला पिए चला लोग करय सेवा।।
दुपहरिया दूध भात रात हलुआ पूड़ी,
सांझा के खीर पिया भर भर के कूड़ी।
लेडुअन के खूब किहे चला तू कलेबा।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।।
आधी तूफान चले चाह होय बूड़ा,
देश जाय चोबरे मा लाग जाय लूडा।।
तुम तो बस छाने रहा मिसरी अउ मेबा।।

शंभू काकू की कविताएं बिना लाग लपेट के तात्कालिक प्रभाव से उपजती थीं. जैसा देखा लिख दिया. 
एक उनकी कविता जवानी पर देखे,

चढ़ी मोटाई देह ललान,
जइसय जेठ केर गिरदान।
उठी रेख सह सकय न पानी।
काकू येही कहय जमानी।।

उनकी एक कविता बुढापे के लिए भी है कि,
दांत उखरि गे पकि गे बार।
जिउ जामा से भे लाचार।।
हालय मूड निबलता आई।
काकू येही कहय बुढाई।।

इस तरह शंभू काकू की अनेक कविताएं थीं जो काव्य मंचों में लोगो को लोट-पोट करती रहती थी. पर अधिकाँश कविताएँ रख-रखाव के अभाव में समाप्त हैं.

 

1 COMMENT

  1. हमारे बघेली बोली के सर्व श्रेष्ठ कवि श्री बाबूलाल दाहिया जी को बहुत बहुत बधाई । जिन्होने बघेली साहित्य को समेटने का पुनीत कार्य किया

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